Maharaas – Gopi Geet in हिंदी

बंसी ध्वनि सुन कर एक गोपी दूध दोह रही थी , दोहता हुआ छोड़कर चली आई।

एक गोपी चूल्हे पर दूध उफ़नता ही छोड़ आई।

एक अन्य गोपी खाना परोस रही थी, बंसी की धुन सुनते ही वहीँ छोड़ चली आयी।

एक गोपी उबटन लगा रही थी, बंसी सुनकर उबटन लगे हुए ही आ गयी।

एक अन्य गोपी बच्चे को दूध पिला रही थी, बंसी सुनकर उसे छोड़कर आ गयी।

एक गोपी अपने पति की सेवा कर रही थी, बंसी की आवाज़ सुनकर वह भी सब छोड़  चली।

पिता , पतियों , भाई , जाति-बंधुओं ने रोका। उनकी प्रेम-यात्रा में विघ्न डाला परन्तु वे इतनी मोहित हो गयीं  थीं कि रोकने पर भी न रुकीं, रुकतीं कैसे? विश्व-विमोहन श्रीकृष्ण ने उनके प्राण, मन और आत्मा सबका अपहरण जो कर लिया था।

परन्तु कुछ गोपियाँ, घरों के भीतर थीं। उन्हें बाहर नहीं जाने दिया गया। उन्होंने आँखें बंद कर ली एवं श्रीकृष्ण के सौंदर्य, माधुर्य एवं अन्य लीलाओं का ध्यान करने लगीं। श्रीकृष्ण की असह विरह-वेदना से उनके ह्रदय में इतनी व्यथा जलन हुई की उनके अशुभ संस्कार भस्म हो गये और उनका ध्यान लग गया। ध्यान में वे श्री कृष्ण के साथ आलिंगन एवं नृत्य करने लगीं तथा उन्होंने पाप और पुण्य रूप कर्म के परिणाम से बने इस गुणमय शरीर का परित्याग कर दिया। शरीर के कर्म-बंधन ध्यान के समय छिन्न-भिन्न हो चुके थे।

भगवान की इस लीला का प्रयोजन केवल इतना है कि जीव उसके सहारे अपना परम कल्याण प्राप्त करे। जब ब्रज की गोपियाँ श्रीकृष्ण के बिल्कुल पास आ गयीं, तब भगवान ने कहा, ” भूत, भविष्य और वर्तमान काल के जितने वक्ता हैं उनमें  तुम ही तो सर्वश्रेष्ठ हो। “

श्रीकृष्ण ने कहा, “महाभाग्यवती गोपियों! तुम्हारा स्वागत है। ब्रज में सब कुशल मंगल तो है? इस समय यहाँ आने की क्या आवश्यकता पड़ी? रात का समय है, इतने बड़े-बड़े भयावने जीव-जंतु इधर-उधर घूमते रहते हैं, तुम तुरंत ब्रज में लौट जाओ। रात के समय घोर जंगल में स्त्रियों को नहीं रुकना चाहिए। देर मत करो, घर जाओ, पतियों की सेवा करो , नन्हे-नन्हे बच्चे बुला रहे हैं। गाय बछड़े रम्भा रहे हैं। यदि प्रेमवश आई हो तो भी अनुचित ही है। जगत के पशु, पक्षी, जानवर तक, सब मुझसे प्रेम करते हैं।

कल्याणी गोपियों! स्त्रियों का धर्म है की पति/भाई-बंधुओं की सेवा करें और संतान का पालन पोषण करें। गोपियों! मेरी लीला और गुणों के श्रवण से, रूप के दर्शन से, इन सबके कीर्तन और ध्यान से, मेरे प्रति अनन्य प्रेम की प्राप्ति होती है।

श्रीकृष्ण की बात सुनकर गोपियाँ उदास और खिन्न हो गयीं।उनकी आशा टूट गयी। वे भयंकर चिंता में गोते खाने लगी। उनके आंसू लगातार बहने लगे। उनका ह्रदय दुःख से इतना भर गया कि वे कुछ बोल न सकीं। गोपियों ने अपने प्यारे कृष्ण के लिए सारी कामनाएँ तथा सारे भोग छोड़ दिये थे। श्रीकृष्ण में उनका अनंत अनुराग एवं परम-प्रेम था। उनकी आँखें रोते-रोते लाल हो गयीं।

फिर भी आंसू पोंछे एवं श्री कृष्ण से बोलीं,

“श्रीकृष्ण! तुम घट-घट व्यापी हो, हमारे ह्रदय की बात जानते हो। तुम्हारा यह कहना कि पति, पुत्र, भाई, बंधुओं की सेवा करना स्त्रियों का स्वधर्म है, बिलकुल सही है। परन्तु इस उपदेश के अनुसार हमें तुम्हारी ही सेवा करनी चाहिए क्योंकि तुम साक्षात् भगवान हो। शरीर धारियोँ के सुहृद हो, आत्मा हो और परम प्रियतम हो। हमारे यह पैर तुम्हारे चरणकमलों को छोड़कर एक पग भी हटने को तैयार नहीं  हैं। फिर हम ब्रज में कैसे जाएँ?  हे प्रियतम! हम सच कहती हैं, तुम्हारी विरह व्यथा की आग से हम अपने-अपने शरीर को जला देंगी और ध्यान के द्वारा तुम्हारे चरणकमलों को प्राप्त करेंगी। तुम्हारे जिन चरणकमलों की सेवा का अवसर स्वयं लक्ष्मी जी को भी कभी-कभी ही मिलता है, उन्हीं चरणों का स्पर्श हमें प्राप्त हुआ। अब तक जिसने भी तुम्हारे चरणों की शरण ली, उसके सारे कष्ट तुमने मिटा दिये।अब हम पर कृपा करो। हम तुम्हारी सेवा करने की आशा अभिलाषा से घर गाँव कुटुम्ब सब कुछ छोड़कर तुम्हारे युगल-चरणों की शरण में आयीं हैं। हे प्रियतम! वहाँ तो तुम्हारी आराधना के लिए अवकाश ही नहीं है।

प्यारे श्याम सुन्दर! तीनों  लोकों  में ऐसी कौन सी स्त्री है जो मधुर-मधुर पद, आरोह अवरोह क्रम से विविध प्रकार की मुर्छनाओं से युक्त, तुम्हारी बंसी की तान सुनकर आर्य-मर्यादा, कुल, लोक, लज्जा त्याग कर तुम्हारे पास न आ पाये! तुम ब्रज-मंडल का भय एवं दुःख मिटाने के लिए प्रकट हुए हो। यह स्पष्ट है कि दीन-दुखियों पर तुम्हारा बड़ा प्रेम है एवं बड़ी कृपा है। हम भी दुखिनी हैं, तुम अपनी इन दासियों के वक्ष स्थल और सर पर अपने कोमल कर-कमल रखकर इन्हें अपना लो।

गोपियों की व्यथा और व्याकुलता भरी वाणी सुनकर श्रीकृष्ण का ह्रदय दया से भर गया और उन्होंने हंस-हंस कर उनके साथ क्रीड़ा प्रारंभ की। श्रीकृष्ण ने अपनी भाव- भंगिमायें और चेष्टाएँ गोपियों के अनुकूल कर दीं। गोपियों के शत-शत यूथों के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण वैजयंती माला पहने वृन्दावन को शोभायमान करते हुए विचरण करने लगे। कभी गोपियाँ अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के गुण और लीलाओं का गान करतीं, तो कभी श्रीकृष्ण गोपियों के प्रेम और सौंदर्य के गीत गाने लगते। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ यमुना जी के पावन पुलिन पर, जो कपूर के समान चमकीली बालू से जगमगा रहा था, पर्दार्पण किया।

उस आनन्दपद पुलिन पर भगवान ने गोपियों के साथ क्रीड़ा की। हाथ फैलाना, आलिंगन करना , हाथ दबाना, चोटी पकड़ना, विनोद करना, विनोद-पूर्ण चित्तवन से देखना और मुस्कुराना। भगवान ने जब इस प्रकार गोपियों का सम्मान किया तब गोपियों के मन में ऐसा भाव आया कि संसार की सभी स्त्रियों से हम ही सर्वश्रेष्ठ हैं। हमारे समान और कोई नहीं है। जब भगवान ने देखा की गोपियों को मान होने लगा है, तो वे उनके बीच से अंतर्धयान हो गये।

श्रीकृष्ण के अंतर्धयान होते ही गोपियों का ह्रदय विरह की ज्वाला में, जलने लगा। वे अपनेआप को सर्वथा भूल कर श्रीकृष्ण स्वरुप हो गयीं। वे सभी मिलकर ऊँचे स्वर में उन्हीं के गुणों का गान करने लगीं। वन-वन, झाड़ी-झाड़ी में जा कर श्रीकृष्ण को ढूँढने लगीं।

वे वृक्षों, पीपल, पाकर और बरगद से पूछतीं, “ श्रीकृष्ण हमारा मन चुरा कर ले गया है। क्या तुमने उन्हें देखा है?”

“ बहिन तुलसी! तुम्हारा ह्रदय बहुत कोमल है। तुम तो सभी लोगों का कल्याण चाहती हो। भगवान के चरणों में तुम्हारा प्रेम है ही। वे भी तुमसे बहुत प्यार करते हैं, तभी तो भोरों के मंडराते रहने पर भी वे तुम्हारी माला नहीं उतारते। क्या तुमने अपने परम प्रियतम श्याम सुन्दर को देखा है?”

“भगवान् की प्रेयसी पृथ्वी! तुमने ऐसी कौन सी तपस्या की है कि श्रीकृष्ण के चरण कमलों का स्पर्श पाकर तुम आनंद से भर रही हो?”

मतवाली गोपियाँ प्रलाप करतीं भगवान श्रीकृष्ण को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते कातर हो गयीं। और भी गाढ़ आवेश हो जाने के कारण वे भगवतमय होकर भगवान की लीलाओं का अनुकरण करने लगी। एक गोपी पूतना बनी, तो दूसरी श्रीकृष्ण। कोई गोपी बनी वत्सासुर, और दूसरी बकासुर। गोपियों ने अलग-अलग श्रीकृष्ण बनकर वत्सासुर और बकासुर बनी गोपियों को मारने की लीला की। एक गोपी बनी कालिया नाग और दूसरी श्रीकृष्ण बनकर लीला करने लगी।

एक जगह भगवान के चरण देखे, तो वे पहचान गयीं  कि  ये चरण श्रीकृष्ण के हैं। उनमें  ध्वज, कमल, ब्रज, अंकुश और जों आदि के चिह्न दिख रहे थे। आगे चलकर श्रीकृष्ण के साथ किसी ब्रज युवती के भी चरण चिह्न दिख पड़े। इस प्रकार गोपियाँ मतवाली होकर अपनी सुध-बुध खोकर एक-दूसरे को भगवान के चरण-चिह्न दिखलातीं हुई वन-वन भटक रहीं थीं। उनका रोम-रोम और उनकी आत्मा कृष्णमय हो रही थी। उन्हें तो अपने शरीर की सुध नहीं थी, फिर घर की याद कौन करता? श्रीकृष्ण की भावना में डूबी गोपियाँ यमुना जी के पावन पुलिन पर रमण रेती में लौट आयीं और एक-साथ मिलकर श्रीकृष्ण के गुणों का गान करने लगीं।

गोपी गीत

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गोपियाँ करुणा-जनक सुमधुर स्वर से फूट-फूट कर रोने लगीं। ठीक उसी समय उनके बीचों-बीच भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हो गये। गोपियों के शरीर में नवीन चेतना -स्फूर्ति आ गयी। एक गोपी ने बड़े प्रेम से भगवान के कर-कमलों को अपने हाथों में ले लिया और सहलाने लगी। दूसरी ने भगवान की भुजाओं को अपने कंधे पर रखा। तीसरी ने भगवान का चबाया पान अपने हाथ में ले लिया। चौथी ने भगवान के चरण को अपने वक्ष स्थल पर रखा। इस प्रकार गोपियाँ भगवान के साथ क्रीड़ा करने लगीं। भगवान यमुना की रेती पर ओढ़नी पर बैठ गये। तीनो कालों में जितना भी सौंदर्य प्रकाशित होता है, वह तो भगवान के बिंदु-मात्र सौंदर्य का आभास मात्र है।

मेरी प्यारी गोपियों! तुमने मेरे लिए घर गृहस्थी की उन बेड़ियों को तोड़ डाला है, जिन्हें बड़े-बड़े योगी यती भी नहीं तोड़ पाते। मुझसे तुम्हारा ये मिलन, आत्मिक संयोग सर्वथा निर्मल और सर्वथा निर्दोष है। यदि मैं  अमर शरीर से, अमर जीवन से, अनंत काल तक तुम्हारे प्रेम, सेवा और त्याग का बदला चुकाना चाहूँ, तो भी नहीं चुका सकता। मैं जन्म-जन्म  के लिए तुम्हारा ऋणी हूँ। तुम अपने सौम्य स्वभाव से, प्रेम से मुझे ऊऋण कर सकती हो, परन्तु मैं तुम्हारा ऋणी ही हूँ।

उसके बाद यमुना के पुलिन पर भगवान ने रास क्रीड़ा आरम्भ की। भगवान ने दो-दो गोपियों के बीच प्रकट होकर, उनके गले में अपना हाथ डाल दिया। इस प्रकार एक गोपी और एक श्रीकृष्ण । सभी गोपियाँ ये अनुभव करती हैं कि हमारे प्रिय हमारे पास ही हैं । इस प्रकार सहस्त्र-सहस्त्र गोपियों से शोभायमान भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य रासोत्सव प्रारंभ हुआ। आकाश में विमानों की भीड़ लग गयी। देवता अपनी पत्नियों के साथ वहाँ आ पहुँचे। गन्धर्व-गण अपनी-अपनी पत्नियों के साथ भगवान का यश गाने लगे। पुष्पों की वर्षा होने लगी। भगवान के साथ गोपियाँ नृत्य करने लगीं। इस प्रकार महारास संपन्न हुआ।

जो धीर पुरुष भगवान श्रीकृष्ण के चिन्मय रास-विलास का श्रद्धा के साथ बारम्बार श्रवण और वर्णन करता है, उसे भगवान के चरणों में परा-भक्ति प्राप्त होती है। वह बहुत ही शीघ्र अपने ह्रदय के रोग, काम-विकार से छुटकारा पा जाता है। उसका काम-भाव सर्वदा के लिए नष्ट हो जाता है।

जय जय श्री राधे।

 

One thought on “Maharaas – Gopi Geet in हिंदी

  • Nov 13, 2016 at 10:43 pm
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    MY love ls lord krishna

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