Shri Krishna Growing Pearls in Hindi – Leela

श्री कृष्ण द्वारा मोतियों की खेती

मुक्ताचरितम में श्री रघुनाथदास गोस्वामी ने भगवान की लीला का वर्णन इस प्रकार किया है-

एक बार श्री कृष्ण की इच्छा हुई कि हंसी और हरिनी नामक दो गायों को मोतियों से सजाने की| उन्होंने श्री राधा एवं अन्य गोपियों से मोती मांगे, सब ने मोती देने असे मना कर दिया| तब वे माँ यशोदा के पास गये तथा माँ से कहने लगे, “मुझे कुछ मोती दो, मै मोतियों की खेती करूँगा|” माँ ने समझाया ,” बेटा, मोती पेड़ों पर नही उगते|

पर श्री कृष्ण अपनी ज़िद्द पर अड़े रहे| अंत में हार कर माँ ने कुछ मोती दे दिए| श्री कृष्ण ने वो मोती उगा दिए|

फिर वे राधा एवं अन्य गोपियों के पास गये एवं उनसे कहने लगे कि तुम लोग मेरी फसल को दूध से सींचो| फसल होने पर कुछ मोती तुमको भी दूंगा| गोपियों ने श्री कृष्ण की मोतियों की खेती की बात का मज़ाक बनाया और दूध से सींचने को मना कर दिया|

 

इधर योग माया की अचिन्त्य शक्ति के कारण मोतियों के खेत में तीन दिन में ही अंकुर फूट आये और सुन्दर सुन्दर मोती फलने लगे|

यह देखकर सभी गोपियाँ हैरान हो गयी| अब श्री राधा रानी एवं अन्य गोपियों ने स्वयं भी मोतियों की खेती करने का विचार किया| वे घर के लोगों को बिना बताये घर से मोती ले आई और मोतियों को बो दिया| साथ ही खेत को दूध, मक्खन से सींचने लगी ताकि उनकी खेती श्री कृष्ण की खेती से भी अच्छी हो और बहुत ज्यादा मोती उगें| कुछ दिन बाद देखा कि मोतियों में कोई अंकुर नही फूटा अपितु जो मोती उगाये थे वे भी चोरी हो गये| इधर श्री कृष्ण के पास मोतियों की खेती की वजह से बहुत सारे मोती थे| वे अपने साथियों, गाय-बैलों और बंदरों तक को भी मोतियों से सजाने लगे|

गोपियाँ चूंकि घर में बिना बताये मोती लायी थी , अब उन्हें डर सताने लगा| वे श्री कृष्ण से मोती मांगने गयी| कृष्ण ने मोती का मूल्य चाहा| बहुत देर तक हास परिहास युक्त लम्बा वाद-विवाद हुआ परन्तु कुछ भी समझौता नही हुआ| गोपियाँ नाराज़ होकर चली गयी और राधा कुंड में बकुल कुंज में जाकर सोचने लगी की अब क्या करें? 

तभी श्री कृष्ण ने अपने सखाओं के हाथ से प्रत्येक गोपी के लिए बहुत सारे मोती भिजवा दिए| गोपियों ने उन मोतियों से श्री राधा को एवं अपने आप को सजाया, फिर घर के बड़ों / गुरुजनों के आगे उन्हें प्रसन्न किया|

यह कथा श्री कृष्ण द्वारिका में सत्यभामा को सुना रहे थे| सुनाते सुनाते वे श्री राधा की याद में धैर्य खो बैठे और रोने लगे| सत्यभामा अपने आँचल वस्त्र से उनके आँसू पोछने लगी|

जय जय श्री राधे||

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