Who is an Ideal Bhakta

भक्त किसे कहते हैं?

भगवद्भक्ति जिसमें हो, उसे ही मुख्य रूप से भक्त कहा जाता है।  श्रीमदरूपगोस्वामीपाद ने लिखा है – जिनका अंत:-करण कृष्णभाव से भावित हो, वही कृष्ण-भक्त है।

कृष्णभक्त दो प्रकार के हैं –

।) साधक  2) सिद्ध

श्रीकृष्ण में जिसकी रति उत्पन्न हुई है, किन्तु सम्यक रूप से जिसके विघ्न निवृत नहीं हुये, जो कृष्ण साक्षात्कार के योग्य हो, उसे साधक कहा जा सकता है।

जिसके अविद्या, अस्मिता और समस्त क्लेश दूरीभूत हो चुके हों, जो नित्य कृष्ण क्रियाशील  एवम निर्विछिन्न प्रेम-सुखास्वादन परायण हो, वही सिद्ध कृष्ण-भक्त है।”

भक्त के लक्षण :-

उतम भक्त – जो चेतन-अचेतन, सभी प्राणियों में अपने अभीष्ट श्रीभगवान का दर्शन करते हैं  एवम अपने चित्त में स्फूर्ति प्राप्त कर अपने अभीष्ट श्रीभगवान के ही आश्रित रूप से चेतन- अचेतन समस्त प्राणियों के दर्शन करते है, अथवा उनका अपना जिस प्रकार का प्रेम श्रीभगवान में है, उस प्रेम का अस्तित्व समस्त भूतों में अनुभव करते हैं, वही भगवद्भक्तगण के बीच उतम है।

जो इंद्रियों द्वारा रूप रस आदि ग्रहण करके भी जगत को विष्णु-मायामय देखे, और उसमें विचलित न हो।

किसी प्रकार की कर्म वासना का बीज, जिसकी चित भूमि में अंकुरित न हो, श्री वासुदेव ही जिसका एकमात्र आश्रय हों।

जो अपने ओर पराये धन में रंचमात्र भेद भी न करे, समस्त देहों में समज्ञान करे, वे ही उतम भक्त हैं।

श्रीभगवान मे प्रीति जिसकी जितनी गाढ़ होगी, वे उतने ही अधिक प्रेमी भक्त होंगे।

भगवत क्षेत्र के तारतम्य भेद से भी प्रेम का तारतम्य होता है। जैसे बैकुंठ के सेवक की अपेक्षा श्रीद्वारका के सेवक में प्रीति का आधिक्य, उसकी अपेक्षा मथुरा के सेवक में आधिक्य, उसकी अपेक्षा श्री वृन्दावन के सेवक में आधिक्य, उसकी अपेक्षा गोवर्धन के और उसकी भी अपेक्षा श्री राधा कुंड के प्रेमी उतरोत्तर श्रेष्ठ है।

प्रेम बढ़कर क्रमश: स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग और महाभाव के पश्चात उन्नत होता जाता है। महाभाव की स्थिति ब्रज को छोड़कर कर अन्यत्र नहीं है।

श्रीभागवतामृत में भक्तगण के भावभेद में 5 विभेद स्वीकृत हैं जैसे :

ज्ञानभक्त  – भरत आदि

शुदभक्त  – अंबरीष आदि

प्रेमभक्त –  श्री हनुमान आदि

प्रेमपरभक्त – अर्जुन आदि पांडवगण और

प्रेमातुर भक्त – श्रीमान उद्धव आदि यादवगण

भक्त के अन्तर मे भक्ति विराजमान होने से उसके देह और मन में विशेष- विशेष गुणावली का उदय होता है, इसलिए इन्हें भी वैष्णव लक्षण मानना चाहिए ।

श्री कृष्ण का कोई भी गुण परिपूर्ण रूप में किसी में भी संचालित नहीं हो पाता है।  भक्त में बूंद-बूंद ही संचालित होता है, एकमात्र श्रीकृष्ण में वह गुण पूर्णमात्रा में विराजमान रहता है।

भक्ति धर्म द्वारा जो महत अंत:-करण हो गये है, वे अदोष दर्शी हो जाते है।

जो दूसरों के दोष देखते ही नही, केवल मात्र गुण ही देखते है, वे महतर भक्त है।

जो दूसरों के दोष तो देखते ही नही, छोटे से गुण को बहुत बड़े गुण के रूप मे ग्रहण करते है, वे महतम साधु है।

जो दूसरों के गुण के अभाव मे भी सर्वत्र गुण ही देखें, वे अति महतम साधु हैं। वे मन में विचार करते हैं कि कोई दुष्ट है ही नहीं, सभी शिष्ट हैं।

जिसके दर्शन से भी अन्य व्यक्ति में भक्ति का उदय हो, श्रीमन्महाप्रभु ने उसे उतम भक्त कहकर व्याख्या दी हैं।

जो श्रद्धापूर्वक प्रतिमा में श्रीहरि की पूजा करते हैं, किन्तु भक्तगण की, एवम अन्य जन की पूजा नहीं करते, वे प्राकृत भक्त हैं। अर्थात ऐसा समझना चाहिए कि उन्होंने अभी हाल में ही भजन आरम्भ किया है।

जो व्यक्ति गोविन्द का अर्चन करे और उनके भक्तगण की अर्चना न करे, वह व्यक्ति भक्त नहीं, केवल पाखंडी है। यह व्यक्ति गौण कनिष्ठ भक्त है ।

शील नरोतम ठाकुर महाशय ने कहा है –

जिनका संग अखिल साध्य साधन के फलस्वरूप है, उन भगवत भक्तगण  की पादुका -समूह को मैं नमस्कार करता हूँ।

राधे राधे 

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