History Of Radio Programme – Samarpan & Arpan

                           भगवान बहुत दयालु हैं। वे जब भी अपने भक्तों का उद्धार करना चाहते हैं , तो वे अपने भक्तों के जीवन में एक संत को भेज देते हैं। कहा भी गया है।

जिसके जीवन में संत आ गया, मानो उसके जीवन में बसंत आ गया

                           भगवान अपने भक्तों का उद्धार करना चाहते थे और इस कार्य के लिए उन्होंने चुना, माताजी प्रेमधारा, पार्वती राठौर को।

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                           जी हाँ, सन् 2008 में म्याऊँ (104.8) एफ एम चैनल पर सुबह-सुबह एक धार्मिक कार्यक्रम आना शुरू हुआ। भक्तिभाव से ओतप्रोत इस कार्यक्रम में माताजी प्रेमधारा पार्वती राठौर अपने ज्ञान की गहराई से सरल भाषा में शास्त्रों की व्याख्या किया करती थीं। माताजी शास्त्रों में लिखी गयी भगवद्वाणी को भली-भाँति समझाने के लिए, दैनिक जीवन के उदाहरणों एवं कथाओं का सहारा लिया करती थीं। माताजी द्वारा दी गयी शिक्षाएँ और व्यवहारिक ज्ञान के कारण, भारी संख्या में लोग इस कार्यक्रम को सुनने लगे और अपने जीवन को परिवर्तित करने लगे।

                           माताजी वास्तव में उस कार्यक्रम में एक सहायक के तौर पर आईं थीं और शनिवार व रविवार को भगवद्वाणी का प्रसार किया करती थीं। सही कहते हैं,  “जब भक्त भगवान द्वारा दिया गया कार्य करने लग जाता है, तो उसे अपने आराम की भी चिंता नहीं रहती। भक्त को शनिवार और रविवार को भी काम करना अच्छा लगता है”

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इस कार्यक्रम को माताजी ने दो भागों में बाँटा था। पहले भाग में माताजी ने, हमारे अनमोल शास्त्र श्रीमद्भगवद्गीता एवं श्रीमद्भागवतम के श्लोकों की व्याख्या की, जिससे लोगों में शास्त्रों के प्रति आस्था बढ़ने लगी। दूसरे भाग में श्रोताओं को फ़ोन द्वारा कार्यक्रम में लाइव अपनी बात कहने का अवसर दिया गया। दूसरे भाग में आॅनलाइन श्रोताओं से संपर्क होने के कारण कार्यक्रम से कई श्रोता जुड़ने लगे और अपनी  आघ्यात्मिक समस्याओं का निवारण पाने लगे तथा अपने अनुभव बाँटने लगे। देखते ही देखते, यह कार्यक्रम घर-घर तक पहुँच गया। दूर-दराज़ के गाँव, जिले, यहाँ तक कि विदेश से भी फ़ोन आने लगे। फ़ोन ऐसी ऐसी जगहों से आते थे, जहाँ पर यह कार्यक्रम प्रसारित भी नहीं होता था।

फ़ोन कॉल्स का सैलाब ;

                            लोगों पर भक्ति का जादू सा छा गया था। माताजी को सुने बिना, अब उनका दिन ही पूरा नहीं होता था। श्रोता टक-टकी लगाए शनिवार और रविवार का इंतज़ार करते थे। जैसे जैसे दिन बीत रहे थे, श्रोताओं की उत्सुकता भी बढ़ती जा रही थी। अतः श्रोताओं ने म्याऊँ कार्यालय में फ़ोन कर इस कार्यक्रम को प्रतिदिन प्रसारित करने की माँग की। कार्यालय के अधिकारियों  ने इस बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। वे श्रोताओं के, प्रभु के प्रति बढ़ते प्रेम को समझ ही नहीं पा रहे थे। श्रोता रोज़ फ़ोन करने लगे, उन्हें भगवान से इश्क हो रहा था। कहा भी जाता है,
“यह इश्क का जादू है, सर चढ़ कर बोलेगा ।”
                           जितना श्रोताओं को नज़र अंदाज़ किया जा रहा था, उतना ही श्रोताओं के फ़ोन बढ़ने लगे। सुबह से शाम तक बस इसी कार्यक्रम के लिए श्रोताओं के फ़ोन आने लगे। कार्यालय में मानो, फ़ोन कॉल्स का सैलाब सा आ गया था। फ़ोन के बजती घंटियोँ ने अफसरों के दिन का चैन छीन लिया था। प्रभु ज़रूर इस दृश्य को देखकर मुस्कुरा रहे होंगे। अतः अफ़सरों को श्रोताओं की बात माननी ही पड़ी और सोमवार से शुक्रवार, माताजी के कार्यक्रम का रिपीट टेलीकास्ट शुरू किया गया। हरि बोल।

लोगों की शास्त्रों में फिर से जिज्ञासा बढने लगी;

                           श्रोताओं पर प्रभु का नशा सा चढ़ गया था। श्रोताओं के जीवन में संत के आने के कारण बसंत आ गया था। श्रोता अब इस कार्यक्रम की रिकार्डिंग करने लगे एवं इसकी सी डी बनाकर मित्रों एवं संबंधियोँ में वितरित करने लगे। कुछ श्रोता अपने बच्चों को सी डी देकर बोले, “बच्चों, हम तुम्हारे लिये यह विरासत छोड़कर जा रहे हैं, इसे संभाल कर रखना।”

                                पूरे विश्व के इतिहास को पढ़ कर देख लीजिए, कभी किसी ने एक रेडियो कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग, अपने बच्चों को विरासत के रूप में नहीं दी होगी! ईश्वरीय संकल्प ने हर असंभव को सम्भव कर दिया।

                          उन सीडियों को लोग संजो कर रखने लगे ताकि आने वाली पीढ़ी इस ज्ञान का लाभ उठा सके। लोगों का जीवन परिवर्तित होने लगा। उन्हें एक नई दिशा मिलने लगी। पहले जहाँ शास्त्रों का अघ्ययन एक उबाऊ काम होता था, इस कार्यक्रम को सुनने के बाद लोगों की शास्त्रों में फिर से जिज्ञासा बढ़ने लगी।

सारी गंदी आदतें कब छूट गयीं, पता ही नहीं चला;

                           इस कार्यक्रम के कारण जहाँ एक ओर शास्त्रों का अध्ययन शुरू हुआ था वहीँ दूसरी ओर लोगोँ के जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन होने लगा। ऐसे लोग जो गंदी आदतों और गंदी लत जैसे शराब, सिगरेट, माँस इत्यादि के शिकार थे और जो दिन भर बस नशे में ही धुत रहते थे, उन लोगों ने सब गंदी आदतों को त्याग दिया था। और इतना ही नहीं, अब तो वे सुबह जल्दी उठ कर, नहा धोकर, भगवान  के नाम का स्मरण करने लगे थे।

                           ऐसे ही एक श्रोता हैं, रामपाल जी। जो कहते हैं, “ माताजी के कार्यक्रम ने मेरे पूरे जीवन को ही बदल दिया है। बड़े बुज़ुर्ग कहते हैं, एक इंसान के काले बाल ,सफ़ेद हो जाते हैं, पर गंदी लत कभी नहीं छूटती। लोग नशा-छुड़ाओ केँद्र में न जाने कितना पैसा फूँक देते हैं, फिर भी गंदी लत नहीं छूटती। परन्तु माताजी को सुनते-सुनते मेरी सारी गंदी आदतें कब छूट गईं, पता ही नहीं चला। आज की तारीख़ में, मैं  प्रभु का नाम का स्मरण कर, ख़ुद को, और शुद्ध बनाने का प्रयास कर रहा हूँ। मैं माताजी को अपना गुरु मानता हूँ और उनकी दी गई शिक्षाओं पर चलता हूँ। ”

                           तो यह जादू क्या था! नशा-छुड़ाओ केंद्र, कोई गारंटी नहीं देते कि दो महीने के उपचार के बाद भी, नशा छूटेगा ही। परन्तु ‘हरि नाम’ क्या-क्या कर सकता है, कहा नहीं जा सकता, नशा छूटना तो बहुत छोटी बात है। 
तो यह सब कैसे हो पा रहा है। क्या खूब कहा है, एक कवि ने,

“खुली छतों के दिये तो कब के बुझ जाते,
खुली छतों के दिये तो कब के बुझ जाते,
आखिर कौन है जो इन तेज़ हवाओं के पंख कुतर देता है। ”

                           माताजी कहती हैं, यह जादू है भगवान के नाम का, जो हर असंभव को सम्भव बना रहा है।

                           कार्यक्रम को दो साल पूरे होने को आ गए थे। उनकी ओजस्वी वाणी एवं भावपूर्ण भाषा ने इस कार्यक्रम को बुलंदियोँ तक पहुँचा दिया। लोगों के मन में भगवान के प्रति दृढ़ आस्था बन गई। वे अब सुबह जल्दी उठकर भगवान के नाम का स्मरण करने लगे थे। उनके जीवन के कठिन रहस्यों की परतें खुलने लगी थीं। हरि बोल, हरि बोल, हरि हरि बोल।

पर, इस कार्यक्रम को बंद कर दिया गया;

                           यह कैसी विडंबना थी कि एक ओर तो यह कार्यक्रम लोकप्रियता के चरम शिखर पर पहुँच चुका था, वहीं दूसरी ओर इसे बंद करने की योजना बनाई जा रही थी। अंततः 2010 में म्याऊँ चैनल पर इस कार्यक्रम को बंद कर दिया गया। परंतु भक्ति के मार्ग पर चलने वालों को यह रास नहीं आया। लोगों ने मिलकर राशि एकत्र की एवं प्रायोजित कार्यक्रम की तर्ज़ पर समर्पण/अर्पण का एफ एम रेनबो चैनल पर प्रसारण शुरू करवा दिया। एफ एम रेनबो 102.6 पूरे देश में सुना जाता है। यह कार्यक्रम अब शनिवार और रविवार सुबह 5:45 से 6:15 तक प्रसारित होता है। यह कार्यक्रम भी दो भागों में बाँटा गया है, समर्पण एवं अपर्ण। समर्पण कार्यक्रम में माँ पार्वती राठौर द्वारा शास्त्रों की वाणी की सरल शब्दों में व्याख्या की जाती है और अपर्ण कार्यक्रम में उन्हीं के द्वारा श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर दिए जाते हैं। अब श्रोताओं के प्रश्न लाइव नहीं लिये जाते, प्रश्न अब रिकॉर्ड कराये जाते हैं। यदि आप भी हमसे कोई प्रश्न पूछना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए फ़ोन नंबर पर कॉल कर अपने प्रश्न रिकॉर्ड करवाएँ। ध्यान रखें कि, रिकॉर्डिंग सिर्फ़ एक मिनट तक ही होती है, इसलिए सवाल फ़टाफ़ट पूछ लीजियेगा।

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आपकी सहायता;

                           माताजी द्वारा श्रोताओं की जिज्ञासाओं का निराकरण करते-करते भी बाकी श्रोताओं का ज्ञानवर्धन हो जाता है, जैसे देैनिक जीवन के कार्य करते हुए भी भक्ति कैसे की जाए? – भक्ति के कितने प्रकार हैं? – कलियुग में केवल भगवान का नाम स्मरण ही श्रेष्ठ भक्ति क्यों है? इत्यादि। इस कार्यक्रम को सुनने में बस लाभ ही लाभ है। तो अगर आप भी चाहते हैं कि ये कार्यक्रम सदा चलता रहे, तो आप हमारी दो प्रकार से सहायता कर सकते हैं;

1. वित्तीय सहायता प्रदान करके – इसके लिए आप सीधा ट्रस्ट के खाते में दान की रकम भेज सकते हैं। दान करने के लिये यहाँ क्लिक करें।
सभी दान धारा 80 G  के तहत छूट प्राप्त कर रहे हैं।

2. कार्यक्रम का प्रचार करके भी आप हमारा सहयोग कर सकते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण श्रीमदभगवद्गीता के अठारहवे अध्याय में कहते हैं, जो भक्त मेरे नाम का प्रचार करता है, वह मुझे अत्यंत प्रिय होता है। हम सबको मिल कर भगवान की वाणी को दूर-दराज़ के गाँवों तक पहुँचाना है ताकि भविष्य में पूरे देश के हर कोने से यह आवाज़ सुनाई दे;

हरे कृष्णा हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा हरे हरे।
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे।।

अर्पण कार्यक्रम फ़ोन  नंबर: 011-22831748

कॉल सिर्फ़ शनिवार और रविवार को 8AM – 5PM  बीच ही करें।

प्रश्न और उत्तर सुनने के लिये यहाँ क्लिक करें
माताजी के मुख से भगवद्वाणी सुनने के लिये यहाँ क्लिक करें

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