महाप्रभु द्वारा डाकु नौरोजी का उद्धार

 

महाप्रभु द्वारा डाकू नौरोजी पर कृपा एवम उसका उद्धार

श्री कृष्ण कलयुग में श्री राधा रानी का महाभाव एवम गौर वर्ण लेकर महाप्रभु के रूप में आये | इस रूप में महाप्रभु ने सबको प्रेम बाँटा ,योग्यता को भी नहीँ देखा ,योग्यता भी उन्होंने खुद ही दे दी | जो भी उनके सामने आया प्रेम पाकर ही गया | इसी संदर्भ में महाप्रभु ने डाकू नौरोजी का भी उद्धार कर दिया |

श्रीमान गौरांग महाप्रभु एक बार खांडवा देव में देव दासियों को श्री कृष्ण कीर्तन का उपदेश देकर आगे चले| वहां से थोड़ी दूर अब चौरानंदी वन था जहाँ पर डाकुओं का बहुत आतंक था | उन डाकुओं का सरदार डाकू नौरोजी था | लोग उसके नाम से थर थर कांपते थे |डाकू बहुत जालिम था ,उसको किसी पर दया नहीं आती थी |

महाप्रभु ने उस वन में जाने का विचार किया ,गाँव वालों ने महाप्रभु को रोका तथा उन्हें डाकू नौरोजी और उसके द्वारा किये गए जुल्मो के बारे में बताया | फिर भी महाप्रभु ने उसी वन के रास्ते से जाने का विचार किया | महाप्रभु बोले डाकुओं को तो पैसा चाहिए ,हम तो ठहरे सन्यासी ,हमे मारकर उनको क्या मिलेगा ? यदि वे जान ही लेना चाहते है तो ले लें ,यह शरीर किसी के काम आ जायेगा | यह कहकर महाप्रभु वन में घुस गए |थोड़ा आगे गहरे वन में जाकर एक वृक्ष के नीचे बैठकर महाप्रभु ने हरिनाम संकीर्तन गाना शुरू किया | कीर्तन की ध्वनि वन में गूंजने लगी, इतनी सुमधुर आवाज डाकू नौरोजी को भी सुनाई दी ,वह अपने साथियों के साथ वहाँ पर आ गया ,पहले तो उसने महाप्रभु एवम उनके साथियों को चारों तरफ से घेर दिया | परन्तु महाप्रभु एवम उनके शिष्य तो कीर्तन में इतने मस्त थे कि उनको पता ही नहीं था कि उनको डाकुओं ने घेर लिया है | भगवान का कीर्तन ,वह भी स्वयम भगवान द्वारा {महाप्रभु द्वारा} गाया जाये तो असर तो करेगा ही ,और किया भी| डाकू नौरोजी कीर्तन सुनते सुनते महाप्रभु के चरणों में गिर पड़ा |

कीर्तन समाप्त होने पर डाकू नौरोजी ने महाप्रभु को भोजन के लिए आमंत्रित किया तथा आराम करने के लिए अपने स्थान पर चलने का आग्रह किया| महाप्रभु बोले सन्यासी तो पेड़ के नीचे ही रहते है ,तुम प्रेम से हमे जो भोजन खिलाओगे हम खायेगे | प्रभु की आज्ञा पाकर वे लोग सात्विक भोजन ले आये | महाप्रभु तो कृष्ण प्रेम में इतने विभोर थे कि उन्हें अपने शरीर का ज्ञान ही नहीं था| वे प्रेम में गद गद कंठ से कृष्ण कीर्तन में निमग्न थे ,कभी वे अचानक नाचने लगते |नौरोजी का पत्थर जैसा हृदय भी पिघलता गया | वह प्रभु के चरणों को पकड़कर कहने लगा ,”स्वामी जी आप यह कौन सा मन्त्र गा रहे है? मुझे भी इस मन्त्र का उपदेश दीजिये | पता नहीं आपके इस मन्त्र में क्या जादू है ? कि इसने मुझ जसे पापी अत्याचारी को भी बदल कर रख दिया है |मै अपने आप में बहुत परिवर्तन महसूस कर रहा हूँ, कृपया करके मुझे अपनी शरण में ले लीजिये ,आज से मैं यह सब हथियार फेंकता हूँ और वादा करता हूँ कि भूलकर भी अब मै यह गलत कार्य नही करूँगा|”

महाप्रभु ने उसकी आर्त वाणी सुन ली| महाप्रभु बोले, “नौरोजी तुम बहुत भाग्यशाली हो जो इस वृद्धावस्था में तुम्हे वैराग्य हो गया |” यह कहकर महाप्रभु ने उसे हरे कृष्ण महामंत्र की दीक्षा दी तथा उसे हमेशा हरिनाम करते रहने को कहा |
|प्रात : काल उठकर महाप्रभु चलने को तेयार हुए तो देखा ,नौरोजी अपने शस्त्र फेंककर महाप्रभु के साथ चलने को तैयार था| उसने अपने डाकू मित्रो से क्षमा मांगी तथा उन्हें भी यह कार्य छोड़ने को कहा| उसने अपने डाकू मित्रो से कहा कि मुझे भगवान की शरण में जाने दें | महाप्रभु नौरोजी को साथ लेकर आगे बड़े | अन्य सभी डाकु भी अपने अस्त्र शस्त्र फेंककर, हरे कृष्ण महामंत्र गाने लगे |

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे |

जय जय श्री राधे

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