Bhagwan ki Charcha- भगवत चर्चा – परमपूजनीय श्री श्री प्रेमधारा माताजी द्वारा

  काम क्रोध पर कैसे नियंत्रण पाएं?

 

आपको तो पता है कि अर्जुन जब महाभारत युद्ध के लिए आगे आये तो बहुत घबराए हुए थे.जब उन्होंने अपने बंधु-बांधवों को देखा तो बहुत घबरा गए.तो अर्जुन खड़े हैं और उन्होंने कृष्ण से कहा कि मै युद्ध नही करूँगा.फिर भगवान ने बहुत सारा उपदेश दिया और बहुत सारी बातें बतायी.और उन बातों के दौरान भगवान ने ये बताया था कि अगर आप अपने नियत कर्मों को दोषपूर्ण ढंग से भी करते हो तो भी वो दूसरों के कर्मों को करने की अपेक्षा अधिक श्रेयस्कर है और दूसरों के जो नियत कर्म है अगर आप उसे करते हैं तो उसमे पाप है.

 

पाप से ही अर्जुन ने पूछा कि भगवान जितने भी लोग हैं वो विद्वान दिखते हैं.सभी को भगवान ने बुद्धि  दी  है , तो फिर लोग पाप करते क्यों हैं.ये जानते हुए भी कि पाप करने से आपको उसकी सजा मिलेगी.चोरी करने से आप पकडे जायेंगे तो सजा मिलेगी और एक-न-एक दिन पकडे जायेंगे.प्रवृत्ति रहेगी तो एक-न-एक दिन तो आप धर ही लिए जाओगे.ये सब जानते हुए भी लोग पाप क्यों करते हैं.

 

तो भगवान ने बताया.बड़ा-ही सुन्दर श्लोक है.

 

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्‌ I(भगवत गीता 3/३७)

 

 

हे अर्जुन इसका कारण रजोगुण के संपर्क से उत्पन्न काम है,जो बाद में क्रोध का रूप धारण करता है और जो इस संसार का सर्वभक्षी पापी शत्रु है.

 

तो क्या सबसे बड़ा शत्रु है? काम,काम है सबसे बड़ा शत्रु.काम की वजह से ही क्रोध होता है.काम होगा नही तो क्रोध भी होगा नही.तो क्रोध का मूल काम है.लोग कहते हैं कि हमें इतना क्रोध क्यों आता है.तो भगवान कहते हैं कि

 

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते ।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥

 

 

काम से क्रोध का जन्म होता है.पहले भी भगवान ने बताया और यहाँ भी बताया.ये काम जो है बड़ा ही भयंकर है.तो भगवान कहते हैं कि काम उत्पन्न ही रजोगुण से होता है.अगर कोई आदमी ये कहे कि नही ये प्रकृति के गुण है वो मुझ पर  नही असर कर पायेंगे.मै निर्गुण हो जाऊंगा.नही ये संभव  नही है.आप ये कह रहे हो कि मै पानी में चौबीस घंटे रहूँगा और मै गीला नही होऊंगा.अगर आप कहोगे कि मै प्रकृति के गुण से छुआ नही जाऊंगा,रजोगुण,सतोगुण,तमोगुण तो ये संभव  नही है.गुण तो आप पर आक्रमण  करेंगे ही.यहाँ आने का मतलब ही है -गुण में आना.

 

और आज की तारीख में अगर आप देखे तो रजोगुण ही ज्यादा दिखेगा..रजोगुण क्या होता है?सकाम कर्म.ऐसा कर्म जिसका आप फल चाहते हैं.है न.और फल भी ऐसा कि प्रतिकूल.अनुकूल फल चाहते हैं.मेरे अनुकूल हो. वो मेरे लायक काम है.तो जब हम फलकांक्षी हो जाते है और तब हम कर्म करते हैं तो हम रजोगुणी कहलाये जाते हैं.उसमे हम बहुत उद्यम करते हैं,बहुत मेहनत करते हैं अतिरिक्त कमाने के लिए, विलासपूर्ण जीवन जीने के लिए,बहुत मेहनत करते हैं.

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हम तो करते ही है और हमारे अब बच्चे पैदा होते हैं तो हम सोच लेते हैं कि इसको क्या बनाना है.उसके लिए कोई लाइन सोच लेते हैं कि उससे ये मेहनत कराना है.उसे शुरू से ही कराना है. सभी रजोगुणी हैं, सभी तो सभी कामी हैं.प्रतिफल क्या है काम,कामनाएं और कामनाओं का कोई अंत नही होता.कामनाएं कभी सीमित नही होती.

 

समुद्र का शायद कोई अंत है पर कामनाओं का कोई अंत नही.

 

जब कामनाएँ पूरी नही होती,जब आपकी इच्छाएं अपूर्ण रह जाती है तो आपको तो पता नही चलता.आप बोल देते हो कि चलो मैंने समझोता  कर लिया.मगर कही से अंदर मस्तिष्क के पीछे  वो दर्द सालता रहता है.और वो जो दर्द है आपको वो भी आभास नही होता कि आपको दर्द साल रहा है.बस कभी-कभी विचार उस तरफ जा रहा है और अचानक ही बच्चा कुछ गिरा दे तो,आपने  एक लगाया उसे खींच के.क्यों?क्योंकि आप अपनी कामनाओं के अपूर्ण होने से चिंतित है मगर आप कह रहे हैं कि नही कोई फर्क नही पड़ता.लेकिन पड़ रहा है.फर्क पड़ रहा है क्योंकि आपने रजोगुण ही अपने आप में विकसित किया है.तो पड़ेगा फर्क और वही पर आप बच्चों पर या किसी पर गुस्सा निकाल दोगे. क्यों? क्योंकि रजोगुण आपने अपने अंदर पूरी तरह से भरा हुआ है.

 

वो भगवान ने नही भरा. कही आप ये कहे कि भगवान ने तीनों गुण बनाए तो उसमे हमारा क्या दोष है.भगवान तो कहते हैं कि

निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । (भगवद्गीता ,2.45)

तीन गुणों से ऊपर उठो अर्जुन.

 

वो तो अर्जुन के माध्यम से आपको भी कह रहे हैं कि तीनों गुणों से ऊपर उठो.मेरी भक्ति करो और तीनों गुणों से ऊपर उठ जाओ.पर हम उसे अंगीकार ही नही करते.स्वीकार ही नही करते.कृष्ण को स्वीकार नही करते और सब कुछ स्वीकार करते हैं.कृष्ण को भी स्वीकार करते हैं तो मामला गडबड है.तब गुण तो आयेंगे ही.

 

तो भगवान कहते हैं कि जब काम पूर्ण नही होता तो क्रोध उत्पन्न होता है और क्रोध से आप देख लीजिए-दुनिया में जितनी लड़ाइयां हुई हैं घर से लेकर के नगर,नगर से ले करके देश तक,देश से ले करके विश्व तक,उसके मूल में क्या है ?आप बताओ क्या है?काम,लोभ,क्रोध है.और क्या है?भगवान कहते हैं:

 

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्‌॥ (भगवद्गीता,16.21)

 

 

काम,क्रोध,लोभ.ये क्या हैं?नरक के द्वार हैं जो आत्मा का विनाश कर देते हैं.

ये तीनों ही भयंकर हैं पर उनमे सबसे भयंकर है काम.अगर हम काम के वशीभूत नही होते तो क्रोध भी नही होता,लोभ भी नही होता.लोभ कहाँ से होता है?कामनाएं हैं.उसे स्वीकार करने के लिए,किसी भी तरह उसे अपने अधीन करने के लिए ,हमारी कामनाएं पूरी हो इससे लोभ जागृत होता है.है कि नही.और नही पूरी हो तो क्रोध जागृत होता है.तीनो ही तरह से फंसे हुए हैं हम.

 

 

भगवान कहते हैं कि यही संसार का सर्वभक्षी पापी शत्रु है.

 

अगर कामना न हो तो कोई चोरी क्यों करे.सोचिये.अगर कोई खेती करता है और भगवान का भजन करता है तो इतना तो कमा ही लेता है कि अपना घर-बार चला सके.लेकिन मोबाइल , फिल्मे गाँव में भी पहुँच गयी हैं.तो फिल्मों में दिखता है.फिल्मो में क्या दिखता है?अगर गाँव का भी कोई दृश्य दिखा रहा है तो कई बड़े-बड़े कमरे हैं,बड़ा-सा दालान है,पीछे बागान है,आगे बागान है.इतना ऐश्वर्य और वैभव दिखा रहा है कि वो बेचारा गावं के कोने  में बैठा है वो भी देख रहा है और सोच रहा है कि ऐसा मेरा क्यों नही हो सकता.आप समझ रहे हैं.भाई ये भी तो किसान है और मै भी किसान हूँ.

 

फिर काम जन्मा.काम जन्मा तो उसने सोचा कि भाई यहाँ तो बात बनेगी नही.तुम लोग यही रहो.तुम खेती करना और मै जाता हूँ मजदूरी करने.दिल्ली.पंजाब,हरियाणा कही भी.वहाँ जा कर  के कमाऊंगा और यहाँ भेजूंगा तो बड़ा-बड़ा हमारा खेत होता चला जाएगा.और हमारी भी एक दिन सारी कामनाएं पूरी होंगी. तो परिवार का बिछोह  हो गया.परन्तु कामनाये पूरी नहीं हुई i

 

 

तो भगवान यही कह रहे हैं कि यही काम जो है सर्वभक्षी शत्रु है.तो देखिये भगवान ने आपको बता दिया,पता चल गया शत्रु है.अब मान लो अगर आपको पता चल जाए कि आपका शत्रु सामने है और वो आपको कभी भी नुक्सान कर सकता है.कभी भी.तो नीति ये कहती है कि उस शत्रु का दमन कर देना चाहिए ताकि वो आपका नुक्सान न कर पाए और दमन कैसे भी हो सकता है.प्रेम से भी उसे आप दोस्त बना सकते हैं.या अगर आप रजोगुणी,तमोगुणी हैं तो उसे मरवा भी सकते हैं.है कि नही.यदि आप भगवान के भक्त हैं तो आप कहते हैं कि इसे भक्त ही बना दो फिर शत्रु रहेगा कहाँ.मेरा दोस्त बन जाएगा.है कि नही.भक्तों का संग प्राप्त हो जायेगा.

 

तो  शत्रु का दमन करने के लिए ये जरूरी है कि पहले ये पता चले शत्रु है कहाँ.काम को समाप्त करने के लिए ये जरूरी है कि पहले ये पता चले काम रहता कहाँ है.कहाँ हैं हमारी कामनाएं?कहाँ रहती है?कहाँ वास करती हैं?तो भगवान इसके बारे में बताते हैं कि

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥

बहुत सुन्दर बात कहते हैं भगवान.अभी शत्रु के बारे में कि शत्रु है कहाँ.भगवान कहते हैं कि जो जीवात्मा है वो है तो क्या? ज्ञानमय है.लेकिन उसका जो ज्ञान है वो काम की विभिन्न मात्राओं द्वारा ढक दिया जाता है.अब जरूरी नही है कि हर व्यक्ति में एक ही प्रकार की कामनाएं हो,हो सकता है कि जो गरीब आदमी है जिसके पास एक साइकिल है वो कहेगा कि एक स्कूटर से काम चल जाएगा.हो सकता है कामना इतनी-सी हो.दूसरा जिसके पास गाड़ी है वो कहेगा ये गाड़ी अब बेकार हो गई है.अपने को मर्सिडीज ही चाहिए.बहुत बड़ी कामना हो गई.समझ रहे हैं.तो कामनाओं की विभिन्न स्तर,विभिन्न मात्राएं और वो कामनाओं की विभिन्न मात्राएं हमारे ज्ञान को क्या कर लेती हैं?आवृत्त,आच्छादित कर देती है.

 

आप ज्ञानी हो पर आपका ज्ञान किसी काम का नही रहता क्योंकि कामना उस पर कब्ज़ा जमा लेती है.तो भगवान कहते हैं कि ये क्या होता है.नित्य होता है.ये नही कि आज कामना ने आपकी चेतना पर कब्ज़ा जमाया, अभी सो जाओगे और सुबह उठोगे तो ऐसा नही होगा.सोये रहोगे तो भी वो वही जमी रहेगी.और गहरी  हो जायेगी,आप पागल हो जाओगे उस कामना को पूर्ण करने के लिए,है न.कैसे करूँ,कैसे करूँ.

 

जीवन जो इतना अनमोल है.इतना अनमोल मनुष्य जीवन वो यही सोचने में बीत जाए कि अपने इस काम को कैसे पूरी करूँ.फिर दूसरी शुरू हो जाये,इसे कैसे पूरी करूँ,फिर तीसरी शुरू हो जाए. क्योंकि मनुष्य जीवन कामनाओं को पूरा करने के लिए नही मिला.मनुष्य जीवन मिला है भजन करने के लिए,भजन ही करने को मनुष्य जीवन मिला है.और ये यही एक बात सब लोग नही जानते.ये बड़े दुःख की बात है.बड़े-बड़े कॉलेज ,बड़े-बड़ी सभागार,बड़े-बड़े सरकारी संस्थान कोई नहीं बताता कि मनुष्य जीवन क्यों मिला हैं ?

 

भगवान का भजन ही एकमात्र तात्पर्य है एक मनुष्य जीवन का,यह कोई नहीं बताता 1 

 

लेकिन अगर हम अपना सम्पूर्ण जीवन कामों को पूर्ण करने में लगा देंगे तो क्या होगा?क्या होगा?एक-न-एक दिन  मनुष्य जीवन की समाप्ति हो जायेगी.

 

इंसान चला जाएगा मगर क्या कहते हैं:

आशा ,तृष्णा न मरी ,मर-मर गए शरीर
अग्नि के समान ये जलता रहता है काम.

 

जलता है.ये इसका गुण है.और ये कभी तुष्ट नही होता.ये दूसरा अवगुण है.आपने सोच लिया कि चलो कोई नही एक मकान की तो बात है.दुकान की तो बात है फिर मै बहुत खुश रहूँगा,तो भगवान हँसते हैं.कहते हैं कि  तुम खुश नही रह सकते.पहले तो ये दुखालायम है.यहाँ खुशी है ही नही.अब तू मकान कर ले या दुकान , छः महीने से पहले ही सब बराबर हो जाएगा.शायद उससे बहुत पहले ही एक और  कामना   सिर उठा देगी.दुकान में ये नही है.शटर उस तरह का नही पड़ा.ताला ऐसा लगाना था.अभी अगर मेरे पास वो भी होता CC TV होता तो कितना अच्छा होता.कामनाये बढ़ती जायेंगी,बढती जायेंगी.उस दुकान के ही अंदर में बड़ी कामनाएं ,छोटी-छोटी कामनाएं जन्म ले लेंगी.आप उन्ही को पूरा करने में लग जाओगे.

 

और फिर आपसे कहेंगे कि भजन कर लो तो आप कहेंगे कि समय  नही है.दुकान कौन करेगा.है न.तो ये बड़ा दिक्कत है.जबकि मै आपको बताती हूँ कि भजन ऐसी चीज नही है जिसके लिए आपको सब कुछ छोड़ देना पड़े.भजन तो बड़ी आसानी से होता है पर उसके लिए अभ्यास करना होता है.जैसे कि मै आपको एक उदाहरण  देती हूँ:-

 

एक व्यक्ति थे.वो इतने भजन में पक्के थे,इतने भजन में पक्के थे.वो कुछ नही करते थे न पूजा,न पाठ.वो सिर्फ माला लेते थे और हरे कृष्ण महामंत्र भजते रहते थे.और इतना ध्यान से भजते थे.इतना बोलते थे,इतना बोलते थे कि जब वो माला रख देते थे तो भी उनका मुँह चलता था.जब वो सो जाते थे तब भी उनके बोल चलते रहते थे.अगर वहाँ तक पहुँच जाओगे कि आप सो रहे हो तो भी आपके  मुँह पर नाम चल रहा है.तो  फिर चिंता करने कि बात ही नही है.फिर मौत कैसे भी आ जाए.नाम तो चल रहा है न.बात समझ में आ गयी.यही है. ये है अपनी  परीक्षा . वहाँ तक पहुँचाना है कि कृष्ण नाम के बिना  एक क्षण भी खाली नही हो I

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तो भगवान कहते हैं कि ये आग के समान जलता है .आपने कभी में पेट्रोल डाला है.घी डाला है.कभी यज्ञ किये होंगे अपने घर छोटे-छोटे.तो पंडित जी क्या करते हैं.जब आग जलता है तो उसमे बहुत सारा घी डाल देते हैं कि और अच्छे से आग जले.और भडके.तो जितनी कामनाओं की पूर्त्ति होती है,इसका मतलब वो आग में घी के समान है.और कामनाएं बढ़ जाती है.और बढ़ जाते हैं.

तो कामनाएं जो हैं वो बड़ा ही भयंकर रूप दिखाती है और भगवान ने यही बात यहाँ पर बतायी है कि अग्नि की तरह ये जलती रहती है और कभी भी संतुष्ट नही होती.और आगे बताते हैं भगवान कि कामनाएं रहती कहाँ हैं.ये बहुत महत्वपूर्ण है.ये बड़े ही ध्यान से सुनो.कामनाएं रहती किधर हैं?यानि कि जब तक आपको ये नही पता चलेगा कि आपके शत्रु रहते किधर हैं आप उन्हें मारोगे कैसे और काम आपका सबसे बड़ा शत्रु है कृष्ण कह चुके हैं.

 

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्‌ ॥(भगवद्गीता,3.47)

कहाँ रहते हैं.तो कृष्ण कहते हैं

 

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्‌ ॥(भगवद्गीता,3.40)

 

 

इन्द्रियाँ,मन और बुद्धि इस काम के निवासस्थान हैं.

 

यानि एक चीज साफ  हो गयी कि आत्मा में काम नही रहता.आत्मा जो भगवान का सचिदानंद अंश है वो काम का नही हो सकता. यानि आत्मा ऊपर है.

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥

 

आत्मा इन्द्रियाँ,मन,बुद्धि इन सबसे बहुत ऊपर है.बहुत ऊपर उसका स्थान है.तो ये अच्छी बात हो गई कि जो असली नियंत्रक   है वो इससे आवृत्त नही होता.लेकिन देखिये आगे क्या गडबड होती है.इन्द्रियाँ ,काम यहाँ है.इन्द्रियों में .गौर करिये.इन्द्रियाँ क्या करती हैं अपने-अपने विषय के पीछे-पीछे भागती रहती हैं.अब आप गौर करोगे.मै सोचती हूँ इस बारे में.हमारी कितनी ज्ञान इन्द्रियाँ हैं.पाँच ज्ञान इन्द्रियाँ हैं. और उनमे से चार ज्ञान इन्द्रियाँ किधर हैं.सिर्फ इतने से भाग में .ये सिर इसमे ज्ञान इन्द्रियाँ भरी पडी हैं.सोचो.दो आँखें,नाक,कान,जिह्वा ,जिह्वा जो कि आपको स्वाद का पता बताती है ये ज्ञान इंद्रि हैं.आँख से आप रूप का रस प्राप्त करते हो,नाक से आप गंध का रस प्राप्त करते हो,कान से शब्द जा रहे हैं.ज्ञान प्राप्त हो रहा है.त्वचा जो कि पूरे  शरीर  में है, लेकिन कही आप देखना जब आपको कोमल-कोमल बच्चा दिखता है तो आप उसके गाल सहलाते हो.समझ गए मतलब वो पंचों ज्ञान इन्द्रियाँ यहाँ पर है.ठीक है न.

 

तो ये चार चीजें भगवान ने बनाई.वही मै आपको बता रही थी कि ये सिर जो है सबसे महत्वपूर्ण  है.अब इसका मतलब ये नही है कि पैर महत्वपूर्ण नही है.अगर आपको यहाँ से उठकर वहाँ जाना है तो पैर ही से जाईयेगा ,सिर से तो नही जा सकते न.पैर से ही जाईयेगा लेकिन अगर गर्दन कट गई तो पैर कुछ नही कर सकता.पैर नही है तो आप जी सकते हो पर अगर सिर नही है तो क्या आप जी सकते हो?पेट भी खराब है तो जी सकते हो.अगर दिमाग खराब है तो कुछ काम ही नही होगा.मनुष्य जीवन का जो उद्देश्य है वो तो भूल ही जाओ बेसिक  काम ही नही कर सकते.अपना ही देखभाल नही कर सकते.तो ये बहुत इम्पोर्टेंट  है कि भगवान ने पाँचों ज्ञान इन्द्रियाँ यहाँ बना दी है सिर में.है कि नही.ज्ञान इन्द्रियाँ मुख्य है.बाकी तो कर्म इन्द्रियाँ हैं.ये दो हाथ हो गए,दो पैर हो गए,गुदा,उपस्थ और ये जुबान हो गई जिससे खाते हैं.ये कर्म इन्द्रियाँ है.

 

तो भगवान कहते हैं भैया इन्द्रियों में ये काम रहता है.इन्द्रियाँ क्यों भागती है अपने विषयों के तरफ?काम के कारण.आँखों को सुन्दर-सुन्दर दृश्य चाहिए.कान को सुन्दर-सुन्दर शब्द सुनना है.समझ रहे हैं.कानों को और भी अच्छा-अच्छा सुनना है.नाक को और भी अच्छा सूंघना है.जुबान को और भी अच्छा स्वाद  चाहिए.

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दूसरी बात फिर बोले क्या?मन.इन्द्रियों के पीछे भाग रहा है मन.ये हमारी आज की हालत है.इन्द्रियाँ जहाँ भाग रही हैं वही मन भाग रहा है.मन के पीछे इन्द्रियाँ नही भाग रही हैं.होना ये चाहिए.इन्द्रियाँ जहाँ भागना चाहती हैं मन भी वही भाग रहा है.इसलिए आत्मा को भी भगाए ले जा रहा है,बुद्धि को भी भगाए ले जा रहा है.बुद्धि भी दासी हो गई.यानि कि बॉस किसी कंपनी  का अपने सबसे नीचे काम करने वाले का गुलाम हो गया तो उस कंपनी  का क्या  होगा? वो तो डूब जायेगी.है कि नही.तो बॉस  सबको अपने काबू में रखे तब बात है न, लेकिन कंपनी  डूबेगी जब बॉस  सबसे नीचे काम करनेवाले का गुलाम हो जाएगा.आत्मा जब इन्द्रियों की गुलाम हो जायेगी तो आप गए.आप डूब गए.

 

आज ये खाने का मन कर रहा है आप बोलोगे कि कोई जरूरत नही है खाने की.आत्मा बोलेगी नही मै तो कृष्ण का अंश हूँ अगर कुछ  परहेज करने से  कृष्ण मिल जाते हैं.मै इस मार्ग पर बढ़-चढ निकलता हूँ.मुझे दीक्षा मिल जाते है,मुझे गुरु मिल जाते हैं तो ये तो बहुत छोटी-सी कुर्बानी है.
प्याज,लहसन,मांस ये छोड़ना कौन-सी बड़ी कुर्बानी है.बताइए.जहाँ आपको इस बात कि गारंटी है कि ,अपने देह को त्यागने के बाद आपको भगवद्धाम प्राप्त होगा.गुरु,कृष्ण प्राप्त होंगे.बोलते हैं न :

ब्रह्माण्ड भ्रमिते कौन भगवाने जीव 
गुरु कृष्ण प्रसादे पाए भक्तिलता बीज.

कि भाई ब्रह्माण्ड में जीव करोडो-करोडो वर्षों से भटक रहा है.क्यों भटक रहा है?क्योंकि उसे सद  गुरु नही मिले.उसे कृष्ण प्रसाद नही मिला.था सब कुछ पर जब उसने बुलाया तो आपने पीठ दिखा दी.अनसुना कर दिया भगवान ने कहा जा.भटक चौरासी लाख योनियों में.ऊपर-नीचे,ऊपर-नीचे.वही हमारे साथ हुआ इसलिए हम यहाँ पर हैं और सारे दुःख झेल रहे हैं.और वही वाली बात है कि यहाँ बैठकर लगता है कि वो सुखी है.वहाँ बैठकर लगता है कि वो सुखी है.पर आप उधर-उधर जाओ तो लगेगा वही दुखी है.सबसे ज्यादा दुखी है.आपका दुःख बहुत कम है.ठीक है.कोई गाना भी है:

लोगों का गम देखा तो अपना गम भूल गया 

ऐसा कुछ.

भगवान ने कहा है इन्द्रियाँ,मन और बुद्धि.अब आईये बुद्धि पर.बुद्धि का काम क्या है?निर्णय लेना.सही-गलत का फैसला.लेकिन बुद्धि अगर भटक जाए.सही-गलत का फैसला न कर पाए.इन्द्रियों ने उस पर अधिकार जमा रखा है.फिर बुद्धि तो बेकार है.आप तो कुछ निर्णय नही ले  पा रहे हैं.भाई आपकी जुबान आपको ले जा रही है मदिरालय,शराबखाना .मन भी साथ हो लिया और बुद्धि भी कहती है चलो.बीबी बोलती है सुनिए न महीने का अंत है.मेरे हाथ में पैसे नही है.मकान मालिक को किराया देना है.उस आदमी को बुद्धि है फिर भी जा रहा है.क्यों?इन्द्रियाँ ले जा रही हैं.जुबान के पीछे-पीछे जा रहा है.जुबान लटकाते हुए जा रहा है बेचारा.इन्द्रियों के पीछे मन गया.बुद्धि गई.आत्मा भी चली गई.घोर सत्यानाश हो गया.आत्मविनाश हो गया.

अब दूसरी बात.भगवान बोले कि ये जो हैं काम के निवासस्थान हैं.सबसे ज्यादा काम आपका रहता है इन्द्रियों में,फिर मन में,फिर बुद्धि में.इनके द्वारा ये काम जीवात्मा के वास्तविक ज्ञान को ढंककर उसे मोहित बना देता है.नचा देता है.नचा.भगवान बोलते हैं न.मुझे बड़ी हँसी आती है कृष्णा जब बोलते हैं.बोलते हैं.
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥(भगवद्गीता,18.61)
आपने कभी वो देखा है गोल-सा झूला.देखा है,उसमे लोगों को देखा होगा बैठे हुए.उसके बीच में एक आदमी होता है.वो क्या करता है.वो बीच में होता है.वो आदमी नही घूम रहा होता है.क्या घूम रहा है.पहिया  घूम रहा है.उसमे जो सवार है वो घूम रहा है.बीच में वो तेज कर देगा और सारे बच्चे चिल्लाने लगेंगे अरे कम करो,कम करो.समझ रहे हैं आप.कोई आँख बंद करके बैठा है .मुझे वही याद आ जाता है जब कृष्ण कहते हैं कि
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न तिष्ठति।

