Diksha of Govind Dev by Sripad Nivas Acharya

रामचंद्र के भाई गोविन्द अपने पिता की तरह दुर्गा देवी के बड़े भक्त थे. पिता की तरह ही बहुत बड़े पंडित और कवि भी थे. रामचंद्र ने कई बार अपने भाई को वैष्णवी दीक्षा लेने को समझाया परन्तु वे इसके लिए तैयार नही हुए. फिर रामचंद्र ने गोविन्द को न कहकर मन ही मन कातर भाव से श्री कृष्ण से प्रार्थना करनी प्रारम्भ कर दी.

एक बार रामचंद्र अपने पैत्रिक गाँव, बुधरी में थे. प्रातः काल वे बगीचे में टहल रहे थे कि सुन्दर सुन्दर फूलों को खिला देख उन्होंने मन ही मन भाव से वे पुष्प श्री कृष्ण को अर्पित कर दिए.

krishna roses

उन्ही पुष्पों को जब गोविन देव जी अपने घर के मंदिर में देवी को अर्पित कर रहे थे, देवी ने साक्षात प्रकट होकर गोविन्द से कहा ” यह फूल मेरे प्रभु श्री कृष्ण के प्रसादी हैं. इन्हें मेरे चरणों में न रखकर मुझे हाथ में दो.”

goddess-durga-51a

गोविन्द देव ने हैरानी से देवी की तरफ देखा और पुष्प, देवी के हाथ में दिए. इस प्रकार देवी ने संकेत दिया कि श्री कृष्ण की भक्ति ही श्रेष्ठ है परन्तु गोविन्द देव माता की निष्ठा पर दृढ़ रहे.

कुछ दिन बाद उनके घर एक वैष्णव अतिथि आये. उन्होंने घर के मंदिर में मुंड माला पहने देवी की मूर्ति देखी तो वे परेशान हो गये. फिर उन्होंने देवी की मूर्ति के पास शालग्राम शिला देख शिलाग्राम की अर्चना की और देवी की पूजा के लिए सजा के रखी सामग्री शिलाग्राम को अर्पित कर दी. उनके जाने के बाद नित्य, देवी की पूजा करने वाले ब्राह्मण पुजारी आये, उन्होंने बिना जाने वो प्रसादी नैवेद्य देवी को समर्पण कर दिए. उसी दिन, रात को देवी ने गोविन्द को स्वप्न में कहा , “गोविन्द इतने दिन से मैं तुम्हारे घर में अनिवेदित वस्तु ही भोग करती आ रही हूँ. आज तुमने मेरे प्रभु का प्रसाद समर्पण कर मुझे बहुत सुखी किया. सर्वावतारी श्री कृष्ण ही मेरे और तुम्हारे सबके प्रभु हैं . आज से तुम भी उन्ही की उपासना किया करो.”

इस बार देवी ने स्पष्ट ही श्री कृष्ण की उपासना का आदेश दिया परन्तु इसका भी गोविन्द देव पर कोई असर नही हुआ. जब अनुकूल भाव से गोविन्द कृपा नही ले पा रहा था तो देवी ने प्रतिकूल भाव से उस पर कृपा की. कुछ दिन बाद ही गोविन्द संग्रहणी रोग के कारण शैय्या ग्रस्त हुए. जीवन की कोई आशा नही रही. रात दिन देवी के चरणों में रो – रो कर दिन व्यतीत होने लगे. देवी ने दोबारा गोविन्द से कहा,” श्री कृष्ण के भजन की महिमा का वर्णन कर, तुम सब संशय त्याग कर श्री कृष्ण का भजन करो. तुम्हारे सब संकट दूर होंगे और तुम्हे परमानन्द की प्राप्ति होगी.”

इस बार गोविन्द का संशय दूर हो गया. रामचंद्र को पत्र भिजवाया गया. अपनी अवस्था का वर्णन कर आचार्य प्रभु को लेकर शीघ्र बुधरी चले आने की सकातर प्रार्थना की. रामचंद्र आचार्य प्रभु को लेकर आये, लेटे लेटे ही गोविन्द ने उन्हें प्रणाम किया. आचार्य प्रभु ने उन्हें उसी अवस्था में स्नान करवाकर वस्त्र परिवर्तन करवा कर मंत्र दीक्षा दी. शीघ्र ही कुछ दिनों में गोविन्द बिलकुल स्वस्थ हो गये.

संगीत माधव नाम का उनका नाटक और उनके 91 पद वैष्णव साहित्य की अपूर्व निधि है. आचार्य प्रभु ने उनकी कवित्व प्रतिभा से तुष्ट हो, उन्हें कविराज की उपाधि दी.

जय जय श्री राधे||

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *