MATHURA RATI KE PRAKAR- साधारणी,समञ्जसा,समर्था

 मधुरा रति के तीन प्रकार हैं- साधरणी, समञ्जसा और समर्था। साधारणी रति में अपने सुख  की इच्छा ही मूलरूप से वर्तमान में रहती है , जैसे कुब्जा में|

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कुब्जा को जब सुंदर शरीर प्राप्त हुआ । तो उसने उस शरीर से भगवान से संबध बनाने के लिए सोचा |साधरणी रति श्रीकृष्ण के साक्षात दर्शन से और आत्मसुख-वासना से उत्पन्न होती हैं।साधारणी रति में स्वसुख वासनामयी सम्भोगेच्छा की ही प्रधानता होती है|

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समञ्जसा-रति पति-पत्नी के सम्बन्ध जनित अभिमान से उदित होती है। इसमें कर्तव्य-बुद्धि से पति को सुख पहुँचाने की इच्छा के साथ-साथ सम्भोग-इच्छा भी होती है, जैसे द्वारका की महिर्षियों में। समञ्जसा-रति स्वाभाविक है, तो भी इसका अन्मेष श्रीकृष्ण के गुणादि श्रवण से होता है। समञ्जसा-रति में कभी-कभी स्वसुख वासनामयी सम्भोगेच्छा भी  होती है, समञ्जसा-रति रुकमणि आदि श्रीकृष्ण की सेवा के लिये लालायित  होते हुए भी श्री  कृष्ण के लिये धर्म को तिलाञ्जलि नहीं दे सकतीं। इसलिये उन्होंने यज्ञादि सम्पादन पूर्वक विधिवत विवाह करके ही श्रीकृष्ण की सेवा करने की इच्छा की।

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समर्था-रति में किसी भी समय स्वसुख वासनामयी-सम्भोगेच्छा नहीं होती। पत्थर में जिस प्रकार सुई की नोंक भी प्रवेश नहीं कर सकती, उसी प्रकार समर्था रतिमती व्रज सुन्दरियों में कृष्ण सुखवासना के सिवा और कोई वासना प्रवेश नहीं कर सकती |समर्था रति में केवल श्रीकृष्ण के सुख की वासना रहती है। यह केवल व्रजगोपियों में ही होती है।समर्थारतिमती व्रज-सुन्दरियों की कृष्ण-सेवा की लालसा इतनी प्रबल थी कि उन्होंने उसके लिये लोक धर्म, वेद धर्म, आर्यपथादि को तिलाञ्जलि देने में भी संकोच नहीं किया।

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समर्थारति को समर्था इसलिये ही कहते हैं कि यह कुल, धर्म, धैर्य, लज्जा आदि का तृणवत त्यागकर कृष्ण-सेवा के अपने लक्ष्य की ओर तीर की तरह छूट पड़ने की और कृष्ण को पूर्णरूप से वशीभूत करने की असाधारण सामर्थ्य रखती है।  समर्थारति महाभाव की  सीमा तक वर्द्धित होती है। इसलिए समर्थारतिमति व्रजगोपियों का प्रेम ही सबसे श्रेष्ठ है। व्रज-गोपियों में भी राधा का प्रेम सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि केवल राधा में ही समर्थारति की चरम-परिणति मादनाख्य महाभाव देखने में आता है।

 

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