Sripad Sanatana Goswami – Biography – Life History

जब भी इस धरा भूमि पर भगवान् अवतार लेते हैं तो उनके साथ उनके पार्षद भी आते हैं. श्री सनातन गोस्वामी ऐसे ही संत रहे जिनके साथ हमेशा श्री कृष्ण एवं श्री राधा रानी हैं. श्री सनातन गोस्वामी जी का जन्म सन १४६५ में हुआ. सन १५१४ में श्री चैतन्य महाप्रभु संन्यास के बाद नीलांचल में विराज रहे थे. अचानक महाप्रभु के मन में वृन्दावन दर्शन की इच्छा विशाल और वेगवती हो गयी. वे चल पड़े वृन्दावन की ओर. उनके साथ भक्तों की अपार भीड़ भावावेश में नृत्य और कीर्तन करते चली. महाप्रभु ने झारखण्ड के रास्ते वृन्दावन जाना था पर अचानक ही महाप्रभु रास्ता बदल कर मुड़ चले ,गौड़ देश के राजा हुसैन शाह की राजधानी ‘गौड़’ की ओर. आखिर क्या था वहां? कौनसे ऐसे भक्त थे जिन्होंने महाप्रभु को अपनी तरफ खींच लिया?
अमरदेव और संतोषदेव दो भाई थे जिनके प्रेम ने महाप्रभु को आकर्षित किया. यह दोनों भाई गौड़ देश के बादशाह हुसैन शाह के मंत्री थे. दोनों संस्कृत , अरबी, फ़ारसी के महान विद्वान थे. मुसलमान राजा के अधीन होते हुए भी वे श्री कृष्णा भक्त थे. राज काज का कार्य समाप्त कर वे अपने घर में श्री कृष्ण की भक्ति करते थे. चैतन्य महाप्रभु और उनके प्रेम धर्मं से आकृष्ट होकर संसार त्याग करने का संकल्प ले चुके थे.
महाप्रभु , हुसैन शाह की राजधानी के पास पहुँच कर विश्राम कर रहे थे. दोनों भाइयों को जब महाप्रभु के आगमन की सूचना मिली तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा. दोनों भाइयों ने दीन वेश में महाप्रभु को दंडवत प्रणाम किया. आंसू तो रुक ही नहीं रहे थे. दोनों भाइयों ने महाप्रभु से प्रार्थना की कि अब हमारे उद्धार का कोई उपाय करो. हमें अपने चरणों का सेवक बना लो.
महाप्रभु ने दोनो भाइयों को गले से लगा लिया एवं उन्हें बताया की तुम श्री कृष्णा के चिह्नित दास हो. श्री कृष्णा जल्दी ही तुम पर कृपा करेंगे. महाप्रभु ने उनके नाम सनातन और रूप रख दिये एवं उन्हें आशवस्त किया कि तुम्हारा उद्धार निश्चित है. महाप्रभु द्वारा रास्ता बदलने का अर्थ अब भक्तों को समझ में आया. दास तकलीफ सहकर स्वामी के पास जाता है , पर यहाँ तो उल्टा ही नज़ारा था. भगवान् अपने भक्त के पास आये थे. भक्त जितना उत्सुक भगवान से मिलने को होता है उससे कहीं अधिक भगवान् भक्त से मिलने को उत्सुक होते हैं.

                                                                शिक्षा
श्री सनातन गोस्वामी के पितामह श्री मुकुंड देव , गौड़ राज्य में उच्च पद पर आसीन थे. वे रामकली में रहते थे जबकि सनातन अपने पिता कुमारदेव के साथ बाक्लाचंद्र द्वीप में रहते थे. कुमार देव की मृत्यु के पश्चात पितामह , सनातन को रामकली लाये तथा उनकी शिक्षा की व्यवस्था की. शिक्षा के सबसे बड़े केंद्र नवद्वीप में शिक्षा हुई. श्री सनातन असाधारण प्रतिभा के धनी थे. जल्दी ही उन्होंने अरबी एवं फ़ारसी भी सीख ली.
बचपन में श्री सनातन को एक ब्राह्मण ने स्वप्न में श्रीमद भागवतम भेंट की थी. प्रातः होने पर वही ब्राह्मण उन्हें भागवतम भेंट देने आया. वे नियमित रूप से भागवतम का पाठ किया करते थे. वृन्दावन वास के प्रारंभ में उन्होंने आचार्य परमानन्द भट्टाचार्य से भागवत के निगुढ़ तत्व की शिक्षा ली. श्री विद्यावाचस्पति , उनके दीक्षा गुरु थे. कुछ आचार्यों ने श्रीचैतन्य महाप्रभु को श्री सनातन का दीक्षा गुरु माना है.
राज दरबार से आने के बाद श्री सनातन कृष्णा भक्ति में लग जाते थे. रामकेली में श्री मदन मोहन मंदिर,सनातन सागर,रूपसागर , दीधि , श्याम कुंड , राधा कुंड , ललिता कुंड, विशाखा कुंड , सुरभि कुंड, रंग देवी कुंड, इन्दुरेखा कुंड आज भी वहां है. इन्ही कुंडो के किनारे कदम के वृक्ष के नीचे बैठकर वे श्री कृष्णा लीला का चिंतन करते थे. चिंतन करते करते वे धैर्य खो बैठते और उनके नेत्रों से अश्रु धारा बहने लगती.
एक बार राजा हुसैन शाह के सैनिक उड़ीसा के देव देवियों की मूर्तियों को ध्वस कर रहे थे . उस समय दोनों गोस्वामियों के मन में आत्मग्लानी होने लगी और वे मंत्री पद छोड़ने के लिए सोचने लगे. महाप्रभु के रामकली आने पर दोनों गोस्वामियों के ह्रदय में कृष्णा प्रेम की बाढ़ आ गयी. उस बाढ़ में सांसारिक बंधन छिन्न-भिन्न हो गये तथा वे वृन्दावन जाने की योजना बनाने लगे. दोनों के पास लगभग २२ लाख स्वर्ण मुद्राएं थी. श्री रूप गोस्वामी ने दरबार में आना बंद कर दिया तथा आधी मुद्राएँ ब्राह्मणों एवं वैष्णवों में बाँट दी. १० हज़ार मुद्राएँ छोड़कर शेष परिवार के लोगों को पोषण के लिए दी. १० हज़ार मुद्राएँ एक बनिए के पास रखवाकर श्री रूप गोस्वामी वृन्दावन के लिए निकल पड़े. कुछ समय बाद सनातन गोस्वामी ने भी दरबार जाना बंद कर दिया. हुसैन शाह ने उन्हें बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया. जब हुसैन शाह उड़ीसा में युद्ध के दौरान गये तो श्री सनातन गोस्वामी ने काराध्यक्ष को १० हज़ार मुद्राएँ देकर अपनी बेड़ियाँ कटवाई.
श्री सनातन गोस्वामी ने दरवेश का भेष बनाया एवं अपने पुराने सेवक ईशान को लेकर चल पड़े वृन्दावन की ओर. दिन रात चलते चलते छुपते छुपाते वे पर्वत के निकट मुइयाँ की ज़मींदारी में पहुंचे. मुइयाँ ने बहुत आदर सत्कार किया एवं श्री गोस्वामी भी दो दिन के भूखे थे. उन्हें मूइयाँ के सत्कार में कुछ संदेह हुआ. उन्होंने सुना था मूइयाँ सत्कार करके रात को पर्यटकों की हत्या करके उनका धन छीन लेते हैं. गोस्वामी ने सेवक इशान से पूछा की तुम्हारे पास कुछ है क्या? उसने ७ अशर्फियों की बात मानी. सनातन ने सातों अशर्फियाँ लेकर मूइयाँ को देदी. मूइयाँ ने सनातन जी से कहा की मुझे ज्योतिषी ने पहले ही बता दिया था की आपके पास ८ अशर्फियाँ हैं. मूइयाँ सनातन जी की सरलता एवं सादगी से प्रभावित हुआ एवं ४ सिपाहियों को साथ कर पहाड़ के उस पार पहुंचा दिया.
पहाड़ पार कर सनातन ने ईशान से एक अशर्फी के बारे में पूछा. ईशान ने स्वीकार किया की उसके पास अशर्फी है.
अब सनातन गंभीर होकर बोले , तुम्हारी निर्भरता धन पर है , परन्तु मेरी भगवान पर है. तुम एक अशर्फी लेके वापस चले जाओ. ईशान वापस रामकेली चला गया.
चलते चलते वे हाजीपुर पहुंचे. वहां उन्हें भगिनी पति श्रीकांत मिले. श्रीकांत ने सनातन को एक बढ़िया सा कम्बल भेंट किया. ना चाहते हुए भी उन्हें कम्बल लेना पड़ा. अब सनातन के ह्रदय में छटपटाहट होने लगी की शीघ्र महाप्रभु से मुलाकात होगी. लम्बे लम्बे कदम बढ़ाते वे चलते जा रहे थे वृन्दावन की ओर . कुछ दिनों में वो काशी पहुंचे. वहां पहुँच कर पता चला कि महाप्रभु वृन्दावन से लौटकर काशी में चन्द्रशेखर आचार्य के घर ठहरे हैं. साथ ही पूरी काशी में भक्ति का आनंद छाया हुआ है. बस फिर क्या था? गोस्वामी पहुंचे महाप्रभु से मिलने परन्तु अपने को दीन समझते हुए उन्हें भीतर जाने का साहस नही हो रहा था. बाहर ही खड़े रहे. इधर महाप्रभु तो अन्तर्यामी है. वे बाहर आये एवं सनातन को गले लगाने के लिए आगे बढे. सनातन पीछे होकर अलग खड़े हो गये और हाथ जोड़कर विनती करने लगे कि मैं नीच यवन सेवी विषयी हूँ. आपके स्पर्श के योग्य नही हूँ परन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु सनातन के नज़दीक आते हुए बोले कि तुम अपनी भक्ति के बल से ब्रह्माण्ड तक को पवित्र करने की शक्ति रखते हो. मुझे भी अपने स्पर्श से धन्य बना दो. कैसी विडम्बना है? भगवान् भक्त को कह रहे हैं की अपने स्पर्श से मुझे धन्य बना दो? फिर क्या था , भगवान् और भक्त गले मिले. अश्रु की धारा रोके नही रुक रही . अपने भक्त के लिए भगवान् भी रो पड़ते हैं. महाप्रभु ने चंद्रशेखर से सनातन का वेश बदलने को कहा. सनातन ने एक वस्त्र के २ टुकड़े किये – कोपीन और वहिर्वास के रूप में उसे धारण किया. तभी से गौडीय वैष्णवों में वैराग्य वेश की प्रथा प्रारंभ हुई जो अभी तक चल रही है.
अगले दिन महाप्रभु सनातन की बार बार प्रशंसा कर रहे थे परन्तु उनकी नज़र उस बढ़िया कम्बल पर थी जो सनातन के कंधे पर था. फिर क्या था सनातन गंगा तट पर गये और एक भिखारी से उसकी गुदड़ी (फटी पुरानी) ले आये और उसे अपना कम्बल पहना दिया. महाप्रभु यह देखखर बहुत प्रसन्न हुए. अब प्रश्नोत्तर का क्रम आरम्भ हुआ. सनातन एक के बाद एक प्रश्न पूछते , महाप्रभु प्रसन्न मुख से उनका उत्तर देते जाते. महाप्रभु ने पहले श्री कृष्ण की भगवत्ता फिर उनके अवतारों का वर्णन किया. फिर साधन भक्ति और रागानुगा भक्ति का विस्तार से वर्णन किया. अब महाप्रभु ने सनातन को वृन्दावन जाने का आदेश दिया एवं उन्हें चार कार्य सौंपे.
मथुरा मंडल के लुप्त तीर्थो और लीला स्थलियों का उद्धार करना.
शुद्ध भक्ति सिद्धांत की स्थापना करना.
श्री कृष्णा विग्रह प्रकट करने हेतु.
वैष्णव स्मृति ग्रन्थ का संकलन कर वैष्णव सदाचार का प्रचार.
इसके अतिरिक्त एक कार्य और दिया. जो गरीब वैष्णव भक्त वृन्दावन भजन करने आयेंगे उनकी देख रेख भी तुमको करनी होगी. महाप्रभु से कृपा और आशीर्वाद पाकर श्री सनातन ब्रज की ओर चल पड़े. वृन्दावन पहुँच कर गोस्वामीजी ने जमुना पुलिन पर आदित्य टीला नाम के निर्जन स्थान में रहकर भजन प्रारंभ किया. साथ ही महाप्रभु द्वारा दिये गये कार्य प्रारंभ किये. श्री लोकनाथ गोस्वामी ने इस दिशा में कुछ कार्य किया था. कार्य को आगे बढ़ाते हुए सनातन गोस्वामी वनों , उपवनो और पहाड़ियों में घूमते हुए कातर स्वर से श्री राधा रानी से प्रार्थना करने लगे और फिर उनकी कृपा से एवं अपने दिव्य अनुभवों के आधार पर एक एक लुप्त तीर्थ का उद्धार करने लगे .
वृन्दावन में महाप्रभु द्वारा दिये गये कार्य को करते करते एक वर्ष बीत गया. अब गोस्वामीजी को श्री चैतन्य महाप्रभु की याद आने लगी. महाप्रभु से विरह अब असहनीय हो गया तो गोस्वामी जी झारखण्ड के रास्ते नीलांचल के लिए पैदल ही चल पड़े. रास्ते में उन्हें खुजली की बीमारी ने जकड लिया. वे सोचने लगे रोग के कारण मैं मंदिर जा नही सकता , महाप्रभु के दर्शन भी कठिन होजाएंगे. वे मन में रथ यात्रा के दौरान जगन्नाथ जी के नीचे प्राण त्याग का निश्चय कर नीलांचल पहुंचे.
नीलांचल में श्री हरिदास अपने को दीन पतित अस्पृश्य समझकर एक पर्णकुटी में रहते हैं. सनातन गोस्वामी भी हरिदास की कुटिया में पहुंचे. महाप्रभु नित्य की भाँती जगन्नाथ जी के दर्शन कर वहां पहुंचे. सनातन ने उन्हें दूर से ही दंडवत किया परन्तु महाप्रभु उन्हें देखकर आनंद विभोर होते हुए सनातन की ओर बढे,परन्तु सनातन और पीछे होते गये. फिर सनातन ने हाथ जोड़कर विनय की आप मुझे छुएं नही क्योंकि मुझे भयानक रोग हो गया है,कहीं ये रोग आपको न लग जाए. महाप्रभु ने सनातन की एक न सुनी. बलपूर्वक सनातन को गले से लगा लिया. इस प्रकार महाप्रभु रोज़ ही आने लगे , सनातन को अपनी बीमारी की चिंता नही थी . उससे अधिक चिंता इस बात की थी की ये रोग महाप्रभु को न लग जाए. इसलिए वे फिर प्राण त्याग की बात सोचने लगे.
एक दिन कृष्णा कथा कहते कहते , सनातन की ओर देखते हुए महाप्रभु बोले – तुमने मुझे आत्मसमर्पण किया है , अब यह देह मेरी है. मैंने इस देह से बहुत कार्य करवाने हैं. देह त्याग कर देने से कृष्णा की प्राप्ति नही होगी. कृष्णा की प्राप्ति होगी भजन से और भक्ति से. एक बार जब महाप्रभु ने सनातन को गले लगाया तो उनका खुजली रोग जाता रहा. होली तक महाप्रभु ने सनातन को पास रखा फिर उन्हें साश्रु नयन विदा किया.
                     वृन्दावन प्रत्यागमन एवं मदन गोपाल की सेवा
श्री सनातन गोस्वामी ने वृन्दावन आने के पश्चात सर्वप्रथम वृन्दावन देवी मंदिर की स्थापना की. इसके बाद वे महाप्रभु द्वारा दिये गये कार्य में लग गये. एक दिन मधुकरी के लिए श्री गोस्वामीजी मथुरा गये. श्री दामोदर चौबे के घर में श्री श्री मदन गोपाल की मूर्ति दिखी .उस मूर्ति को देखते ही उन्हें ऐसा लगा की उनके मन और प्राण चुरा लिए गये. अब उन्हें श्री मूर्ति की सेवा की इच्छा जाग्रत हुई. वे बार बार चौबे जी के घर जाते और मूर्ति को देखते. वह मूर्ति उन्हें बार बार अस्थिर कर देती. चौबे जी की पत्नी जितना ध्यान अपने पुत्र सदन का रखती थी उतना ही मदन का भी रखती थी. दोनों की बराबर सेवा करती थी. कहते हैं मदन गोपाल सदन के साथ उछल कूदा करते थे. श्री सनातन ने चौबे जी की पत्नी से कहा की तुम मदन गोपाल की सेवा बहुत मन से करती हो. वे तो ठीक है परन्तु वे भगवान् हैं, भगवान् की सेवा विशेष विधि विधान से होनी चाहिए. ये सुनकर ब्रजमाई ने कहा कि ठीक है मैं ध्यान रखूंगी.
अगली बार जब गोस्वामीजी उनके घर गये तो वह बोली, बाबा , मैंने आपके कहे अनुसार करने का प्रयास किया परन्तु मदन गोपाल को यह ठीक नही लगा. उन्होंने मुझे सपने में कहा की माँ तुम मुझमें और सदन में भेद करने लगी हो. सदन को तो अपने निकट रखती हो , मुझे इष्ट समझकर अपने से दूर कर देती हो. मुझे अच्छा नही लगता. अब तो गोस्वामी जी के आंसू रुकने का नाम नही ले रहे थे. उन्हें लगा की मैंने श्री मदन गोपाल को प्रेम वात्सल्य रस से कुछ समय दूर रखा. एक दिन चौबे जी की पत्नी ने आंसू बहाते हुए कहा की बाबा आज से मदन गोपाल की सेवा का भार आपके ऊपर है. स्वप्न में इन्होने मुझसे कहा की इन्हें आपको सौंप दूं. मैं बूढी हो रही हूँ , कहीं ठाकुर जी को मेरे कारण कष्ट न हो. गोस्वामी जी तो कबसे तरस रहे थे. वे श्री मदन गोपाल को लेकर अपनी कुटिया में आ गये.
मदन गोपाल के श्री विग्रह का एक प्राचीन इतिहास है. सतयुग में महाराज अम्बरीश इनकी सेवा करते थे फिर वे रावण के पास पहुंचे. फिर श्री रामचंद्र द्वारा लंका विजय के पश्चात श्री सीता जी उनकी सेवा करती थी. श्री शत्रुघ्न द्वारा उन्हें मथुरा लाया गया. बाद में श्री अद्वैत प्रभु ने आदित्य टीला के गर्भ से इनका उद्धार कर चौबे परिवार को सेवा का भार दिया. गोस्वामीजी तो मधुकरी पर निर्भर थे. वे मदन गोपाल जी को भी वही भोग लगाने लगे. एक दिन स्वप्न में मदन गोपाल जी बोले – सुखी रोटी और साग मेरे गले नहीं उतरती. कबतक ज़बरदस्ती ठेलता रहूँगा? मुझे साथ में थोडा नमक दे दिया करो. फिर गोस्वामीजी रोने लगे. वे कहते मेरे पास ५६ भोग नही है. जो मधुकरी मिलता है वो ही ठाकुर जी को खिलाता हूँ. ठाकुर आपकी राजभोग की इच्छा है तो स्वयं व्यवस्था कर लो.
मदन गोपाल जी को अपनी व्यवस्था स्वयं करनी पड़ी. एक बड़े व्यापारी की नाव टीले पर फस गयी. नाव निकल नही रही थी. कृष्णा पक्ष की रात थी , अँधेरा होने पर व्यापारी श्री रामदास को चिंता होने लगी. तभी उन्हें कहीं टीले के ऊपर दीपक की लॉ दिखाई दी. नौका से उतर कर वह दीपक की लॉ की तरफ जाने लगा. वहां कुटिया दिखी एवं कुटिया में श्री मदन गोपाल एवं श्री सनातन दिखे. वे श्री सनातन जी के चरणों में गिर पड़े एवं निवेदन किया कि आप कृपा करें तो मेरी नाव बाहर आ सकती है. वायदा करता हूँ ऐसा होने पर व्यापार में जो लाभ होगा ठाकुर जी की सेवा में लगा दूंगा. गोस्वामी जी से आशीर्वाद लेकर वह नाव की तरफ गया. कहीं से पानी की ऐसी लहर आई और नाव को सही रास्ते पर ले गयी. श्री रामदास को उस वर्ष व्यापार में बहुत लाभ हुआ और उन्होंने वृन्दावन में आकर ठाकुर जी का मंदिर बनवाया एवं सेवा परिचर्या की उत्तम स्थाई व्यवस्था कर दी. रामदास और उनकी पत्नी श्री सनातन गोस्वामी से दीक्षा लेकर धन्य थे. फिर श्री कृष्णा दास ब्रम्हचारी पर मदन मोहन की सेवा का भार सौंप कर श्री सनातन कहीं और चल दिये , गुरूजी द्वारा दिये गये