Prehlad Ka Vishwas

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प्रहलाद नाम सुनते ही होलिका दहन का दृश्य आँखों के सामने अनायास ही आ जाता है| होलिका, प्रहलाद को गोदी में बैठकर आग में बैठी थी| प्रह्लाद को कुछ नही हुआ और होलिका जल गयी, जबकि होलिका को वरदान प्राप्त था कि वो अग्नि में नही जलेगी| आखिर ये कैसे संभव हुआ?आओ, प्रहलाद का भगवान पर विश्वास कितना दृढ़ था, इस पर प्रकाश डालते हैं|

एक बार प्रहलाद महल के बाहर घूम रहे थे कि एक कुम्हार की कुटिया के आगे आकर रुक गये| कुम्भारण ज़ोर ज़ोर से भगवान का नाम ले रही थी| प्रहलाद उसके पास गये और बोले,” तुम ये किसका नाम ले रही हो?” कुम्भारण बोली ,”मै भगवान का नाम ले रही हूँ|” प्रहलाद बोले, “भगवान तो मेरे पिता हैं परन्तु तुम उनका नाम तो नही ले रही हो?” वो बोली, “बेटा, मैंने मटके बनाकर मिटटी पकाने के लिए आग के अन्दर रख दिए हैं और भट्टी जला दी है| बादमे मुझे याद आया कि एक मटके में तो बिल्ली के बच्चे थे| अब मै परेशान हो रही हूँ की बच्चे  आग में मर जाएँगे, इसलिए भगवान का नाम ले रही हूँ| वे ही इन बच्चों को बचा सकते हैं| तुम्हारे पिता का नाम लेने से इन बच्चों को नही बचाया जा सकता| प्रहलाद हैरान होकर कुम्भारण से पूछने लगा कि जो नाम तुम ले रही हो, उससे बच्चे बच जाएँगे?” कुम्भारण बोली,” यदि भगवान ने चाहा तो क्या नही हो सकता?” वे सब कुछ कर सकते हैं| वे इन बच्चों को बचा भी सकते हैं|”

प्रहलाद वहीँ कुम्भारण के पास बैठ गया एवं भट्टी के ठन्डे होने कि प्रतीक्षा करने लगा| कुम्भारण ने भट्टी को जैसे ही खोला, बिल्ली के बच्चे भागते भागते उसमे से बाहर आगये| प्रहलाद ने जब ये दृश्य देखा तब उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी कि यह कैसे संभव है? बच्चे जीवित कैसे निकले? कुम्भारण ने प्रहलाद को बताया, “बेटा, भगवान के नाम में इतनी शक्ति है कि मै शब्दों में वर्णन नही कर सकती|

अब प्रहलाद बदले बदले से हो गये थे| उन्हें समझ आ गया था कि भगवान मेरे पिता नही हैं अपितु श्री नारायण हैं, जो की कुछ भी कर सकते हैं| जब भी उसके पिता प्रहलाद को समझाते, “बेटा मेरा नाम लो|” वो कहता, “पिताजी आप भगवान नही हैं|भगवान तो कुछ भी कर सकतें हैं| क्या आप किसी मरते व्यक्ति को जीवन दे सकते हो? आप भगवान नही हैं पिताजी| आप भी भगवान का नाम लो|” प्रहलाद के पिता हिरणाकश्यप को बहुत क्रोध आया कि ये कैसी बहकी बातें कर रहा है? उन्होंने प्रहलाद की शिक्षा का प्रबंध किया तथा शिक्षक जब कहते हिरणाकश्यप भगवान हैं, ये बात प्रहलाद के गले नही उतरती थी| वो सभी बच्चों को भगवान कि बातें बताने लगता तथा उन्हें भी समझाता कि मेरे पिता भगवान नही हैं|

हिरणाकश्यप जब प्रहलाद को हर तरह से समझाने में नाकामयाब हो गये तो सैनिकों को प्रहलाद का वध करने का आदेश दिया| अब सोचो जिसकी हत्या का आदेश उसका पिता दे रहा हो, उस बच्चे को कौन बचा सकता है? सबको यही लगा की अब तो प्रहलाद कि मृत्यु निश्चित है| प्रहलाद की माँ, कयादु , का रो – रो कर बुरा हाल हो गया| वो श्री भगवान को याद करने लगी की भगवान अब आप ही प्रहलाद की रक्षा करना| भक्त की करुण पुकार तो भगवान को भी मजबूर कर देती है| वो भले ही नही दिखे परन्तु भक्त की कदम कदम पर स्वयं या गुरु महाराज से रक्षा करवा रहे होते हैं| प्रहलाद को बिल्ली के बच्चों वाली बात याद थी| वो सिर्फ 5 वर्ष के थे फिर भी उन्हें विश्वास था कि भगवान मेरी रक्षा करेंगे| वो हर सांस में भगवान का नाम लेता था तथा अपने पिताजी को भी समझा रहा था कि पिताजी आप भी भगवान का नाम लो|

