Prem Prapti Ke Star-Shri Roop Goswami Paad

प्रेम प्राप्ति के स्तर

श्री रूप गोस्वामी ने प्रेम प्राप्ति के 8 स्तर बताये हैं तथा प्रत्येक साधक को इन 8 स्तरों को पार करना ज़रूरी होता है.

Srila-Rupa-Gosvami

  1. श्रद्धा

भक्ति का बीज स्वरुप श्रद्धा है. भक्ति में उत्साह बना रहे तथा साधक को भगवान के विषय की जानकारी प्राप्त करने के लिए व्यग्र कर दे. कैसी भी परिस्थिति आये , साधक अपने राधा कृष्ण पर विश्वास पक्का रखे. अपने विश्वास में डगमगाए नही तभी श्रद्धा स्थिर मानी जाएगी.

  1. साधु संग

जब ह्रदय में श्रद्धा जागृत होती है तथा श्रद्धा मज़बूत होती है तो साधक के मन में साधू संग की इच्छा जागृत होती है. वह महापुरुष के गुणों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करता है और उनके उपदेशों के अनुसार चलता है.

  1. भजन क्रिया

भगवान के उपदेशों को सुनना, महापुरुष की वाणी सुनना एवं भगवान का कीर्तन करना तथा भजन में दृढ़ता होनी चाहिए.

  1. अनर्थ निवृति

अब भजन क्रिया दृढ़ता पूर्वक चलता है तथा लगातार हरिनाम लेने से एवं श्री राधाकृष्ण सेवा को छोड़कर सब प्रकार की कामनाओं का नाश हो जाता है. तब अनर्थ निवृत्ति होती है. श्री गुरु भी अनर्थ निवृत्ति में साधक की बहुत  मदद करते हैं.

  1. निष्ठा

अनर्थ निवृत्ति के पश्चात भक्ति में दृढ़ता आती है तथा साधक का मन लगातार हरिनाम करने को होता है. निष्ठा होने पर साधक अपने शरीर से मन से एवं वाक्य से प्रभु की सेवा करता है, लीला का स्मरण करता है. उसमें मैत्रयी,दया,शम,दम, तितिक्षा, दैन्यता आदि के गुण सहज ही प्राप्त होजाते हैं.

  1. रूचि

निष्ठा से रूचि उत्पन होती है. इस अवस्था में श्रवण कीर्तन आदि भक्ति के अंगो का बार बार अनुशीलन करने पर भी अरुचि या श्रम नही होता है. जब साधक में रूचि का उदय होता है तब वह कीर्तन के ताल लय आदि की अपेक्षा नही करता अपितु भगवान के नाम या लीला का कीर्तन जैसा भी हो उसे सुनकर उल्लासित होता है .

  1. आसक्ति

रूचि से आसक्ति उत्पन होती है. अब चित्त श्री भगवान में अधिक आसक्त रहता है. इस अवस्था में भगवान व्यक्ति के मन और बुद्धि पर ऐसे छाये रहते हैं कि उसका हाव भाव , बोलचाल, आहार विहार आदि सब अजीब सा प्रतीत होता है.

  1. भाव या रति

जब आसक्ति गाढ़तम होजाए तो वह भाव या रति में बदल जाती है. भाव की अवस्था में साधक स्फूर्ति में मानो श्री कृष्ण को साक्षात पाकर आनंदित होता है. भाव, प्रेम कल्प वृक्ष का अंकुर है. इन्द्रियों के विषय से उसे विरक्ति हो जाती है. वह एक क्षण भी भगवान के स्मरण मनन के बिना नही रह सकता तथा वह अभिमान रहित हो जाता है. श्री कृष्ण की प्राप्ति होगी ये उसकी दृढ़ आशा रहती है. कृष्ण प्राप्ति का उसे गुरुतर लोभ रहता है जिसे समुत्कंठा कहा जाता है. भगवान के नाम, गान में रूचि, भगवान के गुण गान में आसक्ति तथा भगवान के धाम में हमेशा प्रीति रहती है.

प्रेम प्राप्ति

भाव गाढता प्राप्त कर प्रेम में बदल जाता है प्रेम की दशा में साधक को सच मुच भगवान के साक्षात दर्शन होते हैं. वह उनके सौंदर्य एवं माधुर्य का दर्शन कर चमत्कृत होजाता है तब उसे अकथनीय आनंद प्राप्त होता है.

1-raghu-radha

प्रेम के ऊपर का स्तर है स्नेह , मान, प्रणय, राग, अनुराग और महाभाव – यह साधक का देह रहते संभव नही है क्योंकि इनके आस्वादन की उषणता और शीतलता को सहन करने की उसकी देह में सामर्थ्य नही है.

जय जय श्री राधे

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *