Gopal Ji Ke Sri Vigreh KA Prakatya – Sripad Madhvendra Puri

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एक बार श्रीपाद माधवेन्द्र पुरी गोवेर्धन परिक्रमा, स्नान, जप आदि कर गोविन्द कुंड पर कीर्तन कर रहे थे तथा उपवासी रह जाने का निश्चय कर वे वृक्ष के नीचे इष्ट का ध्यान कर रहे थे | थोड़ी देर में कोमल स्वर में “ओ बाबा उठो, दूध पी लो, तेरे तई दूध लाया हूँ “| श्रीपाद माधवेन्द्र पुरी तो बच्चे को देखते ही रह गए | बालक की छवि उनकी आँखों में बस गई| दूध पी कर ऐसी तृप्ति हुई कि रोम रोम पुलकित हो गया |

उस बच्चे को याद करते करते उन्हें नींद ही नहीं आ रही थी| शेष रात्रि में उन्हें कुछ तन्द्रा आ गई, तभी स्वप्न में उन्हें आलोक पुंज के मध्य से एक किशोर की आवाज़ आई “माधवेंद्र ! अच्छा हुआ तुम आ गए, बहुत दिनों से तुम्हारी बाट देख रहा था | गोवेर्धन पर्वत के पास एक प्रान्त में मेरे पौत्र व्रजनाभ ने मेरी गोवेर्धनधारी गोपाल मूर्ती की स्थापना की थी | यवनों के आक्रमण के समय पुजारी मुझे एक गहन कुंज के भीतर छिपा कर भाग गए थे | तब से मै वहीँ हूँ| चलो तुम्हे मै वह स्थान दिखाऊ | इतना कह वह किशोर उन्हें हाथ पकर कर वहां से कुछ दूर ले गया और बोला “देखो इसी कुंज के भीतर मै तब से पड़ा हूँ, गर्मी सर्दी वर्षा, सब झेल रहा हूँ| तुम्हारी सेवा की आशा से यहीं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ, मुझे यहाँ से निकालो, पर्वत पर ले जा कर शीतल जल से मेरा अभिषेक करो और एक मंदिर बनाओ और मुझे स्थापित करो””|

श्रीपाद माधवेन्द्र पुरी जी की तन्द्रा भंग हुई| रो रो कर उनका बुरा हाल था, पृथ्वी पर लोट पोट हो रहे थे कि मुझ अधम पर इतनी कृपा की, इतना कष्ट सहा, मुझे दूध दिया, दर्शन दिया , फिर रोने लगे| तभी ध्यान आया कि पहले प्रभु की सेवा करूँ|

सभी गाँव वालों को बुला कर सपने की बात बताई| तथा गाँववालो को साथ लेकर स्वप्न दृष्ट दुर्गम अरण्य स्थित स्थान पर पहुँच कर कुंज की झाड़ियाँ, लता आदि जाल को काट कर देखते, तभी दिखी गोपाल जी की मनोरम मूर्ति| मूर्ति देख सभी व्रज वासियों के आनंद की सीमा न रही| श्रीपाद माधवेन्द्र पुरी की आँखों से अश्रुधारा लगातार बह रही थी| उनके साथ साथ सभी व्रज वासियों की ऑंखें भी नम हो गई|

सबने मिल कर मूर्ति को बाहर निकाला तथा कुछ बलिष्ट लोगों को बुलाया गया | वे मूर्ति को बलपूर्वक उठा कर ले गए, तथा पर्वत के ऊपर, एक शिला पर स्थापित किया| सौ घड़ों के जल से गोपाल जी का अभिषेक किया | अंग मार्जन कर वस्त्र धारण कराये गए| चन्दन, तुलसी, फूलमाला अर्पित की गई| दूध दही फल मिष्टान का भोग लगा |

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श्रीपाद माधवेन्द्र पुरी को पता था कि गोपाल बहुत दिनों के भूखे है, उनके लिए अन्नकूट करने की इच्छा हुई | व्रज वासियों ने तो खाद्य सामग्री के ढेर लगा दिए| सारा भोग गोपाल को समर्पित किया गया | बहुत दिनों के भूखे गोपाल सब खा गए| फिर श्री गोपाल के कर कमल के स्पर्श से सब पहले की तरह परिपूर्ण हो गया | यह सब श्रीपाद माधवेन्द्र पुरी जी ने देखा | उनकी आँखों से प्रेम अश्रु बह निकले| फिर सभी व्रज वासियों ने भर पेट भोजन किया|

मथुरा के धनी क्षत्रियों ने गोपाल जी के लिए मंदिर बनवा दिया, जिसमे विधिवत श्रीगोपाल जी की स्थापना की गई | गौड़ देश से आए दो ब्राह्मणों को दीक्षा दे कर श्रीपाद माधवेन्द्र पुरी ने उन्हें गोपाल की सेवा का भार सौपा |

श्रीपाद माधवेन्द्र पुरी जी के शिष्य श्रीपाद ईश्वरपुरी जी थे| और श्रीपाद ईश्वरपुरी जी के शिष्य श्रीमान चैतन्य महाप्रभु हुए|

जय जय श्री राधे..!!

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