सैनिकों ने नन्हे प्रहलाद के ऊपर तलवार से वार किया, तलवार गर्दन को छू भी न सकी| अब तो सैनिकों ने मासूम प्रहलाद पर चारों तरफ से तलवारों से वार किया परन्तु ये क्या? तलवार तो उस मासूम के शरीर को छु भी न पाई| हिरणाकश्यप बौखला गया| बौखलाहट में उसने आदेश दिया कि इसको पहाड़ो से नीचे गिरा दो| सैनिकों ने प्रहलाद को पहाड़ों से नीचे गिरा दिया परन्तु वो देख कर हैरान हो गये कि कोई अदृश्य शक्ति ने प्रहलाद को गोदी में उठा लिया है तथा धीरे धीरे पहाड़ों से नीचे उतारा है| अब तो सैनिकों को भी प्रहलाद कि बातों में विश्वास होने लगा था|

हिरणाकश्यप चिंतित हो गये तभी उनकी बहन होलिका ने कहा, “मुझे वरदान प्राप्त है, मुझे अग्नि नहीं जला सकती”, परन्तु वो भी जलकर मर गयी|

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फिर प्रहलाद ने पिता से कहा कि पिताजी आप मान भी लो , भगवान हर जगह हैं, वे मेरी रक्षा कर रहे हैं| पिता की आँखें क्रोध की अग्नि से लाल हो रही थी| वे प्रहलाद से कहने लगे बता कहाँ है तेरा भगवान? प्रहलाद बोले पिताजी ये पूछो कि वे कहाँ नही हैं? वे तो कण कण में हैं| पिताजी ने प्रहलाद से पूछा,” बता इस खम्बे में हैं तुम्हारे भगवान?”  प्रहलाद बोले,” हाँ, इस खम्बे में भी भगवान हैं|” हिरणाकश्यप ने गदा लेकर खम्बा तोड़ना चाहा, “बता कहाँ हैं तेरे भगवान? बता कहाँ हैं तेरे भगवान?” एक दम खम्बे से नरसिंह भगवान प्रकट हो गये |

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उन्होंने हिरणाकश्यप को पकड़ कर कहा, “देखो, अभी न दिन है न रात है, मैं न मनुष्य हूँ न जानवर हूँ , तुम न अन्दर हो न बाहर हो, तुम न धरती पे हो न आकाश पे हो|” ये कहकर नरसिंह भगवान ने हिरणाकश्यप का वध कर दिया|

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आओ अब प्रहलाद के जन्म से पहले का वृतान्त सुनो-

प्रहलाद कि माता तो भगवान कि भक्त थी, परन्तु पिता को किसी बहाने नारायण नारायण कहलाकर कयादु ने पति संग किया| जब कयादु के गर्भ में बालक आगया तब देवता घबरा गये कि हिरणाकश्यप का बेटा भी अत्याचारी ही होगा, इसको जन्म ही नही लेने दो| वे कयादु को मारने के लिए लेकर जा रहे थे कि नारद मुनि ने देवताओं को रोका तथा कयादु को मारने से मना किया| वे कयादु को अपने घर ले गये तथा कयादु को प्रतिदिन भगवान की कथाएँ, शास्त्रों का ज्ञान देने लगे| कयादु के गर्भ में अचेतन मन से बच्चा सब बातें सुन रहा था| शास्त्रों में कई उदाहरण हैं कि बच्चा गर्भ में सब कुछ सुन रहा होता है| अभिमन्यु ने भी चक्रव्यूह में घुसना माँ के गर्भ से ही सीखा था| प्रहलाद में माँ के गर्भ से ही भक्ति के बीज थे|

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भगवान तो सब जगह मौजूद हैं परन्तु उनको जानने वाला व्यक्ति चाहिए| खम्बे तो करोडों है परन्तु एक प्रहलाद तो चाहिए|

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