Sri Nivasacharya prabhu

                                श्री चैतन्य महाप्रभु का प्रसाद, तथा उन्हीं का विस्तार रूप कहे जाते हैं श्री निवासाचार्य प्रभु।

गंगाधर उर्फ़ चैतन्यदास तथा परम भागवती, पतिव्रता लक्ष्मीप्रिया की एकमात्र संतान, जिनका पृथ्वीलोक पर आगमन ही श्रीमन महाप्रभु की शिक्षायें और कृष्ण–प्रेम की लहर फ़ैलाने के लिए हुआ।
इनके जन्म की भी रोचक कथा है। श्री चैतन्यदास और लक्ष्मीप्रिया परम गौर-भक्त थे। दोनों आदर्श भक्त दंपत्ति भक्तिमय जीवन व्यतीत कर रहे थे। संतान प्राप्ति की तनिक इच्छा भी भक्त दंपत्ति को नहीं थी। परन्तु एक दिन हठात भगवत प्रेरणा से दोनों के मन में सुन्दर, सुपात्र, भगवत-भक्त संतान की इच्छा जागी। दोनों ने एक दूसरे को अपनी इच्छा बताई तथा एक जैसी इच्छा जानकर प्रसन्न हुए। भक्त दंपत्ति ने नीलाचल जाकर महाप्रभु से अपने मन की बात कहने का निश्चय किया क्यूंकि उनकी इच्छा को श्रीमन महाप्रभु की सहमति मिलना अत्यावश्यक था। नीलाचल में महाप्रभु को देखते ही दोनों का साहस जाता रहा। तब स्वप्न में जगन्नाथ जी ने दोनों को दर्शन दिए और कहा, “तुम घर जाओ! शीघ्र ही तुम्हें एक सर्वांग सुन्दर पुत्र होगा, जो अपने असाधारण प्रेम व पांडित्य से तुम्हारे कुल को धन्य करेगा।”
इस प्रकार, सन 1517 में वैशाखी पूर्णिमा के दिन रोहिणी नक्षत्र में लक्ष्मीप्रिया देवी के गर्भ से चम्पकवर्ण एक परम रूपवान शिशु का जन्म हुआ। चूँकि महाप्रभु ने पहले ही घोषणा कर दी थी, “श्रीनिवास आयेंगे”, इसलिए उनका नाम रखा गया श्रीनिवास।
चूँकि उनके माता पिता गौर-भक्त थे, इसलिए बाल्यकाल से ही श्रीनिवास गौर तथा गौर-परिकरों की कथा सुनते-सुनते बड़े हुए। तुतली ज़ुबान में गौर तथा गौर परिकरों के नाम सबको गा-गा के सुनाते। माता पिता अत्यंत हर्षित होते। इसके साथ वे मेधावी छात्र भी रहे। व्याकरण, काव्य, अलंकार आदि में सुपंडित थे। आगे चलकर उन्होंने श्री जीव गोस्वामी से शास्त्र अध्ययन में महारत प्राप्त की। श्री गोपाल भट्ट उनके दीक्षा गुरु हुए।
लीला-स्मरण में श्रीनिवास का असाधारण अभिनिवेश था। वे एक-एक दिन एक–एक लीला में डूबकर उसका प्रत्यक्ष दर्शन करते। एक दिन गौर लीला में प्रवेशकर उन्होंने देखा की वे सुगन्धित तेल, माला, चन्दन आदि से प्रभु की सेवा कर उनके पास खड़े चामर डुला रहे हैं। उसी समय प्रभु के इंगित दुसरे सेवक ने उनके गले से माला उतारकर श्रीनिवास को पहना दी। ध्यान भंग होने पर उन्होंने देखा की वही माला उनके गले में लटक रही है।
ऐसे ही एक दिन बसंत के अवसर पर वे ब्रजलीला का ध्यान कर रहे थे। ध्यान करते करते मंजरी रूप से ब्रजगोपियों के साथ श्रीकृष्ण की होली लीला में प्रवेश कर गए। उन्होंने देखा की होली खेलते-खेलते राधारानी के हाथ का गुलाल शेष हो गया होगा। उसी समय उन्होंने गुलाल लाकर उन्हें दे दिया। ध्यान भंग होने पर होली के चिन्ह अपने वस्त्रादि पर पाकर वे विस्मित हुए। दुसरे लोग भी ये देखकर चकित हुए कि उनका सर्वांग होली के रंग से रंगा हुआ है।
देवयोग से श्रीनिवासाचार्य जी ने बहुत वियोग झेला। श्रीमन महाप्रभु, गदाधर पंडित, श्री नित्यानंदप्रभु, श्री अद्वैताचार्य, श्री रूप और श्री सनातन के अंतर्धयान का दुखद समाचार उन्हें, उन सबके दर्शानाकांशी, श्री निवासाचार्य प्रभु को पथ पर ही मिला। हर बार श्री निवासाचार्य जी को विरह वेदना, रोदन और बार बार के वज्रपात के कारण मूर्छा का आघात झेलना पड़ा।
प्रश्न ये उठता है कि महाप्रभु प्रिय श्री निवास के साथ ऐसा क्यूँ हुआ? क्या सभी ने योजनानुसार श्री निवास को मर्माहत करने का प्रण ले लिया लिया था? यदि ऐसा है तो इसका उद्देश्य भी मंगलमय ही रहा होगा। भगवान जो करते हैं, अपने भक्त के लिए मंगलमय ही करते हैं। शायद उनका उद्देश्य था श्री निवास को विरहाग्नि में तपाकर उनके स्वरुप को उज्ज्वलतर और उज्ज्वलतम करना, उनके प्रेम को अधिकाधिक परिपुष्ट करना होगा। और ऐसा हुआ भी।
श्री निवासाचार्य जी गृहस्थ हुए। श्री जीव गोस्वामी द्वारा उन्हें ‘आचार्य ठाकुर’ की पदवी प्राप्त हुई। श्री निवासाचार्य ने राजा वीरहाम्वीर का उद्धार कर उन्हें अपना शिष्य बनाया। श्रीमन चैतन्य महाप्रभु के उद्देश्य को पूर्ण किया।
सन 1602 की कार्तिक शुक्ल-अष्टमी को श्री निवासाचार्य ने नित्य लीला में प्रवेश किया।

राधे राधे

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *