गीत गोविन्द के कुछ गीत:- श्री जयदेव गोस्वामी

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 पुरानी कथाओं  के अनुसार, पद्मावती, पुरी के जगन्नाथ मंदिर की नर्तकी (देवदासी) थी और जयदेव गोस्वामी ने उनसे विवाह भगवान की इच्छा  के अनुसार  किया और फिर वह वहीं बस गए, ताकि भगवान की भक्ति के साथ पद्मावती की देखभाल भी कर सकें। देवदासी नृत्य की यह प्रथा पुरी के जगन्नाथ मंदिर में आज तक जारी है। इस संदर्भ का वर्णन भी गीतगोविन्द की प्रस्तावना वाले श्लोकों में किया गया है जहां वह कहते हैं कि जिनकी रुचि हरि स्मरण में है, और जिन्हें प्रभु की प्रेम लीला में आनंद प्राप्त होता है वे गीतगोविन्द काव्य का रसपान कर सकते हैं।

गीतगोविन्द काव्य एक गीति काव्य है जिसमें एक ओर तो प्रत्यक्ष रूप से कृष्ण और राधा की प्रेम लीलाओं का नाटकीय प्रस्तुतिकरण किया गया है लेकिन साथ ही गहराई में जाने पर यह परमात्मा के साक्षात्कार के लिए आत्मा की विकलता और अंततः स्वयं को परमात्मा की सेवा में लीन कर देने का भाव बन जाता है। यह भाव ईश्वर साक्षात्कार और श्रृंगार दोनो ही दिशाओं में प्रवाहित होता है और गीतगोविन्द के गीत दोनों ही अर्थों में सटीक बैठते हैं।

गीतगोविन्द की रचना विशेष तौर पर भगवान जगन्नाथ के रात्रि पूजन के दौरान किए जाने वाले नृत्य प्रस्तुति के लिए की गई थी, इसलिए इसकी रचना इस दक्षता के साथ की गई कि इसे नृत्य कलाकारों के पैरों की ताल के साथ गाया जा सके। काव्य के अन्त में पुनः इस तथ्य को व्यक्त करते हुए कवि ने कहा है कि इस काव्य की रचना भगवान विष्णु की भक्ति के एक माध्यम के रूप में की गई है और इसे कृष्ण में लीन कवि जयदेव गोस्वामी  द्वारा श्रृंगार रस के आवरण में लपेट दिया गया है। यह काव्य इतना लोकप्रिय हुआ कि एक शाताब्दी से भी कम समय में पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक देश के सभी भागों में इस काव्य का प्रसार हुआ और इसे नृत्य, संगीत, चित्रकला की विधाओं में ढालने के साथ-साथ मंदिरों की पूजन प्रक्रिया में भी इसका व्यवहार किया जाने लगा।

गीत गोविन्द के गीत :-

प्रथम गीत के चार परिचयात्मक श्लोक हैं, जिनके बाद ग्यारह अष्टपदी हैं जो भगवान विष्णु के दस अवतारों के उद्देश्यों का वर्णन करते हैं और अंत में रचना के निर्बाध समापन के लिए समर्पण किया गया है। इसके बाद एक अन्य अष्टपदी आती है जहां कृति के नायक की प्रशंसा की गई है। यहां लेखक ने संकेत किया है कि यह अष्टपदी मंगलम, अर्थात कल्याणकारी श्लोक है।

चौथे गीत में, कवि वृंदावन के घने जंगल में गोपियों के साथ कृष्ण की रास लीलाओं का वर्णन करते हैं। कृष्ण गोपियों से घिरे हैं, गोपियां उनसे आनन्दपूर्वक लिपटती हैं और उन्हें प्रेम से सहलाती हैं और कृष्ण किसी की तारीफ प्रेम से गले लगाकर तो किसी को चूमकर करते हैं, किसी की ओर प्रेम भरी नजरों से देखते हैं तो किसी अन्य पर प्रेम-पगी मुस्कान डालते हैं। जयदेव कहते हैं वास्तविकता तो यह है कि भगवत् कृपा हर किसी पर बरसती है।

ग्यारहवें गीत में कवि विप्रालंभ श्रृंगार का वर्णन करते हैं। प्रेम के देवता कृष्ण यमुना नदी के तट पर राधा की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कवि राधा और कृष्ण के आलिंगन की तुलना आकाशीय बिजली और काले बादलों तथा सारस और काले बादलों से करते हैं।

बारहवें गीत में कवि निर्मोही कृष्ण के साथ राधा के विरह की वेदना का वर्णन करते हैं। कुंज वन में, प्रेम के ताप में झुलसते हुए और अपने मन को कृष्ण पर एकाग्र टिकाए हुए राधा की ऐसी व्याकुल और दयनीय दशा हो रखी है कि वह चल-फिर नहीं सकती। सखी कृष्ण से जाकर राधा की विक्षिप्तता की बात कहती है जो अपने मन की आंखों से सर्वत्र उनका दर्शन करती है और अपने प्रेमी की मात्र एक याद के सहारे जीती है। सखी कृष्ण से अनुरोध करती है कि वह तुरंत जाकर राधा से मिलें, जो कृष्ण के आने की आस में पूर्ण श्रृंगार किए बैठी है।

गीत गोविन्द के गीतो के माध्यम से रसिक भक्त  भगवान की  लीलाओ का आनंद ले सकते है |

 जय जय श्री राधे

 

 

 

 

 

 

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