Prakashanand Ko Mahaprabhu Dwara Samjhaana

प्रकाशनन्द महाप्रभु के घोर विरोधी रहे| उन्हें जब पता चला कि महाप्रभु काशी आ रहे हैं तो वे प्रसन्न थे क्योंकि अब उन्हें उस भावुक संयासी को सबक सिखाने और उस पर शासन करने का अवसर मिलेगा|

प्रकाशानंद की सभा में महाप्रभु आये एवं पाद प्रच्छालन के स्थान पर पाद प्रच्छालन किया और वहीँ बैठ गये| प्रकाशानंद, महाप्रभु को देखकर भी नही देखना चाह रहे थे परन्तु उनके तेजोमय मुखार्विन्द की दिव्य कान्ति देखते ही रह गये| महाप्रभु के सरल स्वभाव एवं दीनता को देख प्रकाशानंद उठे एवं महाप्रभु का हाथ पकड़कर सभा के बीच में ले आये| उन्होंने महाप्रभु से पूछा,” आप हमसे दूर क्यों रहते हैं?” महाप्रभु चुप रहे| फिर प्रकाशानंद बोले,” आपका तेज देखकर लगता है कि आप साक्षात् नारायण हैं| आपसे विनम्र भाव से पूछना चाहता हूँ कि आप वेद पाठ न कर, नृत्य कीर्तन आदि, जो सन्यासियों के लिए उचित नही है, उसमे लीन रहते हैं| आप ऐसा धर्म विरुद्ध और निंदनीय कार्य क्यों करते हैं?” सभा में सभी लोग महाप्रभु से उत्तर सुनने के लिए प्रतीक्षारत थे|

mahaprabhu-prakashananda

महाप्रभु ने सर झुकाते हुए उत्तर दिया| उन्होंने कहा ,” जब मैंने गुरु मंत्र लिया तो मुझे मूर्ख देखकर गुरूजी ने कहा,” बेटा तुम मूर्ख हो, वेदांत पढ़ने योग्य नहीं हो परन्तु चिंता की बात नही है| वेदांत के बदले मै तुम्हे अति उत्तम वस्तु दे रहा हूँ|” गुरुदेव बोले,” कली काल में नाम को छोड़कर कोई गति नही है| इसलिए तुम कृष्ण नाम का जप किया करो| तुम्हे और कुछ करने की आवश्यकता नही है| इसी से तुम्हारा कर्म बंधन कट जाएगा और तुम्हे ब्रह्मा तक को दुर्लभ कृष्ण प्रेम धन की प्राप्ति होगी|”

महाप्रभु ने आगे कहा,” मै गुरुदेव की आज्ञा पाकर दृढ़ता से नाम जप करने लगा| नाम लेते लेते धीरे- धीरे मेरी सारी प्रकृति बदल गयी| मै कभी रोता, कभी हँसता, कभी गाता, कभी नृत्य करता| मेरी अवस्था पागलों जैसी हो गयी| मैं सोचने लगा कि क्या मैं सच मुच पागल हो गया? भयभीत हो गुरूजी के पास गया| निवेदन किया, “गुरुदेव आपने मुझे कैसा मंत्र दिया? इसे जपते-जपते मेरी अजीब दशा हो गयी है| मै हर समय हँसता, रोता, नाचता, गाता रहता हूँ| एक प्रकार से पागल हो गया हूँ| इस विपदा से मेरा उद्धार करने की कृपा करें|”

OLYMPUS DIGITAL CAMERA

गुरुदेव हंसकर बोले,” विपदा नही, ये तुम्हारी सम्पदा है| तुम्हारा मंत्र सिद्ध हो गया है| तुम्हें कृष्ण प्रेम की प्राप्ति हो गयी है| कृष्ण नाम का फल तुम्हे मिल गया है| यही परम पुरुषार्थ है| अब तुम ऐसे ही भक्तों के साथ नृत्य कीर्तन कर संसार का उद्धार करो|”

श्रीमद भागवतम में 11-2-40 में कहा गया है ” इसी प्रकार अनुराग विचलित चित्त हो जो उच्च स्वर से अपना प्रिय कृष्ण नाम लेकर हास्य, रोदन, हुंकार, गीत और नृत्य करते हैं वे संसार से स्वतंत्र रहकर जीवों की रक्षा करते हैं|”

“गुरु के वाक्य सुनकर मेरी शंका दूर हुई और भय जाता रहा| हरिनाम में मेरा विश्वास और भी दृढ़ हो गया| तबसे मैं दृढ़ता पूर्वक नाम जप करता हूँ, नाचता गाता हूँ, अपनी इच्छा से नही, नाम ही मुझे नचाता, रुलाता और हंसाता है|”

इसके पश्चात महाप्रभु ने प्रकाशानंद जी की उस समस्या का भी हल किया जिसमे वे वेदांत की टीका के बारे में कहते थे|

महाप्रभु ने बताया कि हमें वेदांत की टीका करने की कोई आवश्यकता नही| वेदांत की टीका तो स्वयं महर्षि वेद व्यास श्रीमद भागवतम के रूप में कर गये हैं| महाप्रभु के वचन सन्यासियों के ह्रदय को सींच कर कोमल कर रहे थे|

||जय जय श्री राधे||

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *