JAIDEV GOSWAMI KII GEET GOVIND

जयदेव गोस्वामी की गीत गोविन्द

जयदेव गोस्वामी जब ध्यान में रहते तभी उन्हें   श्री  राधा कृष्ण की  लीलाये दिखाई देती थी जोकि  वे लिखते जाते थे इस प्रकार जयदेव गोस्वामी की  गीत गोविन्द की  रचना हुई |

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जयदेव गोस्वामीजी  ने ‘गीत गोविन्द’ के माध्यम से, राधाकृष्ण वैष्णव धर्म का प्रचार किया। इसलिए ‘गीत गोविन्द’ को वैष्णव साधना में भक्तिरस का शास्त्र कहा गया है। जयदेव ने ‘गीत गोविन्द’ के माध्यम से उस समय के समाज को, राधाकृष्ण की रसयुक्त लीलाओं की भावुकता और सरसता से जन-जन के हृदय को आनंदविभोर किया। जयदेव का जन्म भुवनेश्वर  के समीप केन्दुबिल्व में हुआ। यह वैष्णव तीर्थयात्रियों के लिए, उड़ीसा  में, आज भी एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थान है। यहां वार्षिक मेला लगता है जिसमें संतों, साधकों और महंतों का समागम होता है।

JAIDEV GOSWAMI

जयदेव जगन्नाथ जी के दर्शन करने पुरी जा रहे थे। उसी यात्रा के दौरान उनेह  गीत गोविन्द की रचना की प्रेरणा मिली। कहते हैं- पुरुषोत्तम क्षेत्र पहुंचकर उन्होंने जगन्नाथ का दर्शन किया। एक विरक्त संन्यासी की तरह वृक्ष के नीचे रहकर भगवान का भजन-कीर्तन करने लगे। उनके वैराग्य से प्रेरित होकर, वहां अन्य बड़े संत-महात्माओं का सत्संग होने लगा। फिर एक जगन्नाथ भक्त ने प्रभु की प्रेरणा से [स्वप्न में भगवान ने आदेश दिया ]अपनी कन्या पद्मावती का विवाह जयदेव से कर दिया। वह गृहस्थ होकर भी संत का जीवन जीते रहे।

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जयदेव ने राधाकृष्ण की, श्रृंगार रस  से परिपूर्ण भक्ति का महिमागान एवं प्रचार किया। जयदेव के राधाकृष्ण सर्वत्र एवं पूर्णत: शाश्वत चैतन्य-सौन्दर्य की साक्षात अभिव्यक्ति हैं। अपनी काव्य रचनाओं में जयदेव ने राधाकृष्ण की व्यक्त, अव्यक्त, प्रकट एवं अप्रकट- सभी तरह की लीलाओं का भव्य वर्णन किया है।जयदेव गोस्वामी की  रचना का एक अदभुत  वर्णन  देखिये :-

मेर्घैर्मेदुरमम्बरं वनभुवः श्यामास्तमालद्रुमै-
र्नक्तं भीरुरयं त्वमेव तदिमं राधे ! गृहं प्रापय।
इत्थं नन्दनिदेशितश्चलितयोः प्रत्यध्वकुञ्जद्रुमम्,
राधामाधवयोर्जयन्ति यमुनाकूले रहः केलयः।।1।।
एक दिन भगवान कृष्ण एवं उनके सखा तथा भगवती राधा एवं उनकी सखियां किसी सुरम्य उपवन में भ्रमण करते हुए इस प्रकार खो गये कि उन्हें समय का भान ही न रहा। फलतः सायंकाल हो गया और आकाश घने तथा काले-कजरारे बादलों से घिर गया। राधा अपनी सखियों के साथ अपने घर को लौटने लगी, तो नन्दबाबा ने मनुहार करते हुए राधा से अनुरोध के स्वर में कहा—बेटी राधे ! तुम देख ही रही हो की  आकाश में काले बादल  इस प्रकार छा गये हैं कि चारों ओर अन्धकार व्याप्त हो गया है, फिर यह सारा वनप्रदेश तमाल (कृष्ण वर्ण के पत्तों वाले) के वृक्षों से भरा पड़ा है, इससे चारों ओर घना अन्धकार फैला हुआ है। पुत्रि ! तुम यह भी जानती हो कि तुम्हारा साथी श्रीकृष्ण रात्रि में अकेला होने पर भयभीत हो उठता है। अतः तुम इसे छोड़कर मत जाओ, अपितु इसकी सहायिका तथा मार्गदर्शिका बनकर इसे घर पहुंचाने के उपरान्त ही अपने घर को प्रस्थान करो।
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नन्द बाबा के अनुरोध को गौरव देती हुई श्री  राधा ने श्रीकृष्ण की पथप्रदर्शिका बनकर उन्हें घर पहुंचाना स्वीकार कर लिया। इस बात  से दोनों—राधा और श्रीकृष्ण—को एकान्त और एक-दूसरे का संग सुलभ हो गया। दोनों यमुनातट के रमणीय उपवनों, लताकुञ्जों और तरुओं की सुषमा का आनन्द लेते हुए एकान्त में ललित क्रीड़ाओं का सुख भोगने लगे।
जयदेव गोस्वामी  की एक कथा प्रचलित है ,जब वे गीत गोविन्द लिख रहे थे तभी एक स्थान पर उनेह श्री राधा के चरण श्री कृष्ण द्वारा पकड़ने  का बार बार विचार आ रहा था ,गोस्वामी जी का मन लिखने में कुछ संकोच कर रहा था ,वे कुछ देर के लिए बाहर  चले गए|
 तभी जयदेव आये और पद्मावती से  अपने लिखने के पेपर मांगे ,कुछ लिखा  फिर  पद्मावती से खाना माँगा, खाना खाया  और आराम करने चले गए | पद्मावती पंखा करने लगी जब जयदेव को नींद आ गई  तभी पद्मावती दरवाजे पर बैठकर  प्रसाद पाने लगी | अचानक बाहर से जयदेव  आये और पद्मावती को खाना खाते  देख  हैरान हो गए ,जयदेव ने कहा आज तुम मुझे बिना खाना खिलाये कैसे प्रसाद पा  रही हो ?पद्मावती हैरान होकर देखती रही फिर पता चला की स्वयं भगवान आये थे और जो जयदेव गोस्वामी नही लिख पा रहे थे वे भगवान लिख कर चले गए |
इस प्रकार गोस्वामीजी के गीत गोविन्द की  रचना हुई |श्री राधा-कृष्ण की  ललित लीलाएं  मंगल का आधार बनें, अर्थात् सबका  कल्याण करने वाली हों। कृष्ण-भक्ति साहित्य में श्री  राधा को श्रीकृष्ण की प्रिया एवं पत्नी के रूप में प्रतिष्ठित करने का श्रेय कविवर  जयदेव को ही प्राप्त है। इस तथ्य की पुष्टि इसी से होती है कि कवि ने मंगलाचरण में श्री  राधा को श्रीकृष्ण की पथप्रदर्शिका के रूप में चित्रित कर उन्हें उन्नत स्थान पर प्रस्थापित किया है।
वाग्देवताचरितचित्रित-चित्तसद्मा,
पद्मावतीचरणचारणचक्रवर्ती।
श्रीवासुदेवरतिकेलिकथा समेत-
मेतं करोति जयदेवकविः प्रबन्धम्।।2।।

जय जय श्री राधे

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