Shripad Raghunath Das Goswami – LIFE HISTORY

भगवान् के परिकर जब भी इस धरा भूमि पर आयें हैं , उन्होंने भगवान की नई नई लीलाओं का परिचय दिया है | उनके ह्रदय में लीलाएं प्रफुटित होती हैं और वे इन लीलाओं के माध्यम से अपार जन समूह का भला करते हैं| श्री रघुनाथदस गोस्वामी भी ऐसे ही भगवान् के परिकर हैं|

बंगाल में सप्तग्राम और उसके आस पास का क्षेत्र बहुत समृद्ध था | इस क्षेत्र का कर इकठ्ठा करने का कार्य दो भाइयों – श्री हिरण्य एवं श्री गोवर्धन दास को मिला था| दोनों भाई राजा द्वारा निर्धारित कर, राजा को देने के बाद काफी धन बचा लेते थे|उन दोनों की समाज में बहुत प्रतिष्ठा थी|वे समाज के हर नागरिक का सम्मान करते थे| दोनों में श्री गोवर्धन दास छोटे थे | बड़े भाई हिरण्य की कोई औलाद नही थी| छोटे गोवर्धन दास का भी एक मात्र पुत्र था रघुनाथ|उनका जन्म १५६२ में हुगली जिले में कृष्णपुरम में हुआ|

परिवार का एकमात्र वारिस होने के कारण रघुनाथ को बहुत नाज़ों से पाला गया| उनके पिता ने कुल पुरोहित, श्री बलराम आचार्य के घर चांदपुर में रघुनाथ को भेजा, जिससे वह शास्त्रविद एवं सुपण्डित बन सके| बचपन से ही रघुनाथ शांत, सुशील  , सौम्य स्वभाव के थे| श्री रघुनाथ कुछ ही वर्षों में शास्त्रों में एवं संस्कृत साहित्य में पारंगत हो गये|वे साधू संतो का बहुत सम्मान करते थे| उनके यहाँ साधू संतो का आना जाना लगा रहता था|

एक बार श्री हरिदास, चांदपुर आये एवं श्री बलराम आचार्य ने उनके लिए एक कुटिया बनवा दी थी| बालक रघुनाथ ने हरिदास को दंडवत प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लिया तथा उनके कुटिया के बाहर उनका कीर्तन एवं भजन सुनता रहता था| श्री हरिदास के दिव्य दर्शन एवं आशीर्वाद से श्री रघुनाथ को चैतन्य महाप्रभु की कृपा प्राप्त हुई|

बालक रघुनाथ घर में आने वाले एवं विशिष्ट व्यक्तियों एवं साधू संतों के मुख से महाप्रभु के बारे में सुनते थे| जितना सुनते थे उतनी ही प्यास और बढ़ जाती थी|उस दिन नवद्वीप से समाचार आया कि श्री गौर सुन्दर, श्री केशव भारती से सन्यास लेकर चले गये हैं| किसी को मालूम नही था की वे कहाँ गये हैं| यह सुनकर रघुनाथ के ह्रदय को धक्का लगा| वे ज़मीन पर गिर पड़े और मूर्छित हो गये| 3-४ दिनों के बाद ज्ञात हुआ की श्री गौरांग महाप्रभु , श्री अद्वैताचर्या के घर शांतिपुर में पहुँच गये हैं| लोग सप्तग्राम से टोलियाँ बना बना कर शांतिपुर की तरफ रवाना हो रहे थे| श्री रघुनाथ की शांतिपुर जाने की जिद्द के आगे पिता को झुकना पड़ा , एवं सैनिकों और सेवकों के साथ श्री रघुनाथ को शांतिपुर भेजने का प्रबंध किया गया| श्री अद्वैथाचार्य के घर पहुँच कर श्री रघुनाथ, महाप्रभु के चरणों में लौट गये| महाप्रभु ने स्नेह पूर्वक रघुनाथ के मस्तक पर अपने चरण कमल रख कर उन्हें आशीर्वाद दिया| फिर उठाकर उन्हें ह्रदय से लगा लिया| दोनों की अविरल अश्रु धारा बहने लगी| महाप्रभु ने सात दिन तक रघुनाथ को अखंड संग सुख एवं अधरामृत देकर उन्हें विदा किया| अब तो वे श्री गौरांग के प्रेम में बंध चुके थे| बस वे उनकी याद में रोते रहते थे|

श्री रघुनाथ ने घर आकर अपने बड़ो से अनुरोध किया कि मुझे श्री गौरांग महाप्रभु के चरणों में आत्म समर्पण करने की इजाजत दो | घर में एकलौता बच्चा, वह भी सन्यासी बनने की जिद कर रहा था | इतनी धन संपत्ति, वैभव सब छोड़ कर, वह जाना चाह रहा था | कुछ बड़ों ने सलाह दी के इसका विवाह कर दो | सुंदर कन्या से सन्यास का सारा नशा उतर जाएगा , परन्तु वे यह नहीं जानते थे के श्री रघुनाथ भगवान के परिकर है, वह तो जाएगा ही| उसे न धन संपत्ति, न वैभव रोक पाया, न ही सुंदर नारी रोक पायी |

कुछ समय बाद समाचार आया कि महाप्रभु रामकेली में रूप एव सनातन पर कृपा करके, वृन्दावन की ओर प्रस्थान करने वाले है | परन्तु श्री सनातन के आग्रह पर, वे शांतिपुर श्री अद्वैत आचार्य के घर ठहरेंगे | अब तो रघुनाथ को न दिन का चैन था और ना ही रातों की नींद| रघुनाथ ने घर में महाप्रभु से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की तथा यह भी बताया की यदि उन्हें मिलने नही भेजा गया तो उनके प्राण नही रहेंगे| घर में काफी सोच विचार कर तय किया गया की रघुनाथ को शांतिपुर में रक्षको,ब्राह्मणों,सेवकों के साथ  भेजा जाए| रघुनाथ अपने रक्षकों आदि को छोड़कर अन्य समूह में मिल गये जो श्री गौरांग की जय जय कार के नारे लगाते हुए जा रहे थे|

अबकी बार श्री रघुनाथ शांतिपुर पहुंचकर श्री गौरांग महाप्रभु के चरणों में लिपट गये तथा उन्होंने रो – रो कर प्रार्थना की, कि मुझे अपने साथ नीलांचल ले चलो| आपका विरह मुझसे सहन नही होता| महाप्रभु ने उसे ह्रदय से लगाया एवं कुछ दिन अपने साथ ही वहीँ रहने की व्यवस्था करायी| फिर रघुनाथ को समझा बुझा कर वापस भिजवा दिया तथा आश्वासन दिया कि श्री कृष्ण शीघ्र कृपा करेंगे| फिर महाप्रभु ने रघुनाथ से यह भी कहा,” वत्स! मन में किसी प्रकार का दुःख मत करना| मैं  जब वृन्दावन  से लौटकर नीलांचल जाऊंगा तब तुम किसी छल से मेरे पास आ जाना| छल का स्फुरण स्वयं श्री कृष्णा तुम्हारे ह्रदय में करेंगे|” जिसपर श्री कृष्णा की कृपा होती है उसे भला कौन संसार में रख सकता है| अबकी बार रघुनाथ घर लौटे तो उनमे आश्चर्यजनक परिवर्तन देखने को मिला| अब वो सबके साथ हंसी ख़ुशी बात करते| पत्नी को भी खुश  रखते| पिता एवं ताऊ ने उनके कंधो पर दायित्वपूर्ण कार्य भी सौंप दिया जिसे रघुनाथ दास तन्मयता से करने लगे| उनके पिता एवं ताऊ ने रघुनाथ को कुलगुरु यदुनंदन आचार्य से दीक्षा दिलवा दी| रघुनाथ का आतंरिक उद्देश्य था, श्री गौर चरण की शीघ्र प्राप्ति|

उनके यहाँ का राजा मुसलमान था| किसी ने रघुनाथ के पिता और ताऊ के खिलाफ, राजा  के कान भरने शुरू किये कि वे लोग कर तो बहुत सारा इकठा करते हैं परन्तु राजा को बहुत कम भेजते हैं| राजा ने वजीर को सप्तग्राम भेजकर दोनों भाइयों को गिरफ्तार करने का आदेश दिया| दोनों भाइयों को सूचना मिली तो वे पहले ही छिप गये|वजीर, रघुनाथ को गिरफ्तार करके ले आया एवं उन्हें कारागार में डाल दिया| प्रतिदिन रघुनाथ को डराया, धमकाया जाता परन्तु राजा रघुनाथ को देखता तो मारने का आदेश नही दे पाता था | रघुनाथ ने धैर्यपूर्वक सुल्तान से बात की एवं अपना पक्ष रखा तथा सुल्तान को बताया की मेरे पिता,ताऊ निर्दोष हैं | राजा ने भी बात सुनी तो  कर (टैक्स) के कम देने की बात कही | रघुनाथ ने शीघ्र राजा एवं पिता का समझौता करवा दिया| सब लोग रघुनाथ के कौशल की प्रशंसा करने लगे|

 

नित्यानंद प्रभु से मिलना

श्री रघुनाथ को खबर मिली कि श्री नित्यानंद प्रभु सप्तग्राम के अंतरगत पानीहाटी आयें हैं| उनके साथ रामदास, गदाधर, पुरंदर पण्डित आदि पार्षद हैं| महाप्रभु ने उन्हें घर – घर जाकर प्रेम बांटने का आशीर्वाद दिया है| नित्यानंद जिसे एक बार देख लेते उनमे अश्रु , कंप ,पुलक , हुंकार आदि सात्विक गुण प्रकट होने लगते| श्री रघुनाथ को लगा इस बार अवश्य कृपा होगी तथा वे पानीहाटी श्री नित्यानंद के पास पहुँच गये| श्री नित्यानंद कीर्तन नर्तन के पश्चात वट तीर के नीचे चबूतरे पर बैठे थे| श्री रघुनाथ ने आते ही नित्यानंद को साष्टांग किया| अन्य भक्तगण तो रघुनाथ को जानते ही थे| उन्होंने नित्यानंद को बताया की ये तो यहाँ के मालिक हैं | श्री नित्यानंद ने उठकर श्री रघुनाथ को उठाया| उनके सर पे चरण कमल रखकर फिर उन्हें उठाकर ह्रदय से लगा लिया| फिर प्रेम से रघुनाथ को देखते हुए बोले ,” चोर, इतने दिनों बाद आया| तुझे दंड मिलेगा|” श्री रघुनाथ हैरान होकर निताई चाँद की तरफ देखने लगे परन्तु निताई का भाव था गौरांग महाप्रभु भगवत तत्त्व हैं, उन तक पहुँचने के लिए गुरु तत्त्व आवश्यक है एवं श्री रघुनाथ ने दो बार गौरांग महाप्रभु से सीधे ही कृपा प्राप्त करने  का प्रयास किया था|

दंड महोत्सव

 

दंड के लिए श्री रघुनाथ तैयार थे| श्री नित्यानंद ने उन्हें दंड स्वरुप सभी भक्तों के लिए दही चिवडा खिलाने का आदेश दिया| श्री रघुनाथ को दंड सुनकर ख़ुशी हुई| धन और सेवकों की उन्हें कमी नही थी| अल्प समय में सारा इंतज़ाम हो गया| इतना सारा चिवडा , केला, गुड़, दूध, दही मंगवाया गया| केला और गुड़ को मिलकर मिश्रित द्रव्य बनाया गया| फिर चिवड़े के दो हिस्से किये गये| एक हिस्से में चिवड़े और दही तथा गुड़ केले का मिश्रण डाला गया| दूसरे हिस्से में चिवडों में दूध तथा गुड़ केले का मिश्रण डाला गया| सभी भक्तों को एक एक डोना दही चिवडा व एक डोना दूध चिवडा दिया गया| फिर श्री रघुनाथ ने वट वृक्ष के नीचे आसन बिछाकर दो दो डोने श्री गौरांग महाप्रभु एवं श्री नित्यानंद प्रभु के लिए रख दिए| निताई चाँद ने ध्यानस्त होकर श्री गौर हरी को पुकारा एवं प्रेम पुकार सुनकर गौरांग महाप्रभु वहां आये| उनके आते ही श्री नित्यनन्द जी खड़े हो गये एवं महाप्रभु के साथ श्री नित्यानंद जी सभी लोगों के बीच गये | सभी के डोने में से एक एक कण उठाकर श्री गौरांग महाप्रभु को खिलाने लगे| अंत में श्री  नित्यानंद गौरांग महाप्रभु के साथ चबूतरे पर आकर बैठ गये| श्री गौरांग महाप्रभु वहां प्रकट हो गये थे , यह दृश्य सभी को नही दिखा| जिन्होंने प्रेम चक्षुओं से उन्हें देखा, उन्हें ही श्री महाप्रभु दिखे| नित्यानंद ने अपना एवं श्री गौरांग का अवशिष्ट प्रसाद श्री रघुनाथ को दिया| दंड महोत्सव समाप्त हुआ| आज भी जहान्वी तट पर उसी वट वृक्ष के नीचे ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी को हजारों साधू संत एकत्र होकर श्री रघुनाथ का दंड महोत्सव मनाते हैं|

अगले दिन राघव पण्डित के घर निताई चाँद का भोजन था| श्री गौरांग महाप्रभु वहां भी आये थे| उन्होंने खाना खाया| राघव  पण्डित ने उनका अवशिष्ट श्री रघुनाथ को दिया| अगले दिन श्री रघुनाथ श्री नित्यानंद के चरणों में लौट गये एवं प्रार्थना करने लगे ” श्री चैतन्य चरणों का आश्रय पाना चाहता हूँ , आपकी कृपा के बिना यह संभव नही है| कृपया अपने चरण मेरे मस्तक पर रखकर मुझे आशीर्वाद दें जिससे मैं चैतन्य चरण प्राप्त कर सकूँ|” फिर वह रोने लगे| निताई चाँद ने श्री रघुनाथ को आशीर्वाद दिया कि तुम शीघ्र चैतन्य चरणों का आश्रय पाओगे|

श्री रघुनाथ घर पहुंचे परन्तु घर के भीतर नही गये| बाहर ही दुर्गा मंडप में रहने लगे| उनके पिता, ताऊ ने बहुत समझाया परन्तु वे नही माने| उनकी माँ एवं पत्नी का रो-रो कर बुरा हाल हो गया था| पिता ने मंडप के चारों तरफ सख्त पहरा लगा दिया की रघुनाथ भाग न पाए|

एक दिन रात्रि के 3 प्रहर बीत गये थे| श्री रघुनाथ रो-रो कर श्री गौरांग महाप्रभु को बुला रहे थे| प्रभात होने में ४ दंड बाकी थे| कुल गुरु श्री यदुनंदन आचार्य रघुनाथ के  पास आये और बोले ” बेटा मेरी सहायता करो, जो बालक मेरे घर में श्री विग्रह की सेवा करता था, वह मना कर रहा है|मैं  बूढा हो गया हूँ| मुझसे सेवा नही हो पा रही| तुम मेरे साथ उस बच्चे के घर चलो एवं तुम्हारा कहा वह मना नही कर सकता| रघुनाथ गुरुदेव के साथ चले, इसलिए किसी प्रहरी ने नही रोका| श्री रघुनाथ ने आचार्य से अपने घर जाने को कहा तथा आश्वासन दिया कि मैं पुजारी को लेकर आपके घर आता  हूँ| आचार्य घर लौट गये|

रघुनाथ ने पुजारी को आचार्य के घर छोड़ा तथा स्वयं नीलांचल की तरफ चल पड़े| नीलांचल में वे वन पथ से गये| रास्ता खतरनाक था परन्तु श्री चैन्तन्य चरण का ध्यान करते-करते १८ दिनों का रास्ता १२ दिनों में तय कर नीलांचल पहुंचे, बीच में केवल 3 दिन ही उन्हें भोजन प्राप्त हुआ था| ऐसी अवस्था में श्री रघुनाथ ने महाप्रभु के निकट जाकर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया | महाप्रभु अपनी भक्त मण्डली में घिरे बैठे थे| महाप्रभु के पार्षद श्री मुकुंद दत्त ने रघुनाथ को देखा और बोले,” सप्तग्राम अधिपति रघुनाथ?”| महाप्रभु रघुनाथ को देखते ही प्रसन्न हो गये| उन्होंने श्री रघुनाथ को ह्रदय से लगा लिया| फिर क्या था ? भक्त और भगवान् का मिलन, प्रेम अश्रु रोके नही रुकते थे| सभी भक्तगणों की आँखें ये दृश्य देखते देखते नम हो गयी|श्री रघुनाथ महाप्रभु से बोले,” इस बार मैंने आपकी कृपा प्रत्यक्ष अनुभव की है| आपकी कृपा से ही मेरा उद्धार हुआ है| महाप्रभु ने श्री रघुनाथ को स्वरुप दामोदर को सौंपा एवं आदेश दिया की इसे अपने पुत्र के रूप में स्वीकार करो| पांच दिन तक रघुनाथ महाप्रभु के सेवक गोविन्द का दिया महाप्रभु का अधरामृत स्वीकार करते रहे| उसके पश्चात रघुनाथ जगन्नाथ मंदिर के सिंह द्वार पर याचक वृत्ति से खड़े होते| जो मिल जाता था उसी से पेट की भूख मिटाते| यह सूचना महाप्रभु को भी मिली| वे प्रसन्न हुए कि रघुनाथ ठीक कर रहा है|

महाप्रभु का उपदेश  

महाप्रभु ने श्री रघुनाथ दास को यह उपदेश दिया- ग्राम्य कथा कहना और सुनना , अच्छा  खाना और अच्छा पहनना , इसका परित्याग करो| अपना मान न करवाकर दूसरों का मान करो| कृष्ण नाम का सदा जप करना और मानसिक रूप से ब्रज में श्री राधा कृष्णा की सेवा करना|

सप्तग्राम में रघुनाथ के गृह त्यागने से दुःख छा गया| रघुनाथ के  पिता सोच सोचकर परेशान हो जाते कि महलों का पला ये लड़का इतना कठिन वैराग्य कैसे सहन करेगा? परन्तु रघुनाथ में इतना वैराग्य था की वर्णन करना कठिन है| सिंह द्वार से भिक्षा माँगना छोड़ा क्योंकि भिक्षा के प्रति लालच आता था कि अमुक व्यक्ति भिक्षा देगा, इसने कल दिया तो आज भी देगा| भिक्षा छोड़कर कंगालों के साथ बैठकर खाने लगा| सप्तग्राम के अधिपति का वैराग्य इससे भी कठिन था| श्री रघुनाथ ने सोचा जो मैं खाना खा रहा हूँ हो सकता है वह परिश्रम की कमाई का न होकर किसी के हक़ का धन तो नही है? इसलिए पेट भरने क लिए श्री रघुनाथ को कुछ और सोचना था|जगन्नाथ मंदिर के पास , जगन्नाथ जी के महाप्रसाद का विक्रय होता था| जो भोजन नही बिक पाता वह गायों के लिए डाल दिया जाता था|गायें भी कुछ खाती और कुछ छोड़ जाती| उस खाने की सामग्री में दुर्गन्ध आती थी| महलों में पला रघुनाथ उस दुर्गन्धयुक्त भात को उठाकर ले आता | बार बार उसे धोकर जो भीतर से कुछ साफ़ निकलता उसमे नमक डालकर वह खा जाता| परन्तु स्वरुप दामोदर , रघुनाथ की गतिविधियों को ध्यान से देखते थे| वे रघुनाथ के इस कठोर वैराग्य को देखकर मन ही मन खुश होते थे | एक दिन रघुनाथ बासी प्रसाद को धोकर खाने ही वाले थे कि स्वरुप दामोदर पहुँच गये एवं बोले ,”रघुनाथ, तुम अमृतमय प्रसाद रोज़ खाते हो , मुझे नही देते|” कहकर मुट्ठी भर वही प्रसाद श्री स्वरुप दामोदर ने अपने मुह में डाल दिया|

महाप्रभु को पता चला ,वे  भी स्वरुप दामोदर को साथ लेकर रघुनाथ की कुटिया पर गये| रघुनाथ उस समय वही प्रसाद केले के पत्ते पर रखकर खाने की तैयारी में था| महाप्रभु ने कहा रघुनाथ , ऐसा अलोकिक प्रसाद तुम रोज़ अकेले अकेले खाते हो “| और महाप्रभु ने प्रसाद मुट्ठी भर कर अपने मुख में डाल दिया| दूसरी मुट्ठी भर कर जैसे ही खाने लगे स्वरुप ने हाथ पकड़ लिया, “प्रभु ये आपके लिए नही है” | महाप्रभु बोले मैं नित्य  नाना प्रकार के प्रसाद खाता हूँ परन्तु ऐसा दिव्य प्रसाद कहीं नही मिलता|

महाप्रभु से मिला उपहार

महाप्रभु के पास गोवर्धन शिला और गुंजा माला किसी भक्त ने दी थी| गुंजा माला को तो गले में धारण कर लेते और गोवर्धन शिला को मस्तक पर लगाते , कभी छाती से , कभी नेत्रों से| महाप्रभु के अश्रुओं से ये दोनों ही कई बार भीग चुके थे| महाप्रभु ने ये दोनों वस्तुएं रघुनाथ दास को दी एवं कहा इस शिला की जल से एवं तुलसी मंजरी से नित्य सात्विक सेवा करना| तुम्हे कृष्ण धन की प्राप्ति होगी| रघुनाथ को लगा महाप्रभु ने शिला देकर गिरिराज गोवर्धन और गुंजा माला देकर राधा रानी के चरण प्रदान किये हैं| इस शिला में रघुनाथ को श्री कृष्ण के साक्षात दर्शन होते थे|

नीलांचल में रघुनाथ दास १६ वर्षों तक रहे| वे स्वयं दिन में उन लीलाओं का दर्शन करते| रात्री की लीलाओं का वे स्वरुप दामोदर से सुनते| १६ वर्षों के पश्चात महाप्रभु अंतर्धान हो गये| स्वरुप दामोदर भी इस दुःख को सेहन न कर सके| उन्होंने ने भी कुछ ही दिनों में शरीर छोड़ दिया| अब तो रघुनाथ दास के प्राण अतिदुखी हो गये | वे महाप्रभु के विरह में रोते रोते अंधे हो गये थे| मुक्ताचारित की रचना के समय वे अंधे थे एवं कृष्ण कविदास ने रचना लिखने में उनकी सहायता की थी| महाप्रभु के पार्षद श्री रूप एवं सनातन गोस्वामी से मिलने के लिए वे  वृन्दावन की ओर निकल पड़े| वृन्दावन में रूप एवं सनातन गोस्वामी ने श्री रघुनाथ को बहुत समझाया तथा बताया कि महाप्रभु ने जो उपहार दिए हैं उससे ज्ञात होता है कि वे तुमसे ब्रज रस में साधना करवाना चाहते थे| तुम तो महाप्रभु द्वारा की गई लीलाओं के एकमात्र गवाह हो| तुमने प्रत्यक्ष महाप्रभु की लीलाओं के दर्शन किये हैं और स्वरुप दामोदर से भी लीलाओं को सुना है| हम तो उन लीलाओं को तुम्हारे मुख से सुनना चाहते हैं|

रघुनाथ दास जब लीलाओं को बताते तो उनकी कुटिया के बहार भक्तों की भीड़ लग जाती थी , उनको उन लीलाओं से आनंद प्राप्त होता था| महाप्रभु की  लीलाएं सुनने श्री कृष्णदासकविराज भी आया करते थे| परन्तु वृन्दावन में उनका घनिष्ठ सम्बन्ध था श्री रूप गोस्वामी जी से|

राधा कुंड में

श्री रघुनाथ चाहते थे की गोवर्धन में रहकर वे वहां की राधा कृष्ण की लीलाओं का चिंतन करें| रूप गोस्वामी जी ने अनुमति दी परन्तु साथ में कृष्णदास कविराज को लेजाने को कहा क्योंकि रघुनाथ जब लीला में प्रवेश करते थे उन्हें बाहर की सुध बुध नही होती थी|श्री कृष्णदास कविराज उनकी देख भाल करते थे| गोवर्धन के चरण प्रान्त में महाप्रभु बैठकर राधा कुंड श्याम कुंड की महिमा का ध्यान करते थे| वहीँ एक वृक्ष के नीचे रघुनाथ दास रहने लगे| एक दिन श्री सनातन गोस्वामी रघुनाथ से मिलने आ रहे थे | वे देखते हैं कि एक शेर पानी पी रहा है , श्री कृष्ण शेर से बचाने के लिए धनुष बाण पकड़ कर उनके पीछे खड़े हैं| ध्यान भंग होने पर रघुनाथ ने श्री सनातन को  दंडवत प्रणाम किया| श्री सनातन बोले कि तुम्हारे लिए कुटिया बनवा देता हूँ क्योंकि हिंसक जानवर आते हैं एवं तुम्हारा जीवन बहुत अनमोल है| तुम्हारे मुख से महाप्रभु की लीलाओं को सुनकर बहुत से भक्तों का भला होता है| भगवान् को तुम्हारी रक्षा स्वयं करनी पड़ती है|

अरिष्ट ग्राम में श्री रघुनाथ दास की कुटिया बनवाई | अरिष्ट ग्राम में कथा प्रचलित है कि एक बार श्री कृष्ण ने अरिट नामक असुर का किया था तथा वह बैल के रूप में आया था | श्री राधा रानी ने श्री कृष्ण से कहा कि गोवध के पाप मोचन के लिए सभी तीर्थों के जल से स्नान करके आना पड़ेगा| श्री कृष्ण ने पृथ्वी पर ठोकर कर एक कुंड बनाया तथा सभी तीर्थो को बुलाया| सभी तीर्थों ने साक्षात प्रकट होकर कुंड को जल से भर दिया| उस कुंड का नाम रखा श्याम कुंड| श्री राधा रानी ने श्याम कुंड के पास एक और कुंड प्रकट किया| श्री राधा रानी एवं अन्य सखियों ने मानस गंगा के जल से कुंड को भरना चाहा तभी सभी तीर्थो ने श्री राधारानी की स्तुति की| राधा रानी की अनुमति से उस कुंड में सभी तीर्थो ने अपना अपना जल दिया| इस कुंड का नाम राधा कुंड रखा गया| समय के चक्र से ये कुंड नीचे ज़मीन में धस गये थे| महाप्रभु जब ब्रज की परिक्रमा करने आये तभी उन्होंने इन दोनों कुंडों का अविष्कार किया|

श्री रघुनाथ दास  ,उन स्थानों का खनन कर कुंडों का उद्धार करना चाहते थे| भक्त की इच्छा एवं भगवान पूर्ण न करें, यह हो नही सकता| किसी अमीर भक्त को सपने में श्री बद्री नारायण ने श्री रघुनाथ दास से मिलने को कहा| श्री रघुनाथ के कहने पर उस अमीर भक्त ने राधा कुंड एवं श्याम कुंड बनवा दिए| रघुनाथ दास की कुटिया राधा कुंड के बिलकुल पास थी|

श्री रघुनाथ दास पूरे दिन कुछ मट्ठा ही पीते थे| उनकी दिनचर्या बहुत कठोर थी| प्रतिदिन एक लाख नाम जप|एक हज़ार बार भगवान् को दंडवत | एक प्रहार महाप्रभु की चरित कथाओं का वर्णन एवं रात दिन श्री राधा कृष्णा की मानसिक सेवा| श्री रघुनाथ दासको एकबार अजीर्ण हो गया| विट्ठल दासजी बोले ये तो एक कप मट्ठे से अधिक कुछ लेते ही नही| तभी श्री रघुनाथ मुस्कुराए एवं बोले मैंने  मानसिक सेवा में युगलनाथ को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण किया है| देखो मानसिक सेवा का असली असर|

एक बार श्री रूप गोस्वामी ने “ललित माधव ” नाटक श्री रघुनाथ को पढने को दिया| नाटक में श्री राधा की विरह वेदना का चिंतन करते करते वे इतना खो गये की उनके प्राणों की रक्षा करना भी कठिन हो गया|फिर श्री रूप गोस्वामी ने हँसाने वाली “दान केलि कौमुदी ” नामक ग्रन्थ की रचना कर दी| तब जाकर श्री रघुनाथ ठीक हुए| वृन्दावन में लगभग 20 वर्षो के पश्चात उन्हें श्री सनातन गोस्वामी का अंतर्धान, फिर जल्दी ही श्री रूप गोस्वामी ने भी नित्य निकुंज में प्रवेश किया| उससे श्री रघुनाथ को इतना आघात लगा की वो जो थोडा खाते थे वह भी बंद सा हो गया| उनकी शरीर की जर्जर अवस्था हो गयी| सन १६५२ में नब्बे वर्ष की अवस्था में उन्होंने शरीर छोड़कर निकुंज लीला में प्रवेश किया|

श्री रघुनाथदास द्वारा रचित रचनाएँ

  1. स्तावली

२. दानकेलि  चिंतामणी

  1. मुक्ता चरितं

मुक्ता चरितं का कथानक इस प्रकार है- श्री कृष्ण ने अपनी दो गायों को सजाना था इसलिए उन्होंने श्री राधा एवं अन्य  गोपियों से मोतियों की मांग की | उन्होंने देने से मना कर दिया| फिर वे माँ से मांगने गये कि मुझे मोती दो, मैं ऊगाऊंगा| माँ ने दो तीन मोती दे दिए| श्री कृष्ण ने मोतियों को बो दिया|फिर वे श्री राधा से कहने लगे कि तुम इन्हें दूध से सींचना| उगने पर कुछ मोती तुमको भी दूंगा|

श्री राधा एवं सखियों ने श्री कृष्ण की खेती का मजाक उड़ाया परन्तु 3 दिन में ही अंकुर फूटे एवं मोती उगने लगे| श्री कृष्ण ने सखियों को चिडाने के लिए अपने मोतियों से गाये , बैल , बंदरों तक को भी सजाया| फिर श्री राधा एवं सखियों ने भी मोती उगाये|पर अंकुर नही फूटे , उल्टा मोती चोरी हो गये| वे श्री कृष्णा से मोती लेने गयी| दोनों ही दलों में बहस हुई परन्तु मोती नही मिले तो वे रूठ कर चली गयी| तभी श्री कृष्ण ने उनके पास बहुत सारे मोती भिजवा दिए| ये कहानी श्री कृष्ण सत्यभामा को सुना रहे थे | सुनते सुनते वे श्री राधा की याद में धैर्य खो बैठे और रोने लगे|

||जय जय श्री राधे||

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