About Chaitanya Mahaprabhu

भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु

                                          इस घोर कलह के युग में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण, पात्र या कुपात्र हर एक को प्रेमाभक्ति प्रदान करने के लिए, महा-उदार प्रेमावतार श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए। श्री चैतन्य महाप्रभु ,भगवान श्री कृष्ण के प्रछन्न अवतार है । जिन्होंने तीनों लोकों में प्रसिद्ध, भगवान के ‘पवित्र पावन’ नाम की, अपनी विभिन्न लीलाओं में महिमा उजागर की। हरे कृष्ण संकीर्तन आन्दोलन के माध्यम से जगत को भगवत्प्रेम से आप्लावित कर दिया। भारत के बंगाल प्रान्त के नवद्वीप नगर के श्रीधाम नबद्वीप में लगभग ५०० वर्ष पूर्व, भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु अवतरित हुए।

भगवान श्री कृष्ण ने ५००० वर्ष पूर्व द्वापर युग में अपने लीलावतार में अपने भक्तों के उद्धार और धर्म की स्थापना हेतु अनेकानेक लीलाएँ की। ब्रजधाम में अपनी आकर्षक लीलाओं द्वारा गोप-गोपिकाओं के शुद्ध निष्काम प्रेम को दर्शाया। भगवद्गीता के माध्यम से प्रत्यक्ष उपदेश दिया कि,

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

अर्थात,
”संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण (इसी अध्याय के श्लोक 62 की टिप्पणी में शरण का भाव देखना चाहिए।) में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर॥”

परन्तु ब्रजवासियों के अतिरिक्त कोई भी भगवान की प्रेमाभक्ति को समझकर इस सत्य को आत्मसात नहीं कर पाये और भगवत्प्रेम-रस के आस्वादन से वंचित रह गये। भगवान की ऐश्वर्य-युक्त भक्ति के परे, उनके माधुर्य के आस्वादन को भक्त जान ही नहीं पाए।

इसीलिए श्रीकृष्ण अपने ही माधुर्य का आस्वादन स्वयं करने के लिए और पूर्ण जगत को भगवत्प्रेम प्रदान कर के प्रेमाभक्ति से आप्लावित करने के उद्देश्य से, कलियुग में महाकरुणामयी अवतार श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए।

चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं जीवनभर भक्ति का व्यवहारिक आचरण कर के भक्ति की शिक्षा दी। प्रेमाभक्ति को जीवन भर आचरण में किस प्रकार लाया जाये, पूर्ण व्यवहारिक रूप से अनुकरण किया ।

और इस प्रकार चैतन्य महाप्रभु के रूप में, कृष्ण के प्रति, राधारानी के भाव में प्रगाढ़ प्रेम और व्याकुलता का, भगवान कृष्ण ने स्वयं भी आस्वादन किया।

संकीर्तन आन्दोलन द्वारा सम्पूर्ण भारत-भ्रमण के दौरान, पात्र या कुपात्र का भी ख्याल न करते हुए राह में आये हर प्राणिमात्र को अपना प्रेम प्रदान किया। पापी से पापी व्यक्तियों को भी अपने भगवत्प्रेम रस में डुबो दिया। श्री चैतन्य महाप्रभु ने हम कलिहत जीवों के लिए, भगवान के ‘पतित-पावन’ नाम की महिमा को उजागर किया।  दो महा-पतित व्यक्तियों जगाई-मधाई का उद्धार कर के भगवान के पवित्र नाम का महात्मय  प्रस्तुत किया। समस्त पापमय कृत्यों में धुत होने के बावजूद भगवन्नाम का आश्रय लेते ही महाप्रभु ने उनका आलिंगन किया।  और अपनी शरण में ले लिया।

एकमात्र उनकी शरण में आये प्राणियों को, उनके समस्त पापों से मुक्त कर देने के अपने वचन का, भगवान ने जीवंत दृष्टान्त प्रस्तुत किया। उनकी इस लीला से हम भी पवित्र भगवन्नाम की शरण ग्रहण करें और भगवत्प्रेम के रस का आस्वादन कर पायें। भगवान की ऐसी कृपा हम सभी को प्राप्त हो, यही हम सब के लिए प्रेमधारा मा का आशीर्वाद है  

आगे देखते है माताजी चैतन्य महाप्रभु के बारे में क्या बताती है ।

                                                         

निमाई की भोग लीला

 

सूत्रधार        
एक बार श्री गोपाल के परम भक्त एक ब्राह्मण घूमते हुए जगन्नाथ मिश्र के घर में आये.  निमाई घर में ही खेल रहे थे. चेतन्य महाप्रभु का जन्म नीम के वृक्ष के नीचे हुआ था अत: माँ ने उनका नाम निमाई रख दिया थाआइये देखे निमाई की मधुर लीला.

 

जगन्नाथ मिश्र 
“आइये- आइये ब्राह्मण देवता.  आपका स्वागत है.  कृपया जल लीजिए.  भोजन का समय हो रहा है, ये लीजिए भोजन सामग्री, भोग बनाकर कृपया इसे ग्रहण करे .”

(ब्राह्मण भोजन सामग्री लेकर भोजन बनाकर ले आया )

 

ब्राह्मण
“भोजन तैयार हो गया है, बाल गोपाल को प्रेम से भोग तों लगा लू.”

(ब्राह्मण भोग लगाने के लिए ध्यान मै बैठ गया )
(वैसे ही श्री निमाई ने भोग आरोगना आरम्भ कर दिया)

 

ब्राह्मण 
“अरे,  इस बालक ने तों भोग को झूठा कर दिया.  अब इसे कैसे भोग लगाऊ?”

 

जगन्नाथ मिश्र 
“ब्राह्मण देवता, क्षमा करना, बच्चा है ये लीजिए भोजन सामग्री, आप पुन: भोजन बनाये.”

 

ब्राह्मण 
भोजन तैयार हो गया है, जल्दी से भगवान को भोग लगा लू

(ब्राह्मण भोग लगाने के लिए ध्यान मै बैठ गया )
(वैसे ही श्री निमाई ने पुन: भोग आरोगना आरम्भ कर दिया).

 

ब्राह्मण 
“बालक ने तों भोग को फिर  झूठा कर दिया” (सिर पकड़कर बैठ गया).

 

जगन्नाथ मिश्र
“निमाई !  बैटा, तू ऐसा क्यों करता है.  ये भगवान को भोग लगा रहे है, ऐसा नही करते.”

 

जगन्नाथ मिश्र
“ब्राह्मण देवता,  आप कृपया पुन: भोजन बनाये.”

ब्राह्मण
“आप कृपया बालक को संभालिए, बार बार भोग को झूठा कर देते है.”

(जगन्नाथ मिश्र निमाई को लेकर दूर बैठ गए)

सूत्रधार –
(थके ब्राह्मण ने तीसरी बार भोजन बनाया ओर आँखे मूंदकर गोपाल को भोग लगाने के लिए याद करने लगा | देवयोग से सबको नींद आ गई|

(ब्राह्मण ने जैसे ही आँखे खोली, निमाई मुठ्ठी भर भर कर प्रेम से खा रहा है ओर अपने सारे अंगों पर दाल भात लपेट रहा है, यह देख वह विप्र फिर परेशान हो  उठा 1)

 

निमाई–
“वहाँ रे विप्र ! मन्त्र द्वारा मुझे बार बार बुलाते हो , मुझसे आये बिना नहीं रहा जाता है ओर जब मै आता हूँ तो चोंक उठते हो, परेशान हो जाते हो |”

 

सूत्रधार
इतना कहते ही निमाई ने उस विप्र को अष्ट भुजाधारी भगवान के रूप में दर्शन दिए | उनके चार हाथों में शंख, चक्र , गदा पद्म  शोभित थे1 एक हाथ में माखन था ओर दूसरे से माखन खा रहे थे ओर दो हाथों से मधुर मुरली बजा रहे थे |

 

ब्राह्मण
“हें प्रभु, आप कितने करुणामय है, मेरे भोग को स्वीकार कर लिया और मै मूर्ख आपको पहचान ही नहीं पाया.  मेरा अपराध क्षमा करो प्रभु!”

 

(सब मिलके नाचते हुए हरि-हरि बोल, गौर हरि बोल)

 

One thought on “About Chaitanya Mahaprabhu

  • Jan 2, 2017 at 7:25 pm
    Permalink

    Radhay Radhay,

    Thank You to decorate this website beautifully.
    I would request you to publish about Chaitanya Mahaprabhu in English too.

    Best Regards,
    Sudipta Panda

    Reply

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