Shripaad Roop Goswami Jeevani

Rupa Goswami

चैतन्य महाप्रभु के समकालीन रहे एवं महाप्रभु के ह्रदय की गहराई की भाषा समझने वाले, भक्ति में रस का प्रवाह डालने वाले, ऐसे दिव्य महापुरुष जिनके लिए स्वयं राधा रानी भी चिंतित रहती हैं उन्ही श्री रूप गोस्वामी के चरणों में नतमस्तक होते हुए उनका संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं|

श्री हुसैन शाह के दरबार के खज़ाना मंत्री, श्री संतोष देव, ने जब जनता के बीच किसी गरीब परिवार की स्त्री, जो कि कुत्ता, चोर और राजा के गुलाम, तीनो को एक ही श्रेणी में रखकर, अपनी कोई बात बता रही थी| संतोष देव सोचने लगे बात में दम तो है| गुलाम तो गुलाम ही है, राजा का हो या किसी और का| पिंजरा तो पिंजरा ही है, सोने का हो या लोहे का| गुलाम और कुत्ते में कोई फर्क नही| दोनों मालिक का मूह देखते रहते हैं| चोर और गुलाम में क्या फर्क है? चोर दूसरों के धन को चुरा कर खुद भोग करता है, गुलाम भी दुर्लभ मानव जीवन को , जो प्रभु देव के लिए मिला है, को बेचकर स्वयं भोग करता है| संतोष देव जी सोचते सोचते गहराई में जाने लगे| उन्हें लगा मेरा जीवन भी कुत्ते या चोर जैसा ही है| मुझे शीघ्र श्री कृष्ण चरणों की शरण लेनी चाहिए| जब श्री महाप्रभु, रामकेली आये तो उनसे मुलाकात के बाद तो उनके ह्रदय में श्री कृष्ण प्रेम की बाड़ सी आ गयी| महाप्रभु ने उन्हें नए नाम दिए – सनातन, रूप, अनुपम और फ़िर रूप ने सारी धन संपत्ति का बटवारा/दान आदि करने के पश्चात् वे छोटे भाई अनुपम के साथ चुप चाप निकल पड़े, वृन्दावन की ओर|

जब रूप और अनुपम प्रयाग पहुंचे तब उनकी भेंट बिंदु माधव मंदिर में महाप्रभु से हुई| मंदिर में उन्होंने महाप्रभु को नृत्य कीर्तन करते देखा| साथ में हज़ारों दर्शनार्थियों की भीड़ उनके दर्शन करती एवं उन्हें घेर कर खड़ी थी| महाप्रभु के दर्शन करते करते श्री रूप की आँखों से प्रेम की अश्रुधारा लगातार बहती गयी| बाद में जब श्री रूप ने महाप्रभु को दंडवत किया , तो महाप्रभु ने दोनों भाइयों को उठाकर गले से लगा लिया| फ़िर उन्होंने दोनों के सर पर अपने चरण रख दिए| आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात श्री रूप ने इस प्रकार महाप्रभु की स्तुति की :

“नमो महाव्दंयाय कृष्ण प्रेम प्रदायते, कृष्णाय कृष्ण चैतन्य नाम्ने गौरत्विषे नमः”

अर्थात महाव्दान्याय कृष्ण, प्रेम प्रदाता कृष्ण, स्वरुप कृष्ण, चैतन्य नाम गौरांग रूप धारी प्रभु, तुम्हें नमस्कार करता हूँ| उस दिन रूप एवं अनुपम ने महाप्रभु का अवशिष्ट ग्रहण किया| महाप्रभु एक भक्त के घर ठहरे हुए थे| वहीँ समीप एक कुटिया में दोनों भाई भी ठहर गये| श्रीपाद वल्लभाचार्य को महाप्रभु के आगमन का समाचार प्राप्त हुआ तो वे उन्हें आमंत्रण देने पहुंचे| वहां रूप एवं अनुपम को देखकर वे भावावेश में उनसे आलिंगन करने को अग्रसर हुए| दोनों भाई पीछे होने लगे तथा अपने को अस्पृश्य एवं पामर कहने लगे तथा रूप बोले, “ हम आपके स्पर्श के योग्य नही हैं|” महाप्रभु उनकी दीनता पर बहुत प्रसन्न हुए|

महाप्रभु ने वहां त्रिवेणी के तट पर दस दिन रहकर रूप को प्रेम धर्म के निगूड़ तत्व की शिक्षा दी और ब्रज रस की व्याख्या की| महाप्रभु कहते हैं, भक्ति रस सिंधू असीम और अतुल है| कोटि कोटि ज्ञानियों में से कोई एक मुक्त होता है और कोटि कोटि मुक्तों में कोई एक कृष्ण भक्त होता है| कृष्ण भक्त निष्काम होता है एवं शांत होता है| महाप्रभु बोले, “रूप, मैंने तुम्हे भक्ति रस का दिग्दर्शन मात्र कराया है| तुम मन ही मन में इसका विस्तार करना फ़िर अन्तः करण में श्री कृष्ण की स्फूर्ति होती है| श्री कृष्ण की कृपा से अज्ञ व्यक्ति भी रस सिंधू पार कर लेता है|”

दस दिन के पश्चात महाप्रभु वाराणसी के लिए निकलने लगे, रूप एवं अनुपम को वृन्दावन जाने का आदेश दिया और बाद में नीलांचल में उनसे मिलने को कहा| श्री रूप वृन्दावन के लिए निकले | मथुरा पहुँच कर उनकी भेंट श्री सुबुद्धि राय से हुई| सुबुद्धि राय के मुख में करुए का पानी डालकर उनकी जाती भ्रष्ट की गई थी| सुबुद्धि राय ने काशी के पंडितों से प्रायश्चित पूछा| उन्होंने तप्त घृत पी कर प्राण त्याग देने की बात कही थी| फ़िर महाप्रभु ने उन्हें ये प्रायश्चित बताया कि तुम वृन्दावन की पवित्र रज में नित्य लेटा करो और श्री कृष्ण नाम का जप और ध्यान किया करो| इससे तुम्हारे सारे पाप समाप्त होजाएंगे| कृष्ण नाम ने पाप क्षय करने की चमत्कारिक क्षमता है| एक कृष्ण नाम ने जितने पाप क्षय करने की क्षमता है उतने पाप करने की क्षमता जीव में नही है| श्री सुबुद्धि राय ने रूप को वृन्दावन के बारह वनों के दर्शन कराये|

श्री लोकनाथ गोस्वामी एवं श्री भूगर्भ गोस्वामी पहले ही महाप्रभु के आदेश से वृन्दावन में श्री कृष्ण की लीला स्थलियों का अन्वेषण कर रहे थे| परन्तु रूप गोस्वामी से उनकी भेंट नही हो पायी थी| रूप अपने बड़े भाई सनातन के लिए बहुत चिंतित थे| ये चिंता उन्हें दिन रात सताया करती थी| वे सनातन की खोज में काशी की ओर, गंगा के किनारे किनारे चल दिए| इसी समय सनातन, महाप्रभु से मिलकर, राजपथ के रास्ते से मथुरा जा रहे थे| दोनों की मुलाकात नही हो पायी| महाप्रभु के निर्देशानुसार श्री रूप नीलांचल की ओर चल पड़े| अनुपम ने गौड़ होकर नीलांचल जाने को कहा| वे गौड़ जाके संपत्ति की पूरी व्यवस्था करके, नीलांचल की ओर निकलना चाहते थे| परन्तु गौड़ में अनुपम को गंगा प्राप्ति हो गयी| सभी समस्याओं का समाधान अकेले रूप को करना पड़ा| अनुपम के एकमात्र पुत्र, श्री जीव, अल्पव्यस्क थे| उसे आशीर्वाद देकर परिजनों के साथ वाकला भेज दिया|

अब नीलांचल पहुँच कर श्री रूप ने महाप्रभू के यवन पार्षद, श्री हरिदास ठाकुर, के बारे में सुन रखा था| वे दीनता की मिसाल थे| वे अपने को अस्पृश्य समझ कर दूर किसी निर्जन स्थान पर कुटिया बनाकर रहते थे| वे जगन्नाथ मंदिर न जाकर वहीँ से मंदिर के चूड़ा के दर्शन कर अपनी प्यास बुझा लेते थे| महाप्रभु के दर्शन करने वे उनकी कुटिया में भी इसी भय से नही जाते थे कि किसी से उनकी अपवित्र देह का स्पर्श न होजाए| महाप्रभु स्वयं उन्हें दर्शन देने या उनके दर्शन करने, मंदिर से लौटते हुए उनकी कुटिया में जाते थे| रूप भी अपने को दीन समझते थे क्योंकि उन्होंने भी बहुत दिन मुसलमान बादशाह के पास कार्य किया था| श्री रूप, हरिदास ठाकुर की कुटिया में गये, दोनों गले मिले एवं हरिदास ने बताया की महाप्रभु तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे| वे बार बार तुम्हारी चर्चा करते करते आत्म विभोर होजाते थे| दूसरे दिन प्रातः महाप्रभु के कुटिया पर आते ही श्री रूप ने उन्हें दंडवत किया| महाप्रभु ने उनका आलिंगन किया एवं बहुत समय उनके साथ ईष्ट गोष्टी में व्यतीत किया|

शीघ्र ही रथ यात्रा होने वाली थी| श्री नित्यानंद एवं श्री अद्वैत प्रभु , बहुत से भक्तगणों की भीड़, गौड़ देश से पैदल चलकर पुरी आ रहे थे| एक दिन महाप्रभु सबको हरिदास की कुटिया में लेकर गये एवं कहने लगे कि रूप सबको छोड़ कर आगया है, आप इसे आशीर्वाद दें जिससे वह जन कल्याण के लिए महान ग्रंथों की रचना कर सके| सभी ने श्री रूप को प्रेम भरा आशीर्वाद दिया| श्री रूप में कवि वाला ह्रदय बचपन से ही था| गृह त्याह से पहले ही हंसदूत और उद्धवसन्देश नामक नाटकों की रचना उन्होंने कर दी थी| गृह त्याग के पश्चात उन्होंने एक नाटक की रचना करनी चाही जिसमें ब्रज की लीला एवं द्वारिका लीला, दोनों का समावेश था परन्तु उन्हें स्वप्न में सत्यभामा ने ब्रज लीला एवं द्वारिका लीला के लिए अलग अलग नाटक लिखने का आदेश दिया| महाप्रभु ने भी श्री रूप से कहा कि वो कृष्ण को ब्रज से अलग न करें| फ़िर श्री रूप ने दो अलग अलग नाटकों की रचना की| ब्रज लीला वाले नाटक का नाम था – विदग्ध माधव| द्वारिका लीला नाटक का नाम रखा – ललित माधव| दोनों नाटकों को वे नीलांचल में लिख रहे थे परन्तु वृन्दावन लौटने पर पहले विदग्ध माधव समाप्त किया फ़िर ललित माधव समाप्त किया|

श्री रूप गोस्वामी ब्रज रस पर ज्ञान एवं ब्रज रस पर उपलब्धि की उन्होंने रचना की थी| प्रयाग में उन्होंने पहले ही तत्व का उपदेश देते हुए उनमें अपनी शक्ति का संचार कर दिया था परन्तु नीलांचल में रूप को महाप्रभु के साथ दीर्घ कालीन सानिध्य प्राप्त हुआ| उनके संग की वजह से रूप की लेखनी से रस का वह अजस्र और अमूल्य स्त्रोत फूट पड़ा जिसके विश्व भर के साहित्य में तुलना नहीं| जिसने मानव के लिए उनके चरम उत्कर्ष का नया मार्ग प्रशस्त किया| नीलांचल में रूप को स्वरुप दामोदर और राय रामानंद, ये दोनों रस सिद्धांत के मूर्तमान स्वरुप थे| स्वरुप दामोदर नवदीप वासी थे| वे हमेशा महाप्रभु के साथ रहे| महाप्रभु के संन्यास लेने पर वे भी संन्यास लेकर नीलांचल आये थे| महाप्रभु का मनोभाव केवल वे ही जानते थे| महाप्रभु को कोई गीत/रचना या साहित्य सुनना होता था तो पहले स्वरुप दामोदर उसकी परीक्षा करते थे| रामानंद राय, राजा प्रताप रूद्र के अधीन राजा महेंद्री के शासक थे| उड़ीसा के श्रेष्ठ वैष्णव और नाट्य कार में प्रसिद्धि थी| कभी कभी महाप्रभु दैन्य वश उनसे कहते, मैं तो शुष्क सन्यासी हूँ| ब्रज रस की बात मैं क्या जानूं? वह तो तुम्ही ने सिखाई है| रामानंद उत्तर देते, “ महाप्रभु, ब्रज रस कांता भाव और राधा प्रेम की महिमा मैं क्या जानूं? मैं तो आपकी कठपुतली हूँ, आप जैसे नचाते हैं वैसे ही नाचता हूँ| इन दोनों महापुरुषों के संग से श्री रूप को ब्रज रस के सम्बन्ध में बहुत कुछ सीखने को मिला|

रथ यात्रा आ पहुंची है| एक दिन महाप्रभु रथ के कीर्तन करते करते भाव प्रमत हो काव्य प्रकाश का एक श्लोक बार बार गाने लगे| स्वरुप दामोदर के अतिरिक्त और कोई उनका मनोभाव न समझ सका| श्री रूप ने श्लोक सुना और उसी समय उस श्लोक का अर्थ सूचक एक श्लोक बनाया| श्री रूप उस श्लोक को कुटिया में रखकर प्रातः नहाने चले गये| वहां उसी समय महाप्रभु आये, उन्होंने श्लोक पढ़ा, पड़ते ही आविष्ट हो गये| श्री रूप समुन्द्र स्नान से लौटे| महाप्रभु, श्री रूप को प्यार से आलिंगन करते हुए बोले,” कोई मेरे श्लोक का अर्थ नही समझा पर तुमने मेरा मनोभाव कैसे जान लिया?” श्लोक जो महाप्रभु ने बोला उसका अर्थ इस प्रकार था, सखी आज मुझे अपने पति से विवाह के पूर्व रेवा नदी के तीर पर बेतासी तरु तले प्रथम मिलन की याद आरही है| आज भी चैत्र मास की वही परम रमणीय बसंत रजनी है, जब हमारा प्रथम मिलन हुआ था| आज भी उसी प्रकार मालती कुसुम का सौरभ लिए समीर मंद मंद बह रहा है| आज भी मैं और मेरे पति वही हैं जो उस दिन थे, पर वह मिलन सुख अब कहाँ है? मेरा मन प्राण वल्लभ से रेवती तीर पर बेतासी तरु के नीचे फ़िर मिलने को व्याकुल हो रहा है|श्री रूप गोस्वामी ने जिस श्लोक की रचना की उसका अर्थ निम्न था –

“हे सहचरी, मेरा आज उन्ही अपने पति प्रिय श्री कृष्ण से कुरुक्षेत्र में मिलन हुआ है| मैं भी आज वही राधा हूँ और हमारे दोनों का मिलन सुख भी वही है| फ़िर भी वन में क्रीडाशील इन्ही श्री कृष्ण की मुरली के पंचम सुर से आनंद प्लावित कालिन्दी पुलों के वनों की मेरे मन में स्पृहा हो रही है|”

महाप्रभु ने जब इस पर आश्चर्य व्यक्त किया तो स्वरुप दामोदर ने कहा कि इससे यह सिद्ध होता है कि रूप पर आपकी विशेष कृपा है| एक बार महाप्रभु अपने प्रधान भक्तों को लेकर कुटिया पहुंचे और रूप से नाटकों के कुछ कुछ अंश पढ़कर सुनाने को कहा| सुनकर सब चमत्कृत हो आनंद समुद्र में गोते खाने लगे| तब रामानंद ने कहा यह तो अमृत की धारा है| इसे सुन चित आनंद से झूमने लगता है| फ़िर महाप्रभु की ओर देखते हुए बोले,” आप इश्वर हैं, जो चाहे कर सकते हैं| भक्तों पर कृपा करके आपने ब्रज रस का प्रचार करने का संकल्प किया है| रूप को इसका माध्यम बनाया है जो ठीक ही है|

रूप को नीलांचल में 10 महीने हो चुके थे| महाप्रभु ने उन्हें वृन्दावन जाने को कहा एवं ब्रज जाकर रस शास्त्र का निरूपण और ब्रज के लुप्त तीर्थों का उद्धार एवं प्रचार करने के साथ ही कृष्ण सेवा एवं कृष्ण भक्ति का प्रचार करने को कहा| सन १५१९ में रूप वृन्दावन लौटे परन्तु उस समय सनातन नीलांचल की ओर निकल चुके थे| सनातन अधिक दिन नीलांचल नही रुके| होली के बाद उन्हें भी ब्रज में भेज दिया| बहुत दिनों बाद आज दोनों भाइयों का मिलन हुआ| गौड़ देश से भागने के बाद आज दोनों भाई गले मिले , अश्रुधारा बहने लगी फ़िर साथ साथ बैठकर महाप्रभु की कृपा एवं उनकी बातों की चर्चा करते करते भाव विभोर होजाते| कृष्ण भक्ति का जो उन्होंने स्वप्न देखा था वह महाप्रभु की कृपा से सत्य हो रहा था| अब महाप्रभु के आदेशों का पालन करने के लिए वे तन मन से जुट गये|

महाप्रभु ने रूप गोस्वामी को लुप्त तीर्थो का उद्धार करने की आज्ञा दी थी| शास्त्रों में उल्लेख था कि महाराज बज्रनाम विनिर्मित श्री गोविन्द देव जी वृन्दावन के योग पीठ में विराजमान हैं| रूप गोस्वामी वृन्दावन के वनों , उपवनों और गाँव में घूम घूम कर योग पीठ का अन्वेषण करते| वे गाँव वालों से पूछते वह योग पीठ कहाँ है, जहाँ गोविन्द देव विराजमान हैं? पर कोई इसका पता न दे सका| फ़िर एक दिन निराश/हताश वे यमुना तट पर बैठे थे और सोच रहे थे कि भगवान् की खोज करने की क्षमता मनुष्यों में तो नही हो सकती| वे तो स्वयं प्रकाशित हो सकते हैं | वे मन ही मन ‘हा गोविन्द हा गोविन्द’ कह कर इष्ट देव से प्रार्थना करने लगे| उनके नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी| अचानक एक बहुत सुन्दर ब्रज वासी उधर आ निकला और बोला आप क्यों चिंतित हैं? रूप ने अपनी परेशानी बताई| उस ब्रजवासी ने कहा वृन्दावन में केशी तीर्थ के गोमाटिला नाम से जो स्थान प्रसिद्ध है वही योग पीठ है| वहां नित्य पूर्वः में एक श्रेष्ठ गाय आती है, बड़े प्रेम और उल्लास से अपने थनों से दूध की वृष्टि कर जाती है| गोविन्द देव वहीँ गुप्त रूप से विराजमान हैं| चलो मै तुम्हे उस स्थान पर ले चलता हूँ| उस स्थान पर ले जाकर वह ब्रज वासी कहाँ चला गया पता   ही नही चला| रूप को उस रहस्य को समझने में देर न लगी| वे उस ब्रज वासी के वियोग में मूर्छित हो भूमि पर गिर पड़े| फ़िर उठे, कुछ संभले, अविराम अश्रुधारा बहाते वे पास के ब्रज वासियों की बस्ती में गये और उन्हें यह शुभ संवाद दिया|

ब्रज वासियों ने मिलकर बड़े उल्लास के साथ उस टीले पर दुग्ध धारा से भीगे स्थान का खनन किया| कुछ देर खुदाई करने के पश्चात श्री गोविन्द देव का श्री विग्रह प्राप्त कर उनकी आनंद की सीमा न रही| उनकी हर्ष ध्वनि और गोविन्द देव की जय जय कार से आकाश गूँज गया| श्री रूप गोस्वामी ने शास्त्र वाक्य द्वारा प्रमाणित किया कि गोमाटिला द्वापर युग का योग पीठ है और अविष्कृत श्री विग्रह वज्र नाभ महाराज द्वारा प्रतिष्ठित और पूजित गोविन्द देव हैं| श्री रूप गोस्वामी ने ये शुभ समाचार महाप्रभु के पास भिजवाया| महाप्रभु ने उसी समय अपने पार्षद काशीश्वर को वृन्दावन जाने की आज्ञा दी| महाप्रभु ने उन्हें गौर-गोविन्द  नमक अपना एक श्री विग्रह देकर कहा, “ लो इसे साथ ले जाओ| इस विग्रह को मुझसे अभिन्न जानना| इसके रूप में मैं तुम्हारे साथ रहूँगा|” काशिश्वर को विश्वास दिलाने के लिए उन्होंने श्री विग्रह के साथ एकत्र भोजन किया| यह देखकर काशीश्वर बहुत प्रसन्न हुए और श्री विग्रह को साथ लेकर वृन्दावन चले गये| रूप गोस्वामी ने गोविन्द देव के दर्शन के लिए यह चेतावनी दी थी :-

“यदि तुम्हारी स्त्री, पुत्र , बंधु बांधवों के साथ रंग रेलियाँ करने की इच्छा है, तो केशीतीर्थ के समीप गोविन्द नामक उस हरी के श्री विग्रह के दर्शन न करना, जो मयूर पुच्छ से अलंकृत मंद मंद मुस्काते , त्रिभंगी मुद्रा में वहां खड़ा है| जिसका बंकिंग विशाल नेत्र है और जिसके अधरों पर मधुर मुरली शोभायमान है क्योंकि इसे एक बार देख लोगे तो बंधु बांधवों को भूल बैठोगे|” श्री गोविन्द देव के दर्शन के इस परिणाम को अनेकों ने अनुभव किया है और आज भी कर रहे हैं|

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गोविन्द देव बहुत दिनों तक अकेले विराजते रहे| उनके साथ जो राधिका मूर्ति है उनकी स्थापना श्री रूप गोस्वामी के रहते रहते हो गयी थी| उड़ीसा के राजा प्रताप रूद्र के पुत्र पुरुषोत्तम जाना अपने पिता के समान परम वैष्णव थे| उन्हें जब पता चला वृन्दावन में श्री मदन गोपाल एवं श्री गोविन्द देव श्री विहीन अवस्था में प्रतिष्ठित हैं तो उन्होंने दो धातु मई राधिका मूर्तियाँ भेजी| जब ये वृन्दावन के नज़दीक पहुंची तो मदन गोपाल ने अपने सेवा अधिकारी को स्वप्न में कहा कि जो दो मूर्तियाँ आरही हैं उनमे एक श्री राधा है एवं दूसरी ललिता है| तुम छोटी राधा को मेरी बाएँ तरफ एवं बड़ी ललिता को मेरी दाएँ तरफ स्थापित करवाना| श्री मदन गोपाल की आज्ञा के अनुसार दोनों की स्थापना उनके दोनों ओर कर दी गयी| अब प्रश्न था कि गोविन्द देव के लिए कौनसी राधा मूर्ती कहाँ से प्राप्त की जाए? तभी राधा रानी ने पुरुषोत्तम जाना को स्वप्न में प्रकट होकर कहा, “मैं पुरी के निकट चक्रबेड में बहुत दिनों से स्थापित हूँ| लोग मुझे ‘लक्ष्मी’ कहते हैं| वे नही जानते कि मैं राधा हूँ| मुझे गोविन्द देव के पास शीघ्र भेजने की व्यवस्था करो|” श्री राधा के अनुसार बड़े समारोह के साथ श्री राधा को गोविन्द देव के वाम भाग में स्थापित कर दिया गया| यह राधा मूर्ती कभी वृन्दावन से उत्कल देश गयी थी| वहां राधा नगर में वृहद् भानु नामक एक दक्षिणात्य ब्राह्मण के घर उसकी कन्या के रूप में उसकी स्नेह सिक्त सेवा अंगीकार कर रही थी| स्वप्न के आदेश प्राप्त कर पुरी के राजा ने उन्हें पुरी के निकट चक्रबेड नामक स्थान में प्रतिष्ठित कर दिया था|

राजा मान सिंह ने वृन्दावन में १५९० में बहुत धन खर्च करके लाल पत्थर से १३० बीघा ज़मीन में विशाल गोविन्द मंदिर की स्थापना की| अकबर बादशाह ने लाल पत्थर बिना कीमत पर उपलब्ध कराया था परन्तु जब औरंगज़ेब का राज था तब मंदिर को नष्ट किये जाने के भय से गोविन्द देव को पहले आमेर की घाटी में एक मंदिर बनाकर उसमे विराजमान करा गया| फ़िर जब महाराज जय सिंह ने जय निवास में मंदिर बनवाकर उसमे गोविन्द देव जी को लाया गया| राजा, गोविन्द देव को सियासत का राजा मानते थे| स्वयं उनके दीवान की हैसीयत से राज कार्य चलाते थे| आज भी गोविन्द देव उसी मंदिर में विराजमान हैं| महाप्रभु के गौर गोविन्द विग्रह भी उनके दाहिने पाशर्व में उसी सिंघासन पर विराजमान हैं|

दैन्यता

श्री रूप गोस्वामी से दूर दूर से दिग्विजयी पण्डित और आचार्यगण शास्त्रार्थ करने आते थे| श्री रूप बिना बेहेस/तर्क किये उन्हें विजय पत्र लिख देते जिससे वे लोग प्रसन्न होते एवं गोस्वामीजी का भजन निर्बाध रूप से चलता रहता| एक बार श्रीपाद वल्लभाचार्य जी रूप गोस्वामी से मिलने आये| उन दिनों श्री रूप भक्ति रसामृत सिंधु लिख रहे थे| श्री जीव उन दोनों को पंखा कर रहे थे| श्री वल्लभाचार्य ने भक्ति रसामृत सिंधु के श्लोक में संशोधन का प्रस्ताव रखा| रूप ने तुरंत उस प्रस्ताव को स्वीकार किया (दैन्यता एवं आचार्य के प्रति आदर भाव के कारण)| जीव को यह उचित नही लगा| जब वल्लभाचार्य जमुना स्नान को गये तब जीव उनके कपडे लेकर साथ गये एवं उनके संशोधन प्रस्ताव पर चर्चा की| वल्लभाचार्यजी जीव की बात से संतुष्ट हुए और उन्होंने संशोधन प्रस्ताव वापस ले लिया|

रूप गोस्वामी जी को जीव का आचरण अनुचित लगा| उन्होंने जीव को बुलाकर कहा कि तुम्हारे भीतर दंभ और क्रोध भरा है| तुमने आचार्य का अपमान किया है| तुम यहाँ से चले जाओ| लौट कर तब आना जब ह्रदय शुद्ध कर लेना| दैन्य और विनय की मूर्ती श्री रूप गोस्वामी वैष्णव नीति और आचरण की रक्षा के लिए व्रज से भी कठोर बन गये तथा अपने प्रिय शिष्य को प्रतारित कर दिया| श्री जीव वृन्दावन से दूर किसी जंगल में पर्ण कुटी बनाकर रहने लगे| ह्रदय को शुद्ध करने के लिए, वैराग्य वेश की योग्यता प्राप्त करने के लिए कठिन साधना करने लगे| अनाहार, अनिद्रा के कारण वे बहुत दुर्बल होगये थे| दैवव योग से श्री सनातन गोस्वामी वन भ्रमण करते हुए वहां से निकले| जीव की ये दशा देख उनका हृदय द्रवित हो गया| सनातन जीव को लेकर रूप के पास लाये| रूप ने यह जानकार की जीव का प्रायश्चित पूर्ण हुआ, उसे अंगीकार किया|

ग्रंथो की रचना एवं लुप्त तीर्थो का उद्धार का कार्य करते करते श्री रूप अपनी आंतरिक साधना भी करते रहते| वे भजन के हिसाब से अपने रहने का स्थान बदलते रहते| एक बार वे नन्द ग्राम में रह रहे थे| काफी समय से उन्हें साक्षात् राधा रानी की कृपा का अनुभव नही हुआ था इसलिए वे राधा रानी के विरह में छटपटा रहे थे| मधुकरी जाना छोड़ दिया, खाना पीना बंद हो गया, अचानक उन्हें सूचना मिली की सनातन गोस्वामी आ रहे हैं| उनके मन में आया कि मैं सनातन को खीर बनाकर खिलाऊं परन्तु सामान तो है ही नही| उसी समय एक ब्रज बालिका आई और बोली, “बाबा तुम कुछ खाते नही हो| मधुकरी को जाते नही हो| माँ ने चावल दूध चीनी एवं अन्य सामग्री भेजी है| खीर बनाकर खा लेना|” श्री रूप एकदम सोचने लगे कि सोचा ही था की सामान प्रस्तुत| वे सोच ही रहे थे कि उनकी आँखों से आंसू टप-टप बहने लगे| राधा रानी की कृपा से उनका ह्रदय द्रवित हो रहा था परन्तु वो दुखी थे कि राधा रानी कृपा करती हैं वह भी दूर रहकर, लुक छिप कर दूसरों के माध्यम से करती हैं| वह बालिका उनकी तरफ देखती रही फ़िर बोली, “ बाबा, तू रोवे काईको है? दुर्बल है? खीर बनायवे की शक्ति नाय? जा, मारे तुला, खीर मैं बनाये दूँ?”

“न लाली, खीर मैं बना लूँगा| दुर्बल नही हूँ|”

“बाबा, तुम्हारा मुख सूख रहा है| खाना पीना बंद कर रखा है| मधुकरी जाते नही|दुर्बल तो होवोगे ही, क्यों नही जाते मधुकरी?”

रूप बोले, “मैं मधुकरी के लिए ब्रज में नही बैठा, ब्रज में तो ब्रजेश्वरी की कृपा के लिए बैठा हूँ| वे जब कृपा करती ही नही तो मधुकरी करके क्या करूँगा?”

“बाबा, तुम जानते नही हो, कृपा तो तुम्हारे ऊपर हो रही है तभी तो तुमको यहाँ रखा है राधा रानी ने| माँ कहती है कि कृपा के बिना कोई ब्रज में रह नही सकता| खीर बनाकर खा लेना नही तो राधा रानी दुःख पाएंगी|”

वह बालिका स्नेह मई मधु मई दृष्टि से देखती और मुस्कुराती वहां से चली गयी|

थोड़ी देर में सनातन गोस्वामी आये| रूप ने उन्हें खीर खिलाई| खीर में अप्रकृत सुगंध और स्वाद से वे चमत्कृत रह गये| वे बोले, “रूप, मैंने ऐसी खीर आजतक नही खायी| तुमने कैसे बनायीं?” रूप ने सारा वृत्तांत सनातन को बताया| सनातन ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से रूप से कहा, “रूप वह बालिका राधा रानी थी| तुमने उन्हें इतना कष्ट दिया, वे अपने भक्तों को भूखा कब देख सकतीं हैं? अब कभी जानबूझकर भूखा रहने का मत सोचना| अपने लिए या किसी और के लिए किसी वासना को ह्रदय में स्थान मत देना| भक्त की वासना पूर्ती के लिए राधा रानी इतनी चंचल हो उठती हैं|” यह सुनकर रूप के नेत्रों से अश्रुधारा रुकने का नाम नही ले रही थी| वे खीर खाते जाते और प्रेमाश्रु उमड़ उमड़ कर बहते| कुछ दिनों बाद जब वे मधुकरी के लिए निकले तथा उस बालिका के घर गये तब उन्हें ज्ञात हुआ कि वह बालिका तो मौसी के घर दूसरे गाँव गयी हुई है| अभी वहां से आई नही थी| अब तो कुछ संदेह ही नही रहा की वह राधा रानी थी| भगवान् अपने भक्तों की कदम कदम पर रक्षा करते हैं| गोस्वामियों के जीवन में तो कितनी बार कभी स्वयं श्री कृष्ण कभी स्वयं राधा रानी आती रहती हैं| वे तो चुप रहते हैं| किसी से कुछ कहते ही नही| ये जो कुछ कुछ वृतांत ही हमारे सामने हैं| एक और घटना का वर्णन करते हैं|

एक बार श्री रूप के मन में आया गोपाल (श्री नाथ जी) के दर्शन करने की| गोपाल का मंदिर गोवर्धन पर्वत के ऊपर था| रूप गोस्वामी गोवर्धन पर्वत को श्री कृष्ण का विग्रह मानते थे इसलिए पर्वत के ऊपर चढ़ते नही थे| अब दर्शन कैसे हो? ऐसे माया फैली कि उनके भक्तों को मंदिर पर मलेक्षों के आक्रमण का भय हो गया| वे उन्हें मथुरा ले आये| वित्थालेश्वर के घर गोपाल ने एक महीने उनकी सेवा स्वीकार की| उस बीच रूप गोस्वामी, गोपाल भट्ट, भूगर्भ गोस्वामी ,जीव गोस्वामी आदि अपने निज जनो के साथ मथुरा में रहकर एक मास तक उनके दर्शन किये|

 वैष्णव अपराध

रूप गोस्वामी पर श्री राधा कृष्ण की कृपा निरंतर बढती जा रही थी| वे भगवान् की दिव्य लीलाओं का दर्शन करते थे| एक बार कृष्ण दास नाम के वैष्णव भक्त जो पैर से लंगड़े थे उनके पास कुछ सत्संग के लिए आये| उस समय रूप गोस्वामी राधा कृष्ण की एक दिव्य लीला के दर्शन कर रहे थे| लीला में राधा एक वृक्ष की डाल से फूल तोड़ने का प्रयास कर रही थी| डाल कुछ ऊंची थी| वह उचक उचक कर उसे पकड़ना चाह रही थी परन्तु डाल हाथ में नही आ रही थी| श्याम सुन्दर दूर से देख रहे थे| वे चुपके से आये और राधा रानी के पीछे से डाल को पकड़ कर धीरे धीरे इतना नीचे कर दिया कि वह उनकी पकड़ में आजाये| राधा रानी ने जैसे ही डाल पकड़ी श्याम सुन्दर ने उसे छोड़ दिया| राधा रानी वृक्ष से लटक कर रह गयी| यह देखकर रूप गोस्वामी को हसी आगयी परन्तु कृष्ण दास समझे कि वे उनका लंगड़ापन देखकर हंस दिए| वे क्रुद्ध होकर वहां से चले गये| रूप गोस्वामी को इसका कुछ भी पता नही था| अकस्मात् उनकी लीला स्फूर्ति बंद हो गयी| अब बिना लीला के उनके प्राण छटपटाने लगे पर वे समझ न सके ऐसा क्यों हुआ| वे सनातन के पास गये| सनातन गोस्वामी ने उन्हें कहा ज़रूर कोई वैष्णव अपराध हुआ है| रूप बोले जानबूझकर तो मैंने कोई अपराध नही किया| अनजाने में हुआ है तो कैसे पता चले? सनातन ने सलाह दी तुम वैष्णव सेवा का आयोजन कर सभी वैष्णवों को आमंत्रित करो| जो वैष्णव उसमे न आये उसी के प्रति अपराध हुआ है, समझ लेना| रूप गोस्वामी ने ऐसा ही किया| कृष्णदास बाबा ने निमंत्रण स्वीकार नही किया तथा निमंत्रण देने आये व्यक्ति से उसने वह घटना भी बताई| रूप गोस्वामी ने जाकर उनसे क्षमा मांगी और उस दिन की अपनी हसी का कारण बताया तब बाबा संतुष्ट हुए और फ़िर से लीला स्फूर्ति होने लगी| नाम अपराध के बारे में महाप्रभु ने कहा है- भक्ति एक सुकोमल लता के समान है और वैष्णव अपराध मत हाथी के समान है, वैष्णव अपराध भक्ति लता को समूल उखाड़ फेकने की सामर्थ्य रखता है| इसलिए साधक रुपी माली को उसे यत्न से ढक कर और अपराध रुपी हाथी से बचा कर रखना चाहिए|

सात्विक भावों को भीतर तक समा लेने की उनमे अद्भुत शक्ति थी| बाहर से देखकर उनके भाव की गंभीरता का अनुमान करना कठिन था| एक बार भगवान् के रूप गुण आदि का सुन्दर कीर्तन हो रहा था| उससे भक्त लोग इतने प्रभावित हुए कि वे अपने सात्विक भावों के वेग को न रोक पाने के कारण मूर्छित होने लगे परन्तु रूप गोस्वामी धीर गंभीर ऐसे खड़े रहे जैसे उन्हें भाव ने स्पर्श भी न किया हो| कवि कर्णपूर, रूप गोस्वामी के बिलकुल निकट थे| उन्हें लगा उनकी श्वास में से आग की लपते निकल रही हैं| सन १५५४ में आषाढ़ी पूर्णिमा को नब्बे वर्ष की आयु में सनातन गोस्वामी का अंतर्धान हुआ| एक महीने के भीतर श्रावणी शुक्ल द्वादशी को रूप गोस्वामी भी अंतर्धान हो गये| दोनों ने एक साथ संसार त्याग कर नित्य वृन्दावन में प्रवेश किया| श्री रूप गोस्वामी को श्री चैतन्य महाप्रभु के रस सिद्धांत की साक्षात् मूर्ति माना गया है| इसी प्रकार श्री नरोत्तम दस ठाकुर ने प्रेम भक्ति चन्द्रिका के मंगला चरण में “श्री चैतन्य मनो अभिष्टम स्थापितं येन भूतले” कह कर उनकी वंदना की है| माधव गौड़ीय संप्रदाय में श्री रूप गोस्वामी ब्रज की रूप मंजरी भी है| रूप मंजरी के बिना राधा कृष्ण की प्रेम सेवा का अधिकार नहीं मिलता|

श्री रूप गोस्वामी द्वारा रचित ग्रन्थ-

  1. हंसदूत , उद्धव सन्देश, अष्टदश लीला छंद नामक तीन काव्य|
  2. स्तव माला, उत्त्कलिकावली, गोविन्द विरुदावली और प्रेमेंदु सागर नमक चार स्त्रोत ग्रन्थ|
  3. विदग्ध माधव और ललित माधव (दो नाटक)|
  4. दानकेली नमक भाणिका|
  5. भक्ति रसामृत सिंधु और उज्जवल नीलमणि – दो रस ग्रन्थ|
  6. मथुरा महिमा, नाटक चन्द्रिका पदावली, लघु भाग्वतामृत – चार संग्रह ग्रन्थ

आईए रसिक कवी श्री रूप गोस्वामी द्वारा रचित कुछ ग्रंथों का परिचय देखें-

  1. हंसदूत- यह रचना श्री रूप गोस्वामी ने अहरी चैतन्य से साक्षात् के पूर्व रची थी| श्री कृष्ण के मथुरा जाने पर एक दिन राधा विरह अग्नि शांत करने के उद्देश्य से यमुना तट पर गयी| तटवर्ती कुंजों को देख कृष्ण स्मृति जाग गयी| विरह वेदना और तीव्र हो गयी और श्री राधा मूर्छित हो गयी| सभी सखियाँ प्राण रक्षा के लिए चेष्टा करने लगी| ललिता ने हंस को दूत बनाकर राधा का हाल बताने के लिए श्री कृष्ण के पास भेजा| राधा की अवस्था का विस्तार से ह्रदय स्पर्शी वर्णन किया है| अंत में श्री राधा की विरह दशा का वर्णन कर कृष्ण को वृन्दावन आने की प्रेरणा देने को कहा| इस ग्रन्थ में १४२ श्लोक हैं|
  2. उद्धव सन्देश – श्री कृष्ण उद्धव को दूत बनाकर भेजते हैं| राधा और अन्य गोपियों के विरह में अपनी दशा का वर्णन करने के लिए| वे उद्धव को उपदेश देते हैं कि वृन्दावन जाकर उनके सखाओं को प्रेम से आलिंगन करना, नन्द यशोदा को प्रणाम करना, गोपियों को सांत्वना देना और राधिका को वैजयंती माला का स्पर्श कर कर सचेत करना होगा|
  3. विदग्ध माधव – नाटक का मुख्य विषय है – राधा कृष्ण का समिलन| ललिता और विश्खा श्री राधा की दूती रूप में श्री कृष्ण से राधा का प्रेम निवेदन करती है| श्री कृष्ण भीतर से प्रसन्न होते हुए भी बाहर से राधा के प्रति उपेक्षा का भाव प्रदर्शित करते हैं| राधा व्यथित हो कृष्ण विरह में प्राण त्यागने की इच्छा करती है| राधा की दशा देखकर विशाखा रोने लगती है| राधा कहती है वृथा रोदन मत करो| मैं मर जाऊं तो तमाल वृक्ष की शाखा से मेरी भुजाओं को बाँध दो जिससे (कृष्ण के सामान काले रंग वाले) तमाल की देह को आलिंगन कर मेरा देह चिरकाल तक वृन्दावन में अवस्थान करे|
  4. ललित माधव – नाटक में रूप गोस्वामी ने स्वर्ग मरत पाताल और सूर्य लोक की घटनाओं को एक सूत्र में दस अंकों में ग्रंथित किया है| इसमें वृन्दावन, मथुरा और द्वारिका लीला अपना अपना पार्थक्य छोड़ एक के भीतर एक अंतर भुक्त हुई हैं| राधा के अतिरिक्त चन्द्रावली नामक गोपी के साथ श्री कृष्ण की प्रेम लीला का भी वर्णन है|
  5. दानकेलि कोमुदी – श्री राधा गुरुजनों के आदेश से सखियों सहित गोविन्द कुंड के यज्ञ स्थल पर घी बेचने जा रही हैं| कृष्ण मित्रों सहित मानस गंगा के तट पर उनका पथ रोक लेते हैं| वे दान व शुल्क का दावा करते हैं| राधा एवं सखियाँ दावा स्वीकार नही करती| वाद विवाद शुरू होता है| अंत में पौर्णमासी की मध्यस्थता से वाद विवाद समाप्त होता है|

श्री रूप गोस्वामी ने कार्पण्य पंजिका स्त्रोत में अभिलाषा व्यक्त की कि जब राधा कृष्ण विरह व्यग्र हो उस समय वे मंजरी भाव से उनका मिलन करा उनसे हार पदक आदि परितोषित रूप में प्राप्त कर धन्य हो| वे विलास के समय उनके निकट रहकर उनकी विभिन्न प्रकार से सेवा करे| ताम्बूल सजा कर अपने हाथ से उनके मुख में अर्पित करे| अनंग क्रीडा में उनके केश बिखर जाने पर उन्हें संवार दे| उनकी वेश भूषा फ़िर से कर दे| उनके तिलक शून्य ललाट पर फ़िर तिलक की रचना कर दे| वे अपने केशपाश खोल कर श्री राधा के दोनों चरणों को पोच देने का सौभाग्य प्राप्त कर सके| निकुंज में विलास के उपयोगी पुष्प शैय्या तैयार कर सके| विलास के समय दोनों को मधुपान करा सके और विलास के पश्चात उनका श्रम दूर करने के लिए चामर से बीजन कर सके|

मंजरियों की विशेषता है कि उनकी विलक्षण भाव शुद्धि सखियाँ राधा के अतिशय आग्रह से कभी कभी श्री कृष्ण का अंग संग भी स्वीकार कर लेती हैं परन्तु मंजरियाँ राधा कृष्ण – सेवानन्दरस माधुर्य आस्वादन में इतना तल्लीन रहती हैं कि वे राधा कृष्ण के अनुरोध पर भी कभी स्वप्न में भी कृष्ण अंग संग की वांछा नही रखती| इसी करण मंजरी गण को श्री राधा कृष्ण की जिस गोपनीय सेवा का अधिकार और सौभाग्य प्राप्त है वह सखियों को नही है| इसके अतिरिक्त कृष्ण के अंग संग का तिरस्कार करने के कारण मंजरियाँ रस की दृष्टि से किसी प्रकार घाटे में नही रहती अपितु राधा के साथ तादात्म्य के कारण  वे राधा एवं कृष्ण के मिलानंद का स्वतः उपभोग करती हैं| यहाँ तक की वे रति- चिह्न जो कृष्ण के अंग संग के करण राधा में होते हैं, मंजारियों के अंग में भी उभर आते हैं|

मंजरी भाव की उपासना के उक्त विवरण से स्पष्ट है कि यह राधा कृष्ण की युगल उपासना है पर इसमें प्रधानता राधा की है| मजरियाँ राधा की दासी है| वे मुख्य रूप से उन्ही की चरण सेवा में अनुरक्त हैं| श्री कृष्ण के साथ उनका सम्बन्ध है , वे राधा की सेवा के निमित ही| वे अपने राधा प्रेम के कारण और राधा की अपने प्रति कृपा के कारण गर्व महसूस करती हैं| श्री रूप गोस्वामी के अनुसार श्री रूप मंजरी आदि के आनुगत्य में अपने अन्तःशचन्तित सिद्ध देह से श्री राधा कृष्ण की सेवा करना ही गौडीय वैष्णव साधकों का मुख्य भजन है|

3 thoughts on “Shripaad Roop Goswami Jeevani

  • Aug 12, 2015 at 1:33 pm
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    Bahut Sunder…..Specially wo Kheer Wali Story.|| Vaishnav Apradh wali leela
    Ati Sunder

    Thank you So much..

    Reply
  • Aug 12, 2015 at 1:35 pm
    Permalink

    Pls Upload more story of Shreepad Roop Goswami

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    • Aug 23, 2015 at 6:47 pm
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      Radhe Radhe dada,
      Jaise hi milenge aur…woh Dal de jaenge…
      Jai Radhe!!

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