महाप्रभु द्वारा विप्र को आलिंगन

एक दिन श्री कृष्णा चैतन्य महाप्रभुजी रंगजी के मंदिर में दर्शन करने गए| वहाँ उन्होंने देखा कि एक विप्र बड़े प्रेम से श्रीमद भगवत गीता को उल्टा पकड़ कर पाठ कर रहा था और उसकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी| लोग उसपर हंस रहे थे और कटाक्ष कर रहे थे| कोई कह रहा था,” ढोंग कर रहा है, पढना-लिखना आता नहीं लेकिन ऐसे दिखा रहा है कि उसे सारी श्रीमद भगवतगीता समझ आ रही है| देखो तो कभी हंसता है, कभी रोता है, कभी हैरान होता है, कैसे उसे संस्कृत के श्लोक समझ आ सकते है? ये सब नाटक करता रहता है|”

पर विप्र का उधर तनिक भी ध्यान नहीं गया | वह आविष्ट हो लगातार श्रीमद भगवद गीता के पाठ में तन्मय था| महाप्रभु उसका पाठ सुनने उसके साथ ही बैठ गए| महाप्रभु उसके चेहरे के भावों को मन ही मन में पढ़ रहे थे|जब पाठ समाप्त हो गया तो उन्होंने पूछा – “विप्रवर ! आप गीता के कौन से श्लोक के अर्थ को समझकर इतना आनन्दित हो रहे थे?” विप्र ने कहा-“प्रभु मैं मुर्ख हूँ | अर्थ क्या समझूं? गुरु की आज्ञा से गीता का पाठ करता हूँ| पर जितनी देर पाठ करता हूँ, देखता हूँ कि अर्जुन के रथ पर सारथी रूप में श्रीकृष्ण बैठे है| उनके एक हाथ में लगाम है, दूसरे में चाबुक और वे अर्जुन को उपदेश दे रहे है| मुझे श्री कृष्णा के उपदेश सुनाई दे रहे होते हैं| यही देखकर मै परमानन्द का अनुभव करता हूँ|”

विप्र की सरल बात सुन महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए | उन्होंने उसे गाढ़ प्रेमालिंगन प्रदान करते हुए कहा –“विप्र ! गीता पाठ के तुम ही यथार्थ अधिकारी हो| गीता का सार और उसके श्लोकों का सही अर्थ तुम ही ने समझा है|”

महाप्रभु  के साथ आये सभी लोगों ने उस विप्र को दण्डवत प्रणाम किया |

जय जय श्री राधे||

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