Shri Ram Aur Bharat Ka Prem

आज के समाज में प्रेम धीरे धीरे कर लुप्त होता जा रहा है | गुरु माँ पर श्री राधा रानी जी अपार कृपा है, तभी वो हर प्राणी के ह्रदय में प्रेम बाँट रही है| आओ आज श्री राम और भरत के प्रेम के प्रसंग को दोहराते हैं , ताकि समाज में इस बात का प्रचार हो सके कि वास्तव में भाई-भाई के प्रेम के क्या मायने हैं|

जब श्री राम 14 वर्ष के लिए बनवास गए, उस समय भरत और शत्रुघन मौजूद नहीं थे | जब भरत आए और उन्हें दुखद समाचार मिला कि उनके पिता श्री दशरथ जी का देहांत हो गया है , भरत पर तो मानों बिजली गिर गई और श्री राम के 14 वर्षों के बनवास जाने की खबर से भरत मूर्छित अवस्था में आ गए | अभी ठीक से होश संभला ही नहीं था कि गुरु महाराज ने भरत को पिता के अंतिम संस्कार करने एवं तत्पश्चात राजगद्दी पर बैठने को कहा | पिताजी का अंतिम संस्कार करने के पश्चात भरत ने निर्णय लिया :-
“ मै राजगद्दी पर नहीं बैठूँगा, कभी नही | इस राजगद्दी पर केवल मेरे बड़े भाई श्री राम का ही अधिकार है इस पर बैठना तो दूर , बैठने की बात भी सोचना मेरे लिए अपराध है | “
“पुत्र भरत , थोड़ा संयम से काम लो | राजगद्दी को खाली नहीं रखा जा सकता”
“मै राजगद्दी पर नहीं बैठ सकता | यह राजसिंहासन श्रीराम का है , मेरे बड़े भाई राम का | जिनका इस गद्दी पर हक़ है वो नंगे पाँव भटकते रहें और मैं महल में रहूँ और उनकी गद्दी पर बैठूं , यह मुझसे नहीं हो सकेगा गुरुदेव | “ भरत जोर जोर से विलाप करने लगा |
“ परन्तु पुत्र , कुछ तो निर्णय लेना पड़ेगा “
“ मैं जाऊँगा अपने बड़े भाई श्री राम को वापिस लाने | वो मुझसे बहुत प्यार करते हैं , मेरी बात कभी नहीं टालेंगे | वो आयेंगे और अपनी गद्दी संभालेंगे “|

भरत श्री राम को मनाने चित्रकूट चल दिए | श्री राम ने सर्वप्रथम माँ कैकयी को प्रणाम किया, गुरूजी का आशीर्वाद लिया | फिर माताओ से भेंट की | उनके साधारण वेश को देखकर मन में कुछ शंका हुई|
“भैया राम” , “भैया राम “ कहते हुए भरत श्रीराम के गले लग गए |
“भैया राम पिताजी हम सब को हमेशा के लिए छोड़कर चले गए हैं |” भरत जोर जोर से विलाप करने लगा |
“आप चलो भैया | हम सब आपको लेने आए हैं | आप मुझसे मिले बिना यहाँ क्यों चले आए ?
“भरत अपने आपको संभालो | तुम ही जब ऐसे विलाप करोगे तो तुम्हारी प्रजा अपने आपको कैसे संभल पाएगी”
“ वो प्रजा आपकी राह देख रही है भैया | वो सिंहासन आपकी राह देख रहा है भैया | चलो और चलकर अपनी प्रजा और सिंहासन को संभालो “
“ भरत मुझे पिताजी की आज्ञा का पालन करने दो | तुम राज्य को संभालो | जो तुम कह रहे हो ऐसा नहीं हो सकता |”
गुरु वशिष्ट, सभी माताएं एवम अन्य विशिष्ट लोग दोनों भाइयो को समझाने लगे कि कोई तो माने , क्या अयोध्या की राजगद्दी खाली रहेगी ?
राजा जनक भी चित्रकूट पहुँच गए , उन्हें भी वस्तु स्थिति से अवगत करवाया गया एवम प्रार्थना की गई आप अब इनके पिता भी है आप ही समझाइए ! भरत और राम दोनों ने राजा जनक से कहा – “आप जो निर्णय लेंगे , वह हमें स्वीकार्य होगा “
राजा जनक ने दोनों भाइयो की बातें सुनी और अपना निर्णय लिया – “ प्रेम को सबसे उपर माना जाता है| भरत, राम के प्रेम के वशीभूत होकर राम को राजा बनाना चाहते है इसलिए भरत की बात मानी जायेगी |”
सब तरफ चुप्पी छा गई | सब सोचने लगे कि भरत अब बनवास जायेगे एवम राम राजा बनेगे भरत ने भी राम को राजा बनाने की बात कही | चित्रकूट में ही राम का राज्य अभिषेक किया गया | फिर राजा जनक भरत से बोले “ प्रेम में समर्पण होता है अधिकार नहीं होता , प्रेम का अर्थ दूसरे को सुख पहुँचाना है, उनकी बात माननी है न कि अपनी बात मनवानी है | अब तुम श्री राम से आज्ञा लो कि आगे क्या करे और कैसे करे ?”
भरत ने श्री राम के चरणों में गिरकर उनसे आज्ञा देने को कहा |
श्री राम ने कहा – “ जब तक मैं पिताजी के वचनो को पूरा k तब तक तुम मेरी ओर से राज्य का देख रेख करोगे | 14 वर्षों के पश्चात मै तुमसे राज्य वापस ले लूँगा | भरत ने श्री राम से खढ़ाऊ लिए और खढ़ाऊ सिर पर रखकर श्री राम के आदेश से अयोध्या वापिस आये | भरत ने राजगद्दी पर श्री राम के खढ़ाऊ रखे एवम स्वयं 14 वर्षों तक महल के बाहर झोपड़ी बनाकर राज काज चलाने लगे |
यह होता है प्रेम| आज कल कहाँ चला गया वह प्रेम ? भारत में तो बड़ा भाई पिता समान होता है , उनकी आज्ञा का सभी पालन करते है तथा उनका सम्मान करते है पैसो के पीछे भाई भाई का हत्यारा बने, ये संस्कृति भारत देश की तो नहीं|

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