गुरुतत्व का विज्ञान

श्री गुरुदेव वह होते हैं जो हाथ पकड़ कर ले जाए और भगवान से मिला दे।  भगवान स्वयं कहते हैं कि , श्री गुरुदेव को मेरा  ही स्वरूप  जानो , तथा  कभी भी उनकी अवज्ञा मत करो ।  मनुष्य को कभी भी  मन  से उनके प्रति ईर्ष्या या ज्ञेय का भाव नहीं लाना  चाहिए । हालाँकि श्रीगुरुदेव, श्रीकृष्ण के प्रिय भक्त हैँ , फिर भी   शिष्य को चाहिए कि  उन्हें साक्षात् श्री कृष्ण का रूप ही माने  । यह भावना नहीं आने  पर शिष्य के मन में मर्त्याबुद्धि का उदय हो सकता है, जो महा अपराध होगा और   जिससे हाथी के स्नान के समान भक्त का  साधन भजन सब कुछ निष्फल हो जायेगा।

भजन करने के लिए श्री गुरुदेव के चरणो के आश्रय  की अत्यंत आवश्यकता होती है ।  जब हम भक्ति मार्ग में प्रवेश करते हैं और  अपने मन से भक्ति प्रारंभ करते हैं। तो मन में कई संशय उठते हैं ।कोई कहता है हरि नाम लो,कोई कहता है कि  अमुक देवता की पूजा करो, कोई कहता है कि  गंगा स्नान से पाप धुल जायेंगे , कोई कहता है कि  भगवान् से स्वास्थ्य मांगो  , धन मांगो ।  परन्तु  भक्त को जो आसान तरीका लगता है, जिससे भगवान  जल्दी प्रसन्न हो जाए, वह वो तरीका अपनाता है । अगर   भक्त  यह  सोच कर   पूजा करने लगे कि वह जो मांगे उसे वो सब मिल जाए ,  इस तरह से  भक्ति आगे नही बढ सकती  ।

जब जीवन में सद्गुरु का प्रवेश होता है तो वह अन्दर ही अन्दर से शिष्य  को शुद्ध करता रहता है और साथ ही साथ शिष्य का ध्यान भी रखता है ।  गुरु अपने शिष्य को सही राह दिखता है तथा बताता  है कि  भगवान केवल श्री कृष्ण हैं।  कभी कभी गुरुदेव  चित्त शुद्धि  के लिए सख्त  कदम भी उठाते हैं, हालांकि  वह सब  शिष्य की भलाई के लिए ही  होता है ।   इसलिए यदि जीवन में सद्गुरु मिले तो यही समझना चाहिए की भगवान  ने उनके ऊपर  विशेष कृपा की है।

भगवान  कहते हैं जीव को बहुत  ही  दुर्लभं  नर देह की प्राप्ति हुई है।  इस नर देह रुपी नौका के कर्णधार –  श्री गुरुदेव हैं। वही  अनुकूल वायुरूप से प्रवाहित होकर इस नौका को पार लगा देते हैँ   ।  जो व्यक्ति नर देह पाकर भी भवसिंधु पार जाने का प्रयत्न ना  करे ,  वह स्वयं ही अपने विनाश का कारण  बनता है।

सत्संग से ही गुरु की आवश्यकता महसूस होती है। जहाँ पर  गुरु पादाश्रय की आवश्यकता का ज्ञान नही हुआ , तो समझना चाहिए कि  सत्संग नही हुआ। सद्गुरु के निकट दीक्षा शिक्षा ग्रहण के बाद ही भजन आरम्भ होता है।

 सद्गुरु के क्या लक्षण होने चाहिए?  कैसे पहचाना जाए कि  कोई सद्गुरु है?

सद्गुरु को शास्त्रों का पूरा ज्ञान होना चाहिये।  उन्हें श्री कृष्ण का   प्रत्यक्ष अनुभव होना चाहिये, जिससे वे शक्ति संपन्न हो जाए तथा शिष्य में भी शक्ति का संचार कर सकें और शिष्य को भक्तिपथ में लाने में सक्षम हो ,तथा  काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से परे होने  चाहिए । वे हमेशा भगवान के बारे में बताएँ।

वे स्वयं भी अपने श्री गुरुचरण में  भक्ति लाभ प्राप्त  किये हुए हों  । ऐसे लक्षण वाले ही  सद्गुरु कहलाते हैं। सद्गुरु ही शिष्य की  भजन की  प्रतिकूल परिस्थितियोँ का विनाश कर , उसे प्रेमदान से धन्य कर, श्री कृष्ण के चरण के समीप पहुंचा देने में सक्षम होते हैं।

सद्गुरु का मिलना अति कठिन है। सबसे पहले  तो सद्गुरु को पहचानना  और फिर सद्गुरु को पाना बहुत ही कठिन है। आजकल भक्ति मार्ग में बहुत धोखे हैं। व्यक्ति समझ ही नही पाता कि  उसे किस मार्ग को पकड़ना है।  इसलिए वह  दीक्षा ग्रहण का कोई प्रयत्न ही नही करता  मानव जीवन के अनमोल क्षणों को यूँ ही गंवा देता है।  व्यक्ति  यदि कुटिलता को छोड़कर , सरल मन  से सत्संग करते  हैँ और  सांसारिक  दुःखों  से निवृत्ति के लिए  निष्कपट भाव से सद्गुरु के चरणों का सहारा लेकर भजन करते हैं ,एवं  भगवद उद्देश्य से प्रार्थना करते हैं तो वे अवश्य ही गुरु कृपा से धन्य होते हैं,इसमें कुछ भी संदेह  नही है।

दीक्षा किसे कहते है ?

जो दिव्यज्ञान दान करे एवं पाप का नाश  करे ,तत्ववेता आचार्यागण उसे ही दीक्षा नाम प्रदान करते हैं। जो  श्री कृष्ण का नित्य दास है परन्तु अपना स्वरुप भूलकर इस देह को ही “मैं ” जानकार , श्री हरि के साथ नित्य सम्बन्ध को भुलाकर, स्त्री, पुरुष, अर्थ से सम्बन्ध जोड़कर वृद्धावस्था  को प्राप्त हो रहा है एवं चौरासी लाख योनियों में आ जा रहा है। ऐसे व्यक्ति के मन में  श्री सद्गुरु   माया के बंधन को शिथिल कर , उसके मन में   भक्ति का संचार कर, श्री हरि के साथ जीव के नित्य सम्बन्ध  की याद दिला  देते हैं , इसे ही दीक्षा कहते हैं।

सद्गुरु  दीक्षा ग्रहण की इस प्रकार की महिमा जानते हुए भी जो यह मानते है कि दीक्षा ग्रहण की कोई आवश्यकता नही है ,  केवल हरि नाम से सब हो जायेगा, आध्यात्मिक विषय में वे अपनी कितनी क्षति कर रहे हैं , वे खुद भी नही जानते।

जो मंत्र दान करे उन्हें दीक्षा और जो भजन दान करे उन्हें शिक्षा , गुरु के द्वारा दी जाती  हैं।  श्री गुरु के निकट से ही मंत्र विधि , शास्त्र ज्ञान का  लाभ प्राप्त  करना चाहिए।इससे समझा जाता है कि दीक्षा दान जिनका कार्य है ,  मंत्र विधि विषयक  शिक्षा दान भी उन्ही का कार्य है।

श्री सद्गुरु की सेवा :

श्री गुरु  के पास से दीक्षा ग्रहण करके ही साधक के कर्तव्य  समाप्त नही हो जाते। दीक्षा ग्रहण के बाद श्री गुरुदेव की सेवा अति आवश्यक है। श्री गुरुदेव की प्रसन्नता ही  साधक के  अनर्थनाश एवं भगवत प्रसन्नता का कारण  है।  साधक जब भक्तिमार्ग में चलना शुरू करता है तब पूर्व  जन्मों  के अथवा इस जन्म के अपराधो से उत्पन्न अनर्थ सामने  आकर  भजन में बाधा बनते हैं। साधक कितने भी प्रयत्न कर ले वह उन अनर्थो से छुटकारा पाने में सक्षम नहीं होता ।  उन सब अनर्थो के नाश का एकमात्र उपाय ,  श्रीगुरु की प्रसन्नता ही है। एवं भगवान् की प्रसन्नता भी श्री गुरु की प्रसन्नता से जुडी हुई है । जब साधक निष्कपट होकर  श्रीगुरुदेव की सेवा करता है तभी श्री गुरु प्रसन्न होते हैं।

काम पर विजय पाने के लिए संकल्प वर्जित होना चाहिए । क्रोध को जीतने के लिए काम का नाश  करना चाहिए। भोग्यावस्तु मात्र  के अनर्थ ज्ञान से ही लोभ को जीता जा सकता है। निरंतर तत्व अनुशीलन से भय दूर होता है। प्रकृति पुरुष के विवेकोदय से मोह दूर होता है। साधू पुरुष की सेवा से दंभ दूर होता है। काम चेष्टा का त्याग करने से हिंसा दूर होती है । कृपा गुण अर्जित करने से अदिभोतिक दुःख की निवृत्ति होती है। समाधी के बल से अधिदैविक ताप का नाश होता है। अष्टांग योग के प्रभाव से अध्यात्मिक क्लेश समाप्त होते हैं। सत्व गुण से निद्रा पर विजय प्राप्त की जा सकती है।  । सत्वगुण की अधिकता से रजोगुण , तमोगुण को जीता जाता है। इस प्रकार एक एक साधन से एक एक अनर्थ समाप्त होता है किन्तु साधक एक मात्र गुरु भक्ति से एक साथ समस्त अनर्थो पर  अनायास ही विजय प्राप्त करने  में समर्थ होता है।

दीक्षा ग्रहण के पश्चात साधक नित्य श्रवण , कीर्तन , वंदन आदि द्वारा श्री हरि की उपासना करते हैं । श्री गुरुदेव का अर्चन , वंदन आदि भी उसी के अंतर्गत ही  आता  है। यदि कोई साधक श्री गुरु सेवा को मुख्य रखते हुए भगवत श्रवण , कीर्तन आदि भजनांग उसके अनुषांगिक रूप से अनुष्ठान करते हैं, तो इसे विशेष गुरु सेवा कहा जाता है। श्री गुरु के संतुष्ट होने से श्री हरि स्वयं  ही तुष्ट हो जाते हैं। जो मंत्र है , वह गुरु ही साक्षात है,जो गुरु है वही हरि स्वयं है, जिसके प्रति गुरु संतुष्ट है स्वयं हरि भी उसके प्रति संतुष्ट हो जाते हैं।

श्री गुरु सेवा में सावधानी :

श्री गुरु सेवा में साधक को विशेष सावधानी की नितांत आवश्यकता है ।गुरुसेवा में अगर लघु विचार आने लगे  तो “गुर्ववज्ञा” रूप नाम अपराध उत्पन्न हो जाता है   और साधक को  गुरु फल से वंचित कर देता है।

 सावधानियां कई प्रकार की है :

  • श्री गुरु के वाक्य का कभी भी उल्लघंन  ना करें।
  • श्री गुरु की पादुका , वस्त्र, स्नान जल , शैय्या इत्यादि व्यवहार योग्य वस्तुओं का कभी लंघन ना करें।
  • श्री गुरु का नामौचारण करते हुए दोनों हाथ जोड़कर “अष्टोत्तरशत श्री श्री” ॐ विष्णु पाद या ‘प्रभुपाद’ इत्यादि सम्मान सूचक वाक्य  उच्चारण के बाद बोलना चाहिए।
  • श्री गुरु के गमन , उनके भाषण , उनके स्वर आदि , किसी भी  चेष्ठा का अनुकरण नही करना चाहिए।
  • श्री गुरु के समीप पाद प्रसारण करना, जंघा के ऊपर पद स्थापन करना , अपना पैर दिखलाई पड़े इस प्रकार से बैठना आदि कभी नही करना चाहिए।
  • श्री गुरु देव के आगे जम्हाई , उच्च हास्य , ऊँगली चटकाना , अंग हिलाना , हाथ पैर आदि शरीर के किसी अंग को नचाना  आदि नही करना चाहिए।
  • श्री गुरु के सामने जाने पर उनकी आज्ञा के बिना कभी ना बैठें, हाथ जोड़कर सामने खड़े रहे।
  • श्री गुरुदेव के समीप शैय्या पर शयन ना करें ।
  • श्री गुरु के निकट रहने के समय उनके आदेश के बिना कहीं नही जाएँ।
  • श्री गुरु के आगे अन्य किसी की पूजा , वंदना आदि ना करें।
  • श्री गुरु की आज्ञा के बिना शास्त्र व्याख्या, दीक्षा दान इत्यादि ना करें।
  • श्री गुरु के समक्ष अन्य के प्रति प्रभुत्व प्रकाश व तिरस्कार नही करना चाहिए।
  • श्री गुरु के ताड़न – भर्त्सन  आदि के प्रति सहिष्णु होना चाहिए । कदापि उनके प्रति विद्वेष आचरण  ना करें।
  • श्री गुरु के सम्मुख हस्त चालन । नयन चालन आदि सांकेतिक व्यवहार ना करें। श्री गुरु देव की कोई वस्तु उनके बिना जाने ना लें।
  • श्री गुरु के सम्मुख मौन भाव से रहना उनका स्तव आदि ना करना, भजन विषयक कोई प्रश्न ना करना अपराध जनक है। मौन व्रत अवलंबन करते हुए भी श्री गुरु के पास मौन व्रत ना रहे।
  • कोई व्यक्ति श्री गुरु की निंदा करे तो वहां ना जाएँ। गुरु निंदा सुनने पर कान में हाथ देकर श्री हरि का स्मरण करते हुए स्थान त्याग दें। श्री गुरु के निंदक का संग तथा मुख दर्शन तक निषिद्ध है।
  • श्री गुरु के आगमनं पर उनके आगे साष्टांग प्रणाम करना चाहिए, उनके चलने पर उनके पीछे पीछे चलना चाहिए ।
  • श्री गुरु का पाद प्रक्षालन , स्नान आदि का जल स्वयं लाना चाहिए। श्री गुरुदेव का अंग मार्जन स्नापन , चन्दन आदि अनुलेपन , वस्त्र धौत , पाद सम्मान आदि स्वयं करना चाहिए।
  • श्री गुरु देव के घर आँगन की सफाई , लेप भी स्वयं करें। श्री गुरुदेव को निवेदन कर भगवत प्रसाद ग्रहण करें।
  • श्री गुरुदेव को प्रीतिमय  भाव से , स्निग्ध अंतःकरण  से अपने देह , गेह , धन ,प्राण आदि द्वारा श्री गुरु देव का संतोष विधान करना चाहिए ।

श्री गुरु के विषय में यह समस्त विधि और निषेध समूह पालन करने से साधक  शीघ्र  ही श्री गुरु सेवा के चरम फल – भगवान् के चरणों  में प्रेम भक्ति का लाभ प्राप्त  करके, धन्य एवं कृतार्थ होजाता है।

गुरु सेवा और वैष्णव सेवा, यह दोनों श्री भगवान् की करुणामयी  सेवा है। एक के अभाव में दूसरी अपूर्ण ही रह जाती है  । यदि कोई गुरु मात्सर्य आदि  वशतः  शिष्य को महा भगवत वैष्णव के सेवा कार्य अथवा संग करने का निषेध करे, तो शिष्य को गुरु से इस आदेश वापसी के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। फिर भी यदि गुरु देव इस प्रकार के आदेशों को देते ही रहे तो शिष्य को इसे अपना दुर्भाग्य मान कर, भगवत चरणों में गिरकर उस गुरु की दूर से ही आराधना  करनी चाहिए।  किन्तु गुरु को त्यागना नहीं चाहिए ना ही प्रतिकूल आचरण करना चाहिए।  परन्तु यदि गुरु साक्षात भाव से वैष्णव विद्वेषी हो उठे तो इस प्रकार के गुरु को अवैष्णव  जानकार परित्याग करें और पुनः यथा विधि  से वैष्णव गुरु का चरणाश्रय  ले, भजन करना चाहिए।

जो व्यक्ति वैष्णव शास्त्र नीति के विरुद्ध बात कहे एवं जो व्यक्ति यह नीति रहित बात श्रवण करे वे दोनों ही अक्षय काल व्यापी घोर नरक में वास करते हैं । श्री गुरुदेव का कोई उपदेश यदि शास्त्र विरूद्ध हो इस प्रकार के गुरु का भी संग त्याग कर दूर से ही आराधना करना उचित है।

यदि गुरु स्वयं को ईश्वर रूप में प्रचार करे अथवा श्री कृष्ण गुण कथा श्रवण , कीर्तन विमुख से रहते हो , श्री कृष्ण लीला कथा श्रवण आदि जनित आनंद अनुभवन  करे एवं प्रतिदिन मलिनता प्राप्त हो ,तो उनका परित्याग कर योग्य गुरु का आश्रय ग्रहण करना ही विधेय है।

राधे राधे

3 thoughts on “गुरुतत्व का विज्ञान

  • Jun 1, 2015 at 6:37 am
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    Hare Krishna!!!
    I have read everything about the SADGURU in this website. Can you please tell me that one spiritual master of mine, they always tell us to do meditation on the divine light in the heart and also tell that to live in constant remembrance of master means try to remember master while doing anything, think that not me but the master is doing all of my work on my behalf such as if I am eating think master is eating , if I am walking think that master is walking. He never talked about Krishna or hare krishna mantra but sometime he quote the verses of Srimad bhagwat geeta and sometimes he talked about Krishna but not on regularly . Please put some light on this matter. Thank you . Hare Krishna.

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  • Jun 28, 2015 at 10:31 pm
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    Radhe Radhe Dada,
    1. If you have spiritual master to guide you and you feel that you are progressing spiritually, then follow instructions of your GuruDev.
    2. There are different paths of God Realisation , we follow Bhakti Yoga which is the highest of all paths as per Bhagawat Gita. For more information, Please read chapter 9 of Bhagawat Gita which is “Top Secret Knowledge : Bhakti Yoga”.

    Jai Radhe !!

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  • May 31, 2016 at 12:06 pm
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    SathGurudev Bhagwan Ki Jai!

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