Manjari Bhav Upasana

 मञ्जरी भाव उपासना 

Mahaprabhu_large

जब श्री कृष्ण, कलयुग में   चेतन्य महाप्रभु बनकर आये |  वे  एक भक्त के रूप में आये  तथा श्री राधा रानी का भाव लेकर आये ,  उन्होंने हमें बताया की जीवित रहते हुए ही हमें श्री राधा कृष्ण की प्रेममयी सेवा प्राप्त कर लेनी चाहिए | श्री रूप गोस्वामी ,महाप्रभु के परिकर है तथा श्री रूप मंजरी के रूप में राधा कृष्ण की सेवा कर रही है | पहली बार महाप्रभु ने   मञ्जरी भाव की उपासना समझाई ,इतना गहरा तत्व वे हमे देकर गए,  मञ्जरी भाव में हमें श्री राधारानी का दास्याम प्राप्त करना होता है|

श्री रूप गोस्वामी ने कार्पण्य पंजिका स्त्रोत में अभिलाषा व्यक्त की कि जब राधा कृष्ण विरह व्यग्र हो उस समय वे मंजरी भाव से उनका मिलन करा उनसे हार पदक आदि परितोषित रूप में प्राप्त कर धन्य हो| वे विलास के समय उनके निकट रहकर उनकी विभिन्न प्रकार से सेवा करे| ताम्बूल सजा कर अपने हाथ से उनके मुख में अर्पित करे| अनंग क्रीडा में उनके केश बिखर जाने पर उन्हें संवार दे| उनकी वेश भूषा फ़िर से कर दे| उनके तिलक शून्य ललाट पर फ़िर तिलक की रचना कर दे| वे अपने केशपाश खोल कर श्री राधा के दोनों चरणों को पोछ  देने का सौभाग्य प्राप्त कर सके| निकुंज में विलास के उपयोगी पुष्प शैय्या तैयार कर सके| विलास के समय दोनों को मधुपान करा सके और विलास के पश्चात उनका श्रम दूर करने के लिए चामर से बीजन कर सके|

krishna radha rani manjari

 

राधा की  सखियाँ राधा के अतिशय आग्रह से कभी कभी श्री कृष्ण का अंग संग भी स्वीकार कर लेती हैं परन्तु मंजरियाँ राधा कृष्ण – सेवानन्दरस माधुर्य आस्वादन में इतना तल्लीन रहती हैं कि वे राधा कृष्ण के अनुरोध पर भी कभी स्वप्न में भी कृष्ण अंग संग की वांछा नही रखती| इसी कारण मंजरी गण को श्री राधा कृष्ण की जिस गोपनीय सेवा का अधिकार और सौभाग्य प्राप्त है वह सखियों को नही है|  इसके अतिरिक्त कृष्ण के अंग संग का तिरस्कार करने के कारण मंजरियाँ रस की दृष्टि से किसी प्रकार घाटे में नही रहती अपितु राधा के साथ तादात्म्य के कारण  वे राधा एवं कृष्ण के मिलानंद का स्वतः उपभोग करती हैं| यहाँ तक की वे रति- चिह्न जो कृष्ण के अंग संग के कारण राधा में होते हैं, मंजारियों के अंग में भी उभर आते हैं|

krishna radha rani manjari

प्रत्येक साधक चाहे वह पुरुष हो या स्त्री  वे इस प्रकार भावना करते-करते उनका  नित्य-सिद्ध लीला-परिकर मंजरीगण के साथ ‘साधारणीकरण’ हो जाता है, जिसके फलस्वरूप वह राधारानी के विप्रलम्भ और सम्भोग-रस का आस्वादन करता है। मंजरी भाव की उपासना के उक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि यह राधा-कृष्ण की युगल-उपासना है, पर इसमें प्रधानता राधा की है। मंजरियाँ राधा की दासी हैं। वे मुख्य रूप से उन्हीं की चरण-सेवा में अनुरक्त हैं। कृष्ण के साथ उनका सम्बन्ध केवल  राधा की सेवा के निमित्त ही है ।  वे अपने राधा-प्रेम के कारण और राधा की अपने प्रति कृपा के कारण गर्ववती हैं।

kanha5

किंकरी राधा की दासी है और कृष्ण राधा के प्राण हैं इसलिए वह कृष्ण से सम्बन्ध रखती है और राधा के साथ कृष्ण की सेवा करती है। पर यदि राधा की कृपा उसे न मिले तो अकेले कृष्ण से उसे क्या काम? वह उनकी उपेक्षा करती है।  उन्हें कृष्ण से कुछ लेना देना नहीं | कृष्ण उनकी अपेक्षा रखते हैं, वे कृष्ण की अपेक्षा नहीं रखतीं। कृष्ण राधा के प्रेम के वशीभूत हैं, और राधा से उनके मिलन में उनकी यह किंकरियाँ सहायक हैं। इसलिये उलटा वे ही इनके आगे हाथ जोड़े रहते हैं, इनकी चाटुकारी करते रहते हैं। रूप गोस्वामी की ‘चाटु पुष्पाञ्जलि’ के इस श्लोक से यह कितना स्पष्ट है-

“करुणां महुरर्थयेपरं तव वृन्दावन चक्रवर्त्तिनी।

अपिकेशिरिपोर्यया भवेत्स चाटु प्रार्थनभाजनं॥*

-हे वृन्दावन चक्रवर्तिनि! ‘मैं बार-बार तुम्हारी ऐसी कृपा की प्रार्थना करता हूँ, जिससे मैं तुम्हारी प्रिय सखी बनूं। तुम जब मानिनी हो तो कृष्ण तुम से मिलने के लिए मेरी चाटुकारी करें और मैं उनका हाथ पकड़कर उन्हें तुम्हारे पास ले आऊँ।

glory4mar12-002

श्री रूप गोस्वामी के अनुसार श्री रूप मंजरी आदि के आनुगत्य में अपने अन्तःशचन्तित सिद्ध देह से श्री राधा कृष्ण की सेवा करना ही गौडीय वैष्णव साधकों का मुख्य भजन है|

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *