Shabri Ka Prem

शबरी नाम सुनते ही एक बूढ़ी स्त्री का चित्र सामने आ जाता है जो भगवान के प्रेम में वशीभूत होकर भगवान को बेर खिला रही है और वो भी अपने जूठे बेर | उसकी आँखों से छलकता प्रेम अत्यंत लुभावना है | कभी हमने सोचा कि भगवान बड़े-बड़े ऋषि मुनियों की कुटिया में न जाकर उस अछूत शबरी की कुटिया में जूठे बेर खायेंगे| परन्तु ये प्रेम ही तो था जो तीनों लोकों के स्वामी शबरी के हाथ से झूठे बेर बड़े प्रेम से खा रहे है|
शबरी जब 15-16 वर्ष की थी तब शबरी की सेवा से प्रसन्न होकर मतंग मुनि ने उसे आशीर्वाद दिया –
“ तुम्हारी कुटिया में भगवान आयेगे “
“क्या मेरी कुटिया में भगवान् आयेंगे ? कब आयेंगे ? कब आयेंगे मेरी कुटिया में भगवान् | मेरी कुटिया में तो भगवान् आयेंगे | अरे अरे मेरी कुटिया तो गंदी लग रही है , उसे जल्दी से साफ़ कर दूं” – शबरी तो मानों पागल हो गई |

अब तो शबरी रोज भगवान के आने का इन्तजार करने लगी | ऋषि मुनियों के उठने से पहले ही उठ जाती| भगवान् के आने के लिए वो हर रास्ते, हर जगह की सफाई कर देती | शबरी, सुबह-सुबह नदी में नहा धोकर , रास्ते से भगवान के लिए फल फूल ले आती | वह प्रतिदिन पलकें बिछाए भगवान के आने का इंतजार करती और सारे रास्ते को फूलों से सजा कर रखती| क्या पता कब भगवान आ जाएं | प्रतिदिन भगवान् के लिए कोई न कोई फल रखती | उसे चखकर देखती, मीठा होने पर भगवान को खिलाने के लिए रख देती|
रात होने पर उसे लगता आज भगवान नही आये तो कल जरुर आयेंगे | फिर अगले दिन सुबह से भगवान के आने की तैयारी का क्रम शुरू हो जाता |
शबरी को देखकर ऋषि मुनियों के शिष्य उसे कहते कि “ तुम्हारी कुटिया में कहाँ से भगवान आयेगे, भगवान तो बड़े-बड़े ऋषि मुनियों की कुटिया में जायेंगे |”
परन्तु शबरी को अपना लक्ष्य पता था , उसे पूर्ण विश्वास था कि भगवान उसकी कुटिया में अवश्य आएंगे|

दिन बीतते गए, साल बीतते गए | शबरी इसी तरह रोज ,भगवान् के इंतज़ार में लगी रहती | अब शबरी वृद्ध भी हो गई दी | परन्तु मन में दृढ़ निश्चय था कि “ मेरी कुटिया में भगवान अबश्य आएंगे”|
जब श्री राम और लक्ष्मण, सीता की खोज करते हुए वहां आये तो लोगों में उत्साह देखते ही बनता था
“देखो देखो भगवान् आए हैं| साथ में सीता माता और भैया लक्ष्मण भी हैं |”
“सभी ऋषि मुनि भगवान् की तपस्या करते हैं , आज उनकी तपस्या सार्थक हो गयी | देखो भगवान् स्वयं चलकर उनकी कुटिया में पधार रहें हैं “
“हमने भी इनके दर्शन कर लिए , हमारा जन्म भी सार्थक हो गया “
“ अरे अरे ! देखो वो तो सीधा शबरी की कुटिया में जा रहें हैं | यह क्या लीला हैं भगवन ?”
यह कोई लीला नहीं, यह तो भगवान् का प्रेम है| | बड़े-बड़े ऋषि मुनि भगवान् से प्रार्थना करते रह गए – “भगवन कभी तो हमारी कुटिया में पधारें| एक बार ही सही , केवल एक बार भगवन”|
आज तो शबरी के पाँव जमीन पर नहीं पड़ रहे , और पड़ें भी कैसे – आज भगवान् जो उसके घर पधारे हैं| शबरी के प्रेम के आगे भगवान् आने को विवश हो गए | कैसे ना आते ?
शबरी ने जैसे ही भगवान को देखा अपनी सुधबुध सब कुछ भूल गई| भगवान के इंतज़ार में बिछी पलकें , भगवान को देखते ही झपकना भूल गई | बस वो तो भगवान् को प्यार से देखती रह गई| पलकों ने आंसुओं की बारिश कर दी| भीगी पलकों से शबरी भगवान् की सेवा में लग गई |
शबरी ने दोनों हाथों को जोड़कर , भगवान को प्यार से अपने पास बैठाया | फिर खुद जमीन पर बैठकर भगवान् को बेर खिलाने लगी | हर बेर को पहले खुद खाकर देखती , यदि मीठा हुआ तो भगवान् को देती | भगवान् भी शबरी के प्रेम में वशीभूत होकर शबरी के जूठे बेर खाते जा रहे थे |कितने प्यारे हैं हमारे भगवान् जो भक्त के प्रेमभाव में डूब जाते हैं|
उसके बाद भगवान ने शबरी को अपने धाम में भेज दिया, ऐसे धाम जो कि करोड़ों-करोड़ों पुण्यों से भी प्राप्त नहीं होता

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