Shri NarottamDas Thakur

राधा कृष्ण प्राण मोर, युगल किशोर
जीवने मरणे गति आर नाहि मोर||

यह मधुर गीत श्री नरोत्तम दास ठाकुर ने लिखा है| पूर्व बंगाल के गगनहाटी परगना का खेतरी गाँव एक छोटे से राज्य की राजधानी था| यह गाँव पद्मा नदी से १ किमी की दूरी पर था| इस छोटे राज्य के अधिपति दो भाई, श्री कृष्णानंद दत्त और श्री पुरुषोत्तम दत्त थे| कृष्णानंद के एक पुत्र रत्न का जन्म हुआ उसका नाम रखा गया ‘नरोत्तम’| बचपन से ही नरोत्तम का स्वभाव शांत था, बुद्धि तेज़ थी, अंग प्रत्यंग सुगठित थे| विद्या अध्ययन में लगातार प्रगति कर रहे थे | खेतरी में कृष्णदास नाम के महाप्रभु के भक्त रहते थे| नरोत्तम उनसे महाप्रभु की लीला कथा बहुत प्रेम से सुनते थे| सुनते-सुनते उनको सुध बुध नही रहती थी| भाव विभोर हो जाते थे| खाना पीना भूल जाते थे| महाप्रभु की कथा के अलावा उन्हें कुछ भी अच्छा नही लगता था|

एक दिन अचानक उन्हें महाप्रभु के अंतर्धान होने का संवाद मिला| वे तो मूर्छित हो गये| तभी कृष्णदास ने उन्हें समझाया कि महाप्रभु अंतर्धान होने के पश्चात वृन्दावन में कहीं छिप गये हैं| अब नरोत्तम को वृन्दावन के अलावा कुछ समझ ही नही आ रहा था| श्री कृष्णदास ने नरोत्तम को बताया था कि पद्मा नदी के तट पर महाप्रभु लाखों लोगों के साथ नृत्य करते हुए दूसरे तट तक आये थे|

महाप्रभु के बारे में सुनकर नरोत्तम भी पद्मा नदी के तट पर खड़े होकर महाप्रभु की लीला के बारे में सोचते तथा आनंदित होते फिर महाप्रभु को पुकारते और रोने लगते| एक दिन नरोत्तम नदी में स्नान करने गये परन्तु वापस नही आये| माता पिता को चिंता हुई, वे नदी तट पर नरू-नरू कहने लगे तभी नरोत्तम माँ के पास आये और रोने का कारण पूछा| माँ ने उसे गले से लगाया तभी नरोत्तम रोने लगा|माँ ने रोने का कारण पूछा तो नरोत्तम ने बताया कि, “आज प्रातः मैं कुछ अचेत अवस्था में नदी में नहाने गया| नदी के तट पर एक गोरे रंग का बच्चा नृत्य करते करते मेरे निकट आया और उसने मुझे आलिंगन किया और वो मेरे अन्दर प्रवेश कर गया| मेरे भीतर प्रवेश होते ही मै नृत्य करने लगा तथा आनंद के कारण रोने लगा| उसके बाद मुझे कुछ ज्ञात नही कि क्या हुआ? फिर माँ की आवाज़ से मैं सचेत हुआ| मै उसी गोरे बच्चे को बार बार अपने ह्रदय में देखता हूँ|”

महाप्रभु जब रामकेली से नीलांचल लौट रहे थे तब खेतरी गाँव की तरफ देख कर कई बार ‘बाप नरोत्तम, बाप नरोत्तम’ कहकर नरोत्तम को पुकारा था| उसी पुकार  के आकर्षण से नरोत्तम का जन्म हुआ था| उसी पुकार के माध्यम से महाप्रभु एवं नित्यानंद प्रभु ने प्रेम धन , नरोत्तम के लिए धरोहर के रूप में रखा था तथा नरोत्तम के जन्म के उपरांत उसे देने का आदेश था| एक दिन नित्यानंद प्रभु ने नरोत्तम से स्वप्न में “तुम कल प्रातः अकेले पद्मा नदी के तट पर स्नान करने आना वहां तुम्हे परम धन की प्राप्ति होगी|” इस आदेश के बाद ही नरोत्तम नदी तट पर नहाने गया था, जहाँ उन्हें प्रेम धन प्रदान किया गया|

नरोत्तम (राजकुमार) की अवस्था को देखकर उनके पिता राजा कृष्णानंद को बहुत चिंता होने लगी| वे कभी हँसते, कभी रोते, कभी बेहोश होजाते | जब उनकी माँ पूछती तो वो कहते कि एक बच्चा मेरे ह्रदय में प्रवेश कर गया है| वो ही मुझे हँसता/रुलाता है| अब तो माता पिता को शंका हुई कि बच्चे में कहीं कोई भूत प्रेत का प्रवेश तो नही होगया| विभिन्न ओझाओं को बुलाया गया परन्तु कोई लाभ नही हुआ| नरोत्तम कहता की मैं जानता हूँ कि मेरा इलाज कहाँ है? वे माँ से कहते,” माँ, मुझे वृन्दावन जाने दो| वहां मैं ठीक होजाऊंगा|” परन्तु माँ नरोत्तम को वृन्दावन नही भेजना चाहती थी, बल्कि नरोत्तम के उपर भी पहरे लगा दिए गये कि वे वृन्दावन न जाने पाए|

नरोत्तम वृन्दावन जाने के तरीके मन ही मन सोचता तथा अब वो पिता के कार्यों में मदद करने लगा| एवं नरोत्तम ने कुछ समय के लिए अपने भावों को दबा दिया| राजा कृष्णानंद को एक मुसलमान जागीरदार को कर देना होता था| जागीरदार को पता चला कि कृष्णानंद का पुत्र रूपवान एवं सुन्दर भी है, उसे नरोत्तम को देखने की इच्छा जागृत हुई| जागीरदार ने नरोत्तम के लिए घुड़सवार भेजे| राजा ने भी अपने बहुत से लोगों के साथ नरोत्तम को भेज दिया| नरोत्तम ने मन ही मन माता पिता को प्रणाम किया एवं अन्य लोगों को चख्मा देकर वृन्दावन भाग गये| जैसे ही ये समाचार खेतरी पहुंचा तो सैंकड़ो सैनिकों को राजकुमार को ढूंढने के लिए लगाया गया| सैनिकों की एक टोली ने उन्हें पकड़ा भी था तथा घर चलने को कहा| राजकुमार ने किसी की एक ना सुनी| अंत में हार कर सैनिक वापस आगये तथा एक व्यक्ति को रुपये पैसों के साथ राजकुमार के पीछे पीछे चलने को कह गये| राजकुमार मार्ग में काशी और प्रयाग होते हुए मथुरा पहुंचे|

मथुरा पहुँच कर नरोत्तम बहुत थक गये थे | वे विश्राम घाट पर विश्राम करते हुए सो गये, तभी श्री जीव गोस्वामी ने अपने आदमियों को भेजकर नरोत्तम को अपने पास बुला लिया| श्री जीव गोस्वामी को स्वप्न में नरोत्तम के आने की सूचना पहले ही मिल गई थी| श्री जीव ने अपने पास रखकर नरोत्तम को स्वस्थ किया| फिर उससे ब्रज में साधू दर्शन के लिए भेज दिया| नरोत्तम ने गौरांग महाप्रभु के सैंकड़ो भक्तो के दर्शन किए|

 

नरोत्तम ने श्री लोक नाथ गोस्वामी के भी दर्शन किए| दर्शन करते नरोत्तम ने  ही मन ही मन उनको गुरु मान लिया| कुछ समय के पश्चात नरोत्तम को पता चला कि वे तो किसी को शिष्य नहीं बनाते, परन्तु नरोत्तम के मन में दृढ़ निश्चय था कि मेरे गुरु तो यही होंगे| अब वे श्री गुरु की सेवा में लगना चाहते थे परन्तु श्री लोकनाथ गोस्वामी किसी की सेवा भी नही लेते थे| वे तो किसी से कोई बात भी नही करते थे| हमेशा अपने भजन में लीन रहते थे|

नरोत्तम भी उनकी सेवा किये बिना नही रह सकते थे| श्री लोकनाथ गोस्वामी की कुटिया से कुछ दूरी पर उन्होंने अपनी झोपड़ी बना ली| झोपड़ी में वे भजन करते तथा बीच में गोस्वामी जी की कुटिया की परिक्रमा करते| वे उनके अंगरक्षक की भाँती थोड़ा दूर रहकर उनको कोई परेशानी न हो, इसका ध्यान रखते| प्रात जब गोस्वामी जी शोच को जाया करते तो नरोत्तम बाद में उस स्थान को साफ़ कर देते तथा उनके हाथ धोने के लिए छन्नी मिटटी और जल रख देते| लोकनाथ जी समझ नही पाते कि उनकी ये सेवा आखिर कौन कर रहा है? सेवा करते करते एक वर्ष बीत गया| नरोत्तम छुप छुप कर सेवा करते रहते| एक बार लोकनाथ ने प्रयास कर पता कर ही लिया कि मेरी ये सेवा कौन कर रहा है? उन्होंने नरोत्तम को पकड़ा एवं कहा कि तुम राजा के लड़के हो| ऐसे घृणित सेवा मै तुमको नही करने दूंगा|

नरोत्तम ने धीरे से कहा,” गुरुदेव, मैंने आपको गुरु रूप में मान लिया है, इसलिए गुरु सेवा कर रहा हूँ|” लोकनाथ चौंक कर बोले, “कैसी गुरु सेवा? मैं किसी को शिष्य नहीं बनाता| मैंने दीक्षा नही देने का व्रत लिया है|” नरोत्तम बोले,” मैंने आपको तन , मन समर्पित किया है| समर्पित वस्तु दूसरे को कैसे समर्पित करूँ गुरुदेव? आप नही अपनाएँगे तो मैं कहीं का नही रहूँगा|”

लोकनाथ का ह्रदय कुछ द्रवित हुआ| वे बोले,” महाप्रभु ने स्वयं तुम्हारे भीतर प्रवेश किया है| उन्होंने तुम्हे प्रेम दिया है| जब प्रेम तुम्हारे ह्रदय में है तो तुम्हे गुरु की क्या आवश्यकता है?” नरोत्तम हाथ जोड़कर प्रार्थना ही करता रहा परन्तु लोकनाथ गोस्वामी टस से मस नही हुए| उस दिन, दिन भर और रात भर गोस्वामीजी के कान में नरोत्तम के कहे शब्द गूंजते रहे| भजन में वे मन को नही लगा पाए| उन्हें लगा की महाप्रभु उन्हें अपना संकल्प भंग करने के लिए कह रहे हैं|

अगले दिन जब नरोत्तम कुटिया की परिक्रमा कर, वापस जा रहे थे| तभी गोस्वामीजी ने उन्हें बुलाया तथा कहा कि, “तुम बहुत भाग्यशाली हो| कृष्ण ने तुम्हारे ऊपर कृपा करी है| तुम्हारे संकल्प के आगे मैं अपना संकल्प भंग करने को बाध्य हूँ| आगामी श्रावणी पूर्णिमा को तुम्हे दीक्षा दूंगा| तुम मेरे पहले और अंतिम शिष्य होगे| मैं तुम्हे प्राप्त कर धन्य हूँ|” यह सुनकर नरोत्तम की आँखों से अश्रु लगातार बहने लगे| वे श्री गुरु के चरणों में लोट गए| गोस्वामी जी ने उन्हें उठाया और आलिंगन किया और अपने प्रेम अश्रुओं से अभिषित किया| गुरु दीक्षा के पश्चात नरोत्तम की गुरु प्रणालीका के अंतर्गत अन्तरंग साधना शुरू हुई| गुरु कृपा से कुछ ही दिनों में वे सिद्ध लाभ कर धन्य हुए| श्री जीव गोस्वामी ने उन्हें ठाकुर की उपाधि दी| अब वे नरोत्तम ठाकुर बन गये|

 

नरोत्तम ठाकुर का वृन्दावन में अपने गुरु श्री लोकनाथ गोस्वामी की सेवा एवं श्री जीव गोस्वामी से शास्त्र अध्ययन मुख्य कार्य था| एक दिन जीव गोस्वामी ने श्री लोकनाथ गोस्वामी के समक्ष श्री निवासचार्य, श्री श्यामानंद के साथ नरोत्तम ठाकुर को भी प्रचार के लिए गौड़ मंडल भेजने का प्रस्ताव किया| उस समय श्री लोकनाथ गोस्वामी की आयु लग भाग 100 वर्ष थी| उनके एक मात्र शिष्य नरोत्तम ही थे, फिर भी लोकनाथ गोस्वामी ने सहर्ष अनुमति दी परन्तु नरोत्तम वृन्दावन में ही गुरु सेवा करना चाह रहे थे| श्री गुरु ने नरोत्तम से कहा, “अब तुम्हे महाप्रभु के धर्म प्रचार में लगातार रहकर जीवन सफल करना है| मेरे पास आने की  आवश्यकता नही, यही मेरा अंतिम दर्शन है|” नरोत्तम मूर्छित हो भूमि पर गिर पड़े| स्वस्थ होने पर उन्होंने, गुरुदेव से चरण पादुका मांगी और उसे ह्रदय से लगा कर, श्री निवासचार्य और श्यामानंद के साथ ग्रंथो के चार संदूक, दो बैल गाड़ियों पर लेकर चल दिए, प्रेम धर्म का प्रचार करने| मार्ग में विष्णुपुर पड़ता था| वहां का राजा अपनी जनता का तो ध्यान रखता था पर राज्य के बाहर लूटपाट करता था| जैसे ही बैलगाड़ियां राजा वीर हाम्बीर के राज्य के पास पहुंची उसके सैनिक संदूकों में खज़ाना समझकर बैल गाड़ियों को हांक कर ले गये| श्री निवासचार्य तो बहुत ही मर्माहत हुए| श्री निवासचार्य ने श्यामानन्द एवं नरोत्तम को गौड़ मंडल भेजा तथा स्वयं ये सोचकर रह गये कि जब डाकू देखेंगे कि इसमें धन नही है तो हमें वापस दे देंगे|

नरोत्तम के माता पिता, पुत्र वियोग के कारण मृतवत हो गये थे| उन्हें उम्मीद ही नही थी कि उनको इस जीवन में पुत्र मुख देखने को मिलेगा तभी अचानक कर्मचारियों ने सूचना दी कि राजकुमार आयें हैं साथ में उनके साथी भी हैं| राजा रानी जल्दी भाग कर दरवाज़े तक गये, पुत्र को देखकर उनके हर्ष की सीमा न रही| राजकुमार ने कोपीन वा उत्तरीय धारण की हुई थी , हाथ में हरिनाम की माला थी| मार्ग में श्रम के कारण एवं उपवास के कारण काफी कमज़ोर दिख रहे थे| नरोत्तम के माता पिता पुत्र की स्थिति देख कर रो पड़े| नरोत्तम ने उन्हें प्रणाम किया तथा शांत करने का प्रयत्न किया| वे घर के भीतर नही गये| उन्होंने पिताजी से कहा कि मैंने गुरु को आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने और विषयों से दूर रहने का वचन दिया है| गुरु की आज्ञा और आप लोगों का स्नेह मुझे यहाँ ले आया है| नरोत्तम ठाकुर बाड़ी में रहने लगे| स्वयं खाना बनाते, दिन रात भजन करते और एक बार माता पिता के पास हो आते थे|

नरोत्तम ने श्री श्यामानंद को दो आदमियों के साथ उड़ीसा भेजने का प्रबंध कर दिया| अब नरोत्तम को ग्रंथो की याद सताने लगी| एक दिन श्री निवासचार्य का पत्र प्राप्त हुआ| उसमे ग्रंथो के मिलने की खबर थी ही साथ ही राजा वीर हाम्बीर ने उनका शिष्यत्व स्वीकार किया था| इस समाचार को सुन नरोत्तम ने राज्य में उत्सव मनाने के लिए पिताजी से कहा| राज्य में 5 दिन का आनंदोत्सव मनाया गया| अब नरोत्तम माता पिता से आज्ञा लेकर नवद्वीप की ओर निकल पड़े| वे तेज़ गति से चलते हुए नगर के निकट पहुंचे| वे भावों में डूबने लगे| नदिया जिला, जहाँ गौड़ सुन्दर नृत्य कीर्तन किया करते थे? चलते चलते एक तपस्वी साधू को देख उनसे महाप्रभु के घर का रास्ता पूछा| साधू ने नरोत्तम से अपना परिचय देने को कहा| नरोत्तम ने कहा , मैं खेतरी ग्राम निवासी नरोत्तम हूँ| उन दिनों ग्रंथो की चोरी के बाद नरोत्तम और श्यामानंद के नाम का प्रचार गौड़ देश में हो रहा था| साधू ने नरोत्तम को गले लगाया तथा कहा,” मै अभागा शुक्लाम्बर हूँ|”

शुलाम्बेर, नरोत्तम को महाप्रभु के घर ले गये| कांपते कांपते घर के भीतर प्रवेश करते ही हा गौरांग कह आँगन में गिर पड़े और मूर्छित हो गये| दामोदर पंडित, नरोत्तम को महाप्रभु का घर दिखने लगे| “देखो, ये महाप्रभु की ठाकुरबाड़ी है| ये शछी माता का शयन गृह है| ये महाप्रभु का शयन गृह है| यह उनकी शैय्या है| ये अभी तक उठाई नही गयी है| प्रभु जिस अवस्था में इसे छोड़ गये थे, उसी अवस्था में है| ये प्रभु का पटवस्त्र है, ये उनका जलपात्र है, ये उनके नूपुर है, यह उनके चरणपादुका है जिसकी विष्णुप्रिया सेवा करती थी|” बाहर निकल कर महाप्रभु के लीला स्थल देखे| नरोत्तम ठाकुर जितने दिन नवद्वीप में रहे वे रात में महाप्रभु की लीला का स्वप्न देखते| नवद्वीप में वे हर समय भाव विह्वल रहते| उसके पश्चात् वे शांतिपुर गये, वहां अद्वैत प्रभु का स्थान देखा फिर अम्बिका गये| वहां श्यामानंद के गुरु हृदय्चैतन्य के घर जाकर गौड़ निताई विग्रह के दर्शन किए| वहां से खड़दह गये| उस समय नित्यानंद प्रभु का अंतर्धान हो चुका था| माँ जाहनवा और वीरभद्र प्रभु से मिलकर कुछ दिन पश्चात नीलांचल के लिए निकले|

जिस मार्ग से महाप्रभु नीलांचल गये थे, उसी मार्ग से नरोत्तम ठाकुर नीलांचल गये| महाप्रभु के संगी गोपिनाथचार्य के घर गये थे| वे नरोत्तम को जगन्नाथ जी के दर्शन कराने ले गये, फिर महाप्रभु के वास स्थान काशी मिश्र के घर ले गये, फिर गोपीनाथ जी ने उन्हें वह कुटिया दिखाई जिसमे महाप्रभु 18 वर्ष तक रहे| वह आसन जिसपर बैठकर महाप्रभु जप करते थे वे बिस्तर जिसपर महाप्रभु शयन करते थे| ये कदलीपत्र की शैय्या है जो उनके लिए बनायी गयी थी| यह जीन कंघा है, यह उनकी पादुका है| नरोत्तम ने अश्रुओं के साथ प्रत्येक वस्तु को दंडवत प्रणाम किया फिर स्पर्श कर मह्प्रभु के स्पर्श का अनुभव किया फिर उस पवित्र भूमि पर लोटे पोटे और वहां की रज को सिर पे धारण किया, फिर बाहर जाकर उस कुटिया को देखा जहाँ स्वरुप दामोदर रहते थे| महाप्रभु के वियोग में उनके भी प्राण पखेरू उड़ गये थे| वहां भी नरोत्तम लोटे पोटे और रज को धारण किया| महाप्रभु के निवास स्थान के दूसरी ओर हरिदास की कुटिया थी| हरिदास की मृत देह को लेकर महाप्रभु ने नृत्य किया था| नरोत्तम वहां की भी रज धारण करके फिर व्हाहन गये जहाँ खड़े होकर महाप्रभु जगन्नाथ दर्शन करते थे| वहां उनके चरण चिह्न थे| उसी के पास गरुड़ स्तम्भ पर उनका कर चिह्न था| फर्श पर एक गर्त था जो दर्शन करते समय उनके आनन्द अश्रुओं से भर जाता था| उनके भी दर्शन किए| गदाधर पंडित जहाँ बैठकर उनको भागवत सुनाते उस भगवत पोथी को भी ठाकुर महाशय ने दंडवत प्रणाम किया| नीलांचल वासी सभी, महाप्रभु के अनन्य भक्त थे| महाप्रभु का नाम लेते ही वे रो देते थे| नीलांचल से विदा होकर ठाकुर महाशय उड़ीसा के नरसिंहपुर गये जहाँ श्यामानंद रहते वहां कई दिनों तक आनंदोत्सव हुआ फिर वे श्री खंड एवं महाप्रभु के संन्यास तीर्थ कटवा होते हुए खेतरी लौट आये| ‘

खेतरी में ठाकुर महाशय दिन रात भजन करते, उनका गला मधुर था तथा भावाविष्ट होकर जब भजन करते तो सबको रुला देते थे| एक दिन भाव विभोर में कीर्तन कर रहे थे कि एक नया सुर उनके गले से फूट निकला| उसे सुन लोग इतना आनंदित हुए जितना पहले कभी नही हुए थे| गगनहाटी कीर्तन आज भी बंगाल में प्रसिद्द है|

 

ठाकुर महाशय ने खेतरी में बड़े यत्न से अष्ट धातु की श्री गौरांग और श्री विष्णुप्रिया की मूर्तियाँ तैयार करवाई| साथ ही श्री वल्लाभिकांत की एक मूर्ती तैयार करवाई तथा शुभ मूह्रत में धूम धाम से उनकी प्रतिष्ठा की योजना बनाई| श्री निवासचार्य प्रभु भी उसी तरफ बुद्ध्री गाँव आये थे| ठाकुर महाशय उनको लेकर आये| विग्रह की प्रतिष्ठा महोत्सव में आचार्य प्रभु रामचंद्र, गोविन्द और अन्य शिष्यों को साथ लेकर खेतरी पहुंचे| श्यामानंद भी अपने शिष्यों के साथ खेतरी पहुंचे| श्री गौरांग की जन्म तिथि फागुन को श्री विग्रह की स्थापना होनी थी| सभी आमंत्रित लोगों के लिए विशेष व्यवस्था थी| जाह्नवा माता भी आई| वीरभद्र प्रभु, श्री वृन्दावन दास ठाकुर, ज्ञान दास, बलराम दास, गोपाल प्रभु, नवद्वीप से श्रीवास के भाई श्रीपति और श्रीनिधि आये| श्री खंड से रघुनन्दन कन्हाई ठाकुर, ह्रदय ठाकुर अपने शिष्यों के साथ आये| सहस्त्रों महंत अपने गण सहित आये|

पूर्णिमा का दिन, विग्रह स्थापना का दिन आ गया| आचार्य प्रभु ने श्री विग्रहों को अभिषिक्त कर और शास्त्र विधि के अनुसार विग्रह स्थापना का कार्य समाप्त कर ठाकुरों को सिंघासन पर विराजमान कर संकीर्तन की आज्ञा दी| गगनहाटी कीर्तन के सृष्टिकर्ता ठाकुर महाशय ने पृथ्वी पर लेट कर सबको प्रणाम किया फिर दीन भाव से ठाकुरों को देखा और कीर्तन आरम्भ करवाया| कहते हैं कीर्तन को सुनने देवता, गन्धर्व और किन्नर आकाश में छा गये| नरोत्तम ठाकुर ने पहले आलाप किया फिर श्री गौरांग का कीर्तन किया| कीर्तन के साथ रस की तरंग उठ रही थी| तरंग क्रमशः बढती गयी| लोगों का धैर्य, ज्ञान, लज्जा, भय सब जाता रहा| कोई नृत्य करने लगा, कोई रोने लगा| किसी को कंप होने लगा, किसी को पुलक| कोई भाव वेश में मूर्छित हो भूमि पे गिर पड़ा| किसी को देह की सुध न रही| सब एक साथ उस रस तरंग में बहने लगे|

अचानक सबने देखा साक्षात महाप्रभु कीर्तन में नृत्य कर रहे हैं| उनके साथ नित्यानंद, अद्वैत, श्रीवास, गदाधर, मुरारी, स्वरुप दामोदर, हरिदास, वक्त्रेश्वर आदि भी नृत्य कर रहे हैं| लोगों की बाहिय इन्द्रियाँ भाव तरंग में लुप्त हो गयी| अन्तः इन्द्रियाँ प्रफुट्टित हो गयी| वे अपने आप को भूल गये | उन्हें लग रहा था जैसे वे नवद्वीप में प्रभु के साथ नृत्य कर रहे हैं| अंत में महंतगण और गौरांग के गण एक साथ मिलकर एक दूसरे का हाथ पकड़कर नाचने लगे| श्री गौरांग एवं अन्य जैसे प्रकट हुए थे अचानक अप्रकट हो गये| तभी सभी को चेतना आई| राजा कृष्णानंद को भी कीर्तन में अपूर्व भाव आया|

नरोत्तम ठाकुर मूर्छित हो गये| आचार्य प्रभु ने उन्हें गोद में लेकर उज्जवल नीलमणि के श्लोक उनके कान में पढ़े तब भी चेतना नही आई| तब उन्हें मूर्छित अवस्था में भीतर जाकर लेटा दिया गया| एक प्रहार के पश्चात उन्हें होश आया| कीर्तन समाप्त होने पर सभी ने महाप्रसाद ग्रहण किया, सभी महंतों की पूजा हुई, उन्हें राह खर्च के साथ नए वस्त्र, जल पात्र, रजत या स्वर्ण मुद्रा आदि भेंट में दिया गया| एक महीने बाद आचार्याप्रभु भी विदा हुए| अब रह गये केवल रामचंद्र|

ठाकुर महाशय और रामचंद्र दोनों साथ साथ रहते , एक जगह सोते, भजन इकट्ठे करते, ठाकुर की आरती के समय दोनों करताल बजाते फिर कीर्तन करते, भोग लग जाने पर भोजन करते फिर दोनों बैठ कर भक्ति ग्रंथों का पाठ करते| खेतरी के महोत्सव के बाद चार और ठाकुरों की प्रतिष्ठा की गयी| श्री बृजमोहन, श्री कृष्ण, श्री राधाकांत और श्री राधारमण| सभी ठाकुरों की सेवा होती और दूर दूर से लोग उसे देखने आते|

विष्णुपुर के राजा वीर हाम्बीर ने भी विशाल महोत्सव किया| मोहत्सव में आचार्य प्रभु, नरोत्तम, रामचंद्र ने भाग लिया| नरोत्तम ठाकुर का वहां कीर्तन हुआ| अब वैष्णव धर्म का गौड़ देश में तीव्र गति से प्रचार होने लगा जिसे ब्राह्मण समाज में अच्छा नही माना जाता था| नरोत्तम ठाकुर कायस्थ थे| यदि कोई ब्राह्मण उनसे दीक्षा ले तो उनकी जाती से  निकला होजाता था| नरोत्तम ने रामकृष्ण एवं हरिराम नमक दो ब्राह्मण भाइयों को दीक्षा दी| ये दोनों ब्राह्मण भाई कहीं जा रहे थे| उसी समय खेतरी के घाट पर रामचंद्र और नरोत्तम भगवत चर्चा कर रहे थे| दोनों भाई वहीँ रुक गये और चर्चा सुनने लगे| वे उनसे इतने प्रभावित हुए कि वे नरोत्तम के साथ उनके घर गये , देर तक सत्संग किया, रातभर में वे वहीँ रहे| भक्ति का मतलब अब उन्हें समझ आरहा था|

प्रातः होते ही बड़े भाई हरिराम ने रामचंद्र से, छोटे रामकृष्ण ने ठाकुर महाशय से वैष्णवी दीक्षा की प्रार्थना की| दीक्षा के पश्चात वे खेतरी में ही भक्ति के ग्रंथो का अध्ययन करने लगे| घर नही गये| जब ये समाचार उनके गणेशपुर में पहुंचा तो हलचल मच गयी| पिता ने दोनों पुत्रों को पकड़ कर लाने का निर्देश दिया| दोनों ने आकर पिता को प्रणाम किया| पिता ने उनका तिरस्कार किया तथा कहा अब तुम दोनों शूद्र हो गये हो| ब्राह्मण होकर तुमने कायस्थ से दीक्षा ली| उन्होंने अपने पिता से कहा,” वे दोनों परम भागवत हैं, भगवान के प्रिय हैं, उनमें अद्भुत तेज़ है| आपको यदि जांचना हो तो आप हमसे शास्त्रार्थ करवाइए| हम हार गये तो जो प्रायश्चित कहोगे हम दोनों करेंगे|

पिता ने शास्त्रार्थ के लिए अच्छे अच्छे पंडितों को बुलाया परन्तु शास्त्रार्थ में दोनों भाई विजयी हुए| फिर पिता ने मिथिला के दिग्विजयी पंडित मुरारी को बुलाया| वे भी परास्त हुए| अब हरिराम, रामकृष्ण दोनों समाज में पदस्त हुए| बालूचर के निकट गंगा तट पर गम्भीला ग्राम में गंगा नारायण चक्रवर्ती नाम के ब्राह्मण रहते थे| उन्होंने दोनों भाइयों को देखा| वे भाई जब भगवान के गुणों की चर्चा करते तो अश्रु पुल्कादी भाव उदित होते, गंगा नारायण चकित होते| उन्हें भी विचार आया कि मैं भी इन भाइयों की तरह ठाकुर महाशय का शरणागत हो जाऊं और ऐसा ही आनंद पाऊं| ये सोचते सोचते गंगा नारायण दोनों भाइयों के चरणों में गिर पड़े तथा ठाकुर महाशय की शरणागति पाने के लिए कहने लगे| गंगा नारायण की  दीक्षा होते देर न लगी| इससे ब्राह्मण समाज में क्रोध की अग्नि भड़क उठी| ब्राह्मण पक्वापल्ली के राजा नरसिंह के पास गये तथा अनुरोध किया कि आप पंडितों एवं अध्यापकों को लेकर चलें जिससे हम कृष्णानंद के बेटे नरोत्तम को परास्त कर उसे देश निकला दें| राजा नरसिंह भक्तिवान पुरुष थे| उनकी भी इच्छा नरोत्तम के दर्शन करने की थी| इसलिए वे अपने भाई रूपनारायण , पंडितों , अध्यापकों के साथ ही खेतरी गाँव के निकट कुम्हारपुर ग्राम में रुके|

ठाकुर महाशय को पता चला कि शास्त्रार्थ करने आरहे हैं तो उन्होंने रामचंद्र, गंगानारायण की तरफ देखा| दोनों ने ठाकुर महाशय को निश्चिंत रहने को कहा| गंगा नारायण ने कुम्भार का एवं रामचंद्र ने बारुई (पान बेचने वाली किसान का) बेश बनाया| वे दोनों पान और हरिये लेकर कुम्भारपुर के बाज़ार में बेचने के लिए जा बैठे| उन्हें अंदाज़ा था कि राजा के साथ में पंडित बाज़ार में ज़रूर आएंगे| वहीँ उनसे शास्त्रार्थ करेंगे|

कुछ विद्यार्थी पंडित पान खरीदने आये तो रामचंद्र ने संस्कृत में पान का दाम बताया तथा ये भी संस्कृत में बताया कि मैं खेतरी में रहता हूँ| ये कुम्भार भी वहीँ रहता है| हमने सुन सुन कर संस्कृत सीखी है| शास्त्र ज्ञान भी हमने प्राप्त कर लिया है| पंडितों से पूछा कि तुम क्या क्या पढ़ते हो? पंडितों ने बड़े बड़े ग्रंथों का नाम लिया| रामचंद्र ने उन्ही ग्रंथो की चर्चा शुरू कर दी| उत्तर-प्रत्युत्तर में शास्त्र चर्चा छिड़ ही गयी| एक तरफ रामचंद्र और गंगानारायण और दूसरी तरफ राजा के सभी पंडित| अपनी हार के भय से एक पंडित ने अध्यापकों को बुलाया| अध्यापकों के दल के साथ राजा भी चल दिए| अब शास्त्रार्थ होने लगा| एक तरफ बारुई और कुम्भर थे| दूसरी तरफ ज्ञानवान पंडित/अध्यापक थे| शास्त्रार्थ में हार के भय से अध्यापकों को क्रोध आरहा था तथा वे मार पीट पर उतारू होना चाह रहे थे परन्तु राजा ने बीच बचाव किया| अध्यापकों को पहली बार एहसास हुआ कि वे भक्ति के बारे में कुछ नही जानते|

राजा ने कहा “चलो अब ठाकुर महाशय के मंदिर के दर्शन करते चलें|” राजा सबको लेकर खेतरी गाँव पहुंचे| राजा कृष्णानंद ने उनका स्वागत किया| राजा नरसिंह एवं उनके दोनों भाइयों ने नरोत्तम ठाकुर से दीक्षा ले ली| अध्यापक पंडितों का भी कीर्तन की हवा से उनका मन भी निर्मल हो गया| उन्होंने ने भी एक एक कर ठाकुर महाशय की कृपा प्राप्त की|

राजा चाँदराय ज़मींदार राघवेन्द्र राय के पुत्र थे| चाँद राय ने अपने पराक्रम से गौड़ देश का बहुत सभाग अपने अधीन कर लिया था| उनका भाई था संतोष राम| दोनों भाई मानो दूसरे जगाई मधाई थे| एका एक चाँदराय भूत बाधा से ग्रस्त हो गये| बहुत प्रयास किए, कोई लाभ नही हुआ| किसी ने सलाह दी ठाकुर महाशय को लिवा लाने से बाधा दूर होगी| उन्होंने राजा कृष्णानंद को पत्र लिख कर ठाकुर जी को भिजवाने का अनुरोध किया, परन्तु ठाकुर महाशय ये कहकर मना कर दिया कि उनमें क्षमता नही है| राघवेन्द्र को निराशा हुई| रघवेंद्र को स्वप्न में दुर्गादेवी ने कहा था कि तुम अपने बेटे को ठाकुर महाशय का आश्रय लेने को कहो तभी वो ठीक होगा| तुम भी उन्ही का आश्रय लो| राघवेन्द्र ने कृष्णानन्द को दोबारा पात्र भेजकर ठाकुर महाशय को भेजने का अनुरोध किया|

अबकी बार दोबारा राजा कृष्णानंद ने नरोत्तम से प्रार्थना की| नरोत्तम ने कोई उत्तर नही दिया तथा गौरांग महाप्रभु के आदेश के लिए मंदिर के कपाट की तरफ सर रख कर सो गये| रात्री में स्वप्न में महाप्रभु ने कहा,”नरोत्तम, जीव का उपकार करना परम धर्म है| तुम अवश्य जाओ| तुम्हारे जाने से चान्दराय का कल्याण होगा| ठाकुर महाशय प्रातः रामचंद्र, गंगानारायण, हरिराम, रामकृष्ण आदि के साथ पैदल ही निकल पड़े| राघवेन्द्र चन्दन, माला लेकर दरवाज़े पर ही उनके स्वागत में खड़े थे| उनके आते ही स्वागत सत्कार के बाद दंडवत प्रणाम कर वे उन्हें चाँद राय के पास ले गये| चाँद राय उस समय सोते से दिख रहे थे| राघवेन्द्र ने उसके सिर को गोद में उठाकर कहा ,”देखो, ठाकुर महाशय आयें हैं, इन्हें प्रणाम करो|”

चाँदराय चुप रहे, परन्तु उनके अन्दर बैठे ब्राह्म दैत्य ने बोलना आरम्भ किया,” ठाकुर महाशय, मै ब्राह्मण हूँ| मैंने बहुत दुष्कर्म किए हैं| मै जैसा हूँ, चाँदराय भी वैसा है| इसलिए मैंने इसके शरीर का आश्रय लिया है| अब आपके आने से मेरा उद्धार होगया| मैं चला, आपके चरणों में कोटिशः प्रणाम|” उसी समय चाँदराय ने चीख मारी और बेहोश होकर गिर पड़े| होश आने पर उनके भाई ने रोते रोते कहा,” देखो ठाकुर महाशय आयें हैं| इनकी कृपा से तुम स्वस्थ हो गये हो|” चाँदराय ने अपना सिर ठाकुर महाशय के चरणों में रखा और रोते रोते बोले,” ठाकुर मै बड़ा पापी हूँ| क्या आप मेरे ऊपर कृपा करेंगे?” ठाकुर महाशय ने उन्हें गले से लगाकर आश्वस्त किया| शीघ्र उनको उनके भाई तथा पिता को दीक्षा देकर धन्य किया|

 

 

नरोत्तम ठाकुर का एकांत वास

अब दो तीन और राजाओं ने ठाकुर महाशय की शरण ली| खेतरी के ऐश्वर्या में और वृद्धि हुई| अब ठाकुर महाशय को एकांत वास की आवश्यकता पड़ी| उन्होंने खेतरी से दो मील दूर भजन स्थली का निर्माण करवाया जिसे देखने पर वृन्दावन का भान होता था| नरोत्तम ठाकुर एवं रामचंद्र वहीँ रहने लगे|

रामचंद्र का वियोग
ठाकुर महाशय के माता पिता का गोलोक वास होगया था| श्री निवासाचार्य का पत्र था जिसमे आचार्य प्रभु वृन्दावन जाना चाहते थे| साथ में रामचंद्र को भी लेकर जाना था| वृन्दावन में श्री जीव गोस्वामी के अंतिम दर्शन करने जाना था| रामचंद्र का मन तो नही था परन्तु गुरु का आदेश था, मना नही कर सकते थे| ठाकुर महाशय ने रामचंद्र को दिलासा दिया तथा कहा हमारे पास भी नित्य धाम में जाने के लिए बहुत दिन नही हैं| रामचंद्र और ठाकुर महाशय दोनों, गौरांग महाप्रभु के मंदिर गये, उन्हें प्रणाम किया | रामचंद्र के जाने के बाद ठाकुर महाशय ने पूर्ण रूप से अपने आप को समेट लिया तथा रामचंद्र के वापस आने की प्रतीक्षा करने लगे| अंत में संवाद मिला श्री निवासचार्य एवं रामचंद्र दोनों का अंतर्धान होगया| संवाद सुनकर ठाकुर महाशय की दशा का वर्णन करना कठिन है| भगवान का विरह दुखदायी है पर भक्त का विरह बहुत दुखदायी होता है| उनकी हालत देखकर गंगानारायण भी रो पड़े| नरोत्तम ठाकुर गंगानारायण के गले में हाथ डालकर रोने लगे| फिर ठाकुर महाशय ने गम्भीला जाने की इच्छा व्यक्त की| ठाकुर महाशय, गंगा नारायण के घर गंगा किनारे गम्भीला गये| गंगा नारायण की पत्नी, नारायणी एवं उनकी विधवा पुत्री विष्णुप्रिया ठाकुर महाशय को देखकर बहुत खुश हुई| दो दिन बाद ठाकुर महाशय को ज्वर होगया| चार दिन बाद ठाकुर महाशय ने भक्तों से गंगा तट पर ले चलने को कहा| गंगा तट पे वे आँखें मूँद कर लेट गये| बात करनी बंद करदी| कीर्तन बराबर चलता रहा| गाँव के ब्राह्मण गंगा नारायण से पहले ही नाराज़ थे| उन्होंने उन्हें टोका कि तुम्हारे गुरु के अंत समय में उनके मुख से शब्द नही निकल रहे| कृष्ण नाम कैसे लेंगे? उन्होंने ब्राह्मणों को जिस मुख से मंत्र दिया उस मुख का यही होना है|

गंगा तट पर तीन दिन होगये| अब ये दिखने लगा कि वे गंगा तट पर शरीर छोड़ने के लिए गम्भीला आये थे| गंगा नारायण, ठाकुर महाशय के चरणों में सिर रखकर रोने लगा| फिर रोदन बंद कर गंभीर स्वर में बोला,” प्रभु, इस समय ये ब्राह्मण आपकी निंदा करते हैं| उनके ऊपर करुणा कर उन्हें दंड दो|” इसके पश्चात अचानक ठाकुर महाशय के शरीर में स्पंधन हुआ| श्वास आने लगा| उन्होंने आँखें खोली और गंगा नारायण को पास आने का इशारा किया| फिर गंगा नारायण का गला पकड़ का उठ बैठे| ब्राह्मण भयभीत होगये| उन्हें समझ आगया कि नरोत्तम  महापुरुष हैं| ठाकुर महाशय गंगा स्नान कर गंगा नारायण के घर की ओर चले| वहां के मुखिया, ब्राह्मण सभी ने ठाकुर महाशय की शरण ली तथा अपने अपराधों की क्षमा मांगी| ठाकुर महाशय ने उन्हें खेतरी आने का निमंत्रण दिया| खेतरी में ब्राह्मणों ने उनसे दीक्षा ली| गंगा नारायण का संकट दूर होगया| उन्हें एवं उनके परिवार को जातिचियुत करके जो पीड़ित किया जा रहा था वो समाप्त होगया|

अंतिम विदा

एक दिन ठाकुर महाशय ने अपने काम पूरे कर ठाकुर मंदिर के प्रांगण में प्रत्येक विग्रह के सामने कुछ देर स्तुति की एवं गौरांग महाप्रभु से प्रार्थना की, सभी विग्रहों को दंडवत प्रणाम किया और उनसे विदा मांगी, फिर गम्भीला जाने की तैयारी की| अपने निज जनो को साथ लेकर पहले बुधरी गाँव में गोविन्द कविराज के घर गये , उनसे कीर्तन सुनाने की प्रार्थना की| सारी रात कीर्तन में बीत गयी| अगले दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि थी| ठाकुर मह्शय गम्भीला पहुंचे| नारायणी और विष्णुप्रिया से मधुर अलाप किया| कुछ देर में गाँव के सब लोग आगये| सबको आशीर्वाद दिया| उसके पश्चात निज जनो के साथ गंगा स्नान को गये|

गंगा स्नान कर वे आधे शरीर से गंगा जल में बैठ गये| गंगा नारायण दाहिने एवं रामकृष्ण बाएँ शरीर मलने लगे| उनके स्पर्श करते ही शरीर दुग्धवत हो गंगा जल में मिल गया| उसी समय गंगा की तरंगें उठी और देखते देखते सब अदृश्य होगया| गम्भीला में शोक के बादल छा गये| क्षण भर में समाचार चारों ओर फैल गया| उनके शिष्यों ने महा संकीर्तन किया जिसमे ठाकुर महाशय के रचे पदों का गान एवं नृत्य हुआ | कहते हैं उस कीर्तन में ठाकुर महाशय भी प्रकट होकर सबके साथ नृत्य करने लगे|

उन्होंने बंगला में बहुत ग्रंथों की रचना की है जिनमे कुछ निम्न हैं-

स्मरणमंगल , उपसनापटेल , प्रार्थना , सूर्यमणि , चंद्रमणि, प्रेमभक्ति चन्द्रिका, मनः शिक्षा आदि | बंगाल में घर घर में प्रार्थना और प्रेम भक्ति चन्द्रिका का पाठ होता है|

जय जय श्री राधे||

 

 

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