भगवान सभी लोगों के ह्रदय में बैठे हुए हैं.
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥
माया का जो यन्त्र है उसपर मैंने सब को बिठा दिया है क्योंकि आपने माँगा था कि मुझे बैठना है.बच्चे को कोई जबरदस्ती नही बिठाया झूले पर.बच्चे ने बोला कि मुझे जाना है,जाना है,जाना है.तो पिता  ने बोला कि चल झूल ले,बैठ जा.तो भगवान ने बिठा दिया माया के यंत्र में.
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥
यानि मै घुमा रहा हूँ.बीच में जो आदमी है वो कृष्ण हैं और सबके ह्रदय में बैठे हैं.देख रहे हैं कि कौन चिल्ला रहा है,किसको दुःख हो रहा है और कौन है जो झूले से उतरना चाहता है क्योंकि झूले से उतरने कि इच्छा होगी तभी तो उतारेंगे.कोई मजा ले रहा है,कोई चिल्ला रहा है.जो चिल्ला रहा है कि बहुत दुखालायम है,अशाश्वत है,प्रभु यहाँ बहुत दुःख है,प्रभु मै आपके नाम की माला करता हूँ,आप मुझे ले जाओ.

भगवान कहते हैं ठीक है.
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्‌ ॥(भगवद्गीता,12.7)

भगवान कहते है.देखो,गौर से सुनो.उसमे भी तुम्हे मेरे ही बारे में सोचना होगा,आप उस आदमी के बारे में सोच रहे हो,उसे कह रहे हो कि भैया झूला रोको.अगर आप किसी और आदमी से कह रहे हो,Mr X,Mr Y से तो झूला नही  रूकेगा.आप वो आदमी जो है बीच में.जो चला रहा है.उसे बोलोगे कि भैया झूला रोको तो उसे दया आयेगी,बार-बार हाथ जोड़कर पार्थना करनी होगी

हरे कृष्ण  हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 
हरे राम  हरे राम राम राम हरे हरे.

फिर भैया ने रोक दिया झूला कि उतर जाओ तुम.इसीतरह जब आप प्रार्थना  करते हैं और हरे कृष्ण महामंत्र जाप करते हैं.भगवान उसी को सुनते हैं .उसी को सुन पाते हैं कलयुग में.उसी को सुन के निर्णय  लेंगे.तो जब आप महामंत्र जपते हैं तो भगवान जो हैं वो झूला रोकते हैं आपके लिए और उतार देते हैं कि भैया चलो मेरे पास आ जाओ.नीचे आ जाओ.जमीन पर आ जाओ.जहाँ तुम्हे डर न लगे.तो क्यों आना चाहता है बच्चा?क्योंकि यहाँ डर नही लगेगा.यहाँ सबको जानता हूँ.ये परिवेश जानता हूँ.यहाँ चक्कर नही आएगा.इसीलिए बच्चा जमीन पर आना चाहता है.

तो भगवान ये बोले कि इन्द्रियाँ,मन और बुद्धि में काम निवास करता है.मुझे आप बताओ अगर आपको इन तीनो में से किसी को नियंत्रित  करना है तो किसे नियंत्रित  करना चाहिए.देखिये बड़े गौर से सुनिए बहुत बड़े आचार्य का कथन है उसको दुहराती हूँ.उन्होंने भगवान की समस्त वाणी,श्रीमद भागवतम वगैरह के आधार पर ये निर्णय लिया है कि इन तीनों में से आप मन को नियंत्रित  कर सकते हैं क्या?अर्जुन नियंत्रित  कर पाया?अर्जुन ने क्या कहा.
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्‌ ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्‌ ॥(भगवद्गीता,6.34)
जब अर्जुन जिन्होंने शंकर जी को हरा दिया.समझ रहे हैं युद्ध में.बड़े-बड़े देवी-देवता उनसे हार मान गए.मन को क्यों नही नियंत्रित  किया.अरे इन्द्र जी के यहाँ गए थे तो उर्वशी आयी थी उनके पास.बड़े-बड़े विश्वामित्र वगैरह उनकी तपस्या डगमगा जाती है.वहाँ पर अर्जुन जो गृहस्थ था,इस रस से वाकिफ था.वो बोलता है कि माता आप कैसी हैं.वो कहती हैं कि माता! हम अप्सराएं हैं,माता किसी की नही होती.नही आप हमारे पिता इन्द्र के कक्ष में रहती है,आप माता हैं मेरे लिए.आप समझ रहे हैं.वो अपने मन पर कितने अच्छे से काबू रखे हुए थे.वो अर्जुन कहते हैं कि मन पर नियंत्रण  नही हो सकता.आज के कलयुगी जीवों की तो बात ही नही कर रही हूँ मै.

मै तो अर्जुन की बात कर रही हूँ.अर्जुन ऐसे जो कि सोते थे न तो उनके हर इन्द्रिय में से भगवान कृष्ण का नाम निकलता था.इसलिए वो कृष्ण के सबसे प्रिय पार्षद हैं.सोते हैं तो भी भगवान का नाम मुख से निकलता रहता है.समझ रहे हैं आप.इतने बड़े भक्त हैं अर्जुन.कोई छोटे व्यक्ति नही हैं.बहुत बड़े भक्त हैं .वो कहते हैं कि मेरे से तो मन ही नही नियंत्रित होता
अभ्यास करो

तो शुरुआत में इन्द्रियाँ  नियंत्रित  करनी होंगी.जब इन्द्रियाँ एकदम कण्ट्रोल होगी तब  मन  कंट्रोल  होगा.और मजे की बात बताऊँ.आप सोचोगे कि इन्द्रियों को मै एकदम से कंट्रोल  कर लूं तो वो भी संभव  नहीं ,भगवान बड़ा सुन्दर इसका तरीका बताते हैं:
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते ॥(भगवद्गीता,2.59)
भगवान कहते हैं कि ऐसा संन्यास लेने से कोई फायदा नही कि आपने गेडुआ वस्त्र धारण कर लिया पर मन आपका मचल रहा है हर चीज के लिए.समझे.वो है पोंगापंथी.नरक में स्थान मिलेगा,नरक.

वो व्यक्ति ज्यादा अच्छा है जो घर पे रह के बच्चों की तिमानदारी कर रहा है,घर चला रहा है पर मन कृष्ण में लगा रखा है.वो व्यक्ति बेहतर है,जंगल में जाके बैठने की जरूरत नही है. आप जो भी कीजिये निरासक्त   होकर कीजिये.आसक्ति  सिर्फ कृष्ण से,यानि कि अपनी सारी जो इन्द्रियाँ हैं वो कहाँ लगा दीजिए परम रस में लगा दीजिए,कृष्ण में.

अब सुन्दर कोई व्यक्ति आ रहा है और आप आँख को कहोगे कि मत देखो तो ऐसा हो नही सकता.लेकिन आप देखो और कहो कि भगवान आपमें  कितनी सुंदरता भरी है.ये तो तुम्ही कर सकते हो.तुम क्या कलाकार हो.समझ गए.एक आदमी कह रहा है , कितनी सुन्दर है ये.दूसरा कह रहा है कि भगवान तुम कितने महान हो.तुम्हारे हाथ कितने ख़ूबसूरत हैं.इतने सुन्दर शरीर को आपने बनाया.

जैसे कि एक कुम्हार है जिसके पास आप घड़ा लेने जाते हैं तो एक को देखकर आप कह पड़ते हैं कि  कितना सुन्दर घड़ा है.फिर आप कुम्हार को कहेंगे कितना सुन्दर तुमने बनाया.क्या किया,कैसे किया.एक अजीब ही पिस है आप तारीफ़ जरूर करेंगे.और दूसरा आदमी कहेगा कि घड़ा बहुत सुन्दर है.मै लेकर के जा रहा हूँ.समझ रहे हैं.अपने भोग के लिए.एक जो है थोड़ा भगवदभावनाभावित  आदमी है,मानवीय है वो कहेगा कि कितनी मेहनत की है तुमने.

समझ रहे हैं.दोनों ने ही देखा.पर एक ने जोड़ दिया.जोड़ दिया.तो आँख करेगी वही काम लेकिन जोड़ के.ये जोडने की कला आपको सीखनी है.इसीप्रकार से कुछ पी रहे हैं,कुछ खा रहे हैं तो ऐसे ही खा लेंगे अपने लिए तो पाप है.

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्‌ ॥(भगवद्गीता,3.13)
जो व्यक्ति अपने लिए खाना पकाता है वो पापी है.

यदि अपने लिए खाना आप पकोगे,अपने मजे के लिए तो आप पापी हो.अगर यज्ञशिष्टा भगवान का छोड़ा हुआ खाना यानि कि भगवान को भोग लगा के,उनका प्रसाद आप लेंगे तो आपके सारे पाप नष्ट हो जायेंगे.ये जानकारी.बताओ भगवद्गीता में दे रखा है तृतीय अध्याय में.

लेकिन या हमें पता नही होता या पता होता है तो हम उसे गंभीरता  से  नही लेते या हम शास्त्रों में से अपने लिए छाँट-छाँट कर चीजें निकाल लेते हैं.ये भी समस्या  है हमारी.जो अपने को सूट  करे.अरे ये तो बहुत कठिन है,ये भी कठिन है,ये भी कठिन है.हाँ ये वाला ठीक है.फिर मामला गडबड हो गया इसलिए कृष्ण कि बात को सीधा  लेना सीखो.इसलिए आपको मै कहूँगी कि जोडने कि कला आप तभी जान सकते हैं ,भगवान से तभी जुड सकते हैं जब आप भगवान का नाम लेना शुरू कर देंगे

जय जय श्री राधे||

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