BRAJ SUNDRIYA ब्रज सुंदरियां

व्रज-सुन्दरियाँ

श्री श्री उज्ज्वल नीलमणि में श्री रूप गोस्वामी ने  व्रज-सुन्दरियों के चार पक्षों में बांटा   है :- स्वपक्ष और प्रतिपक्ष, सुहृत्पक्ष और तटस्थ। व्रज में श्री कृष्ण  की नित्य प्रेयसियाँ हैं श्री  राधा , चन्द्रावलि, विशाखा, ललिता, श्यामा, पद्मा, शैव्या भद्रिका, तारा, विचित्रा, गोपाली, धनिष्ठा और पालिका आदि  इनमें मुख्य हैं राधा और चन्द्रावली। इन दोनों में भी राधा श्रेष्ठ हैं।

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नित्य प्रेयसियों में विशाखा, ललिता, पद्मा और शैव्या को छोड़ सभी यूथेश्वरी हैं। यूथेश्वरी के  एक-एक यूथ में लाख-लाख व्रज सुन्दरियाँ हैं। जो व्रज सुन्दरियाँ एक ही यूथेश्वरी के यूथ में रहती  हैं, उन्हें उस यूथेश्वरी की स्वपक्षा कहते हैं। स्वपक्षा, यूथेश्वरी का इष्ट-साधन और अनिष्ट निवारण करती है। ललितादि राधा की स्वपक्षा हैं।

जिस सुन्दरी के भाव में यूथेश्वरी के भाव से अधिकतम साजात्य होता है, पर किञ्चित वैजात्य होता है, उसे उस यूथेश्वरी की सुहृत्पक्षा कहते हैं, जैसे श्यामला राधा की सुहृत्पक्षा है। जो सुन्दरियाँ परस्पर विद्वेष भावापन्न होती है, उन्हें एक-दूसरे का विपक्ष कहते हैं। राधा और चन्द्रावली परस्पर विपक्षा हैं। विपक्ष के सुहृत्पक्ष को तटस्था कहते हैं। श्यामला राधा की सुहृत है और चन्द्रावली की तटस्था।

यहाँ यह कह देना आवश्यक जान पड़ता है कि व्रज की सखियाँ सब राधा की शाखा-प्रशाखा, पत्र-पुष्प तथा उनकी कायव्यूह रूपा हैं। उन सबका एकमात्र काम्य है श्रीकृष्णसुख। इसलिए उनमें ईर्ष्या-विद्वेषादि की कोई संभावना नहीं है परन्तु  रस में  विचित्रता  सम्पादन कर श्रीकृष्ण को सुखी करने के उद्देश्य से श्रृंगार रस मूर्ति परिग्रह कर अपने परिवार स्वरूप ईर्ष्या-विद्वेषादि को व्रज सुन्दरियों के हृदय में निक्षेप कर उनमें स्वपक्षा, विपक्षा और तटस्था आदि की सृष्टि करता है ।

ईर्ष्या आदि हैं श्रृंगार रस के संचारी भाव। संचारी भाव श्रृंगार-रति को परिपुष्टकर रस में परिणत करता है। पर ईर्ष्यादि व्रज सुन्दरियों की बाहृ वृत्ति में ही उदित होते हैं। उनकी अन्तर्वृन्ति को वे स्पर्श भी नहीं करते। यह बात व्रज सुन्दरियों के श्रीकृष्ण से वियोग के समय भली-भाँति जानी जाती है। उस समय उनमें परस्पर ईर्ष्या-द्वेषादि की जगह परस्पर स्नेह ही देखने में आता है।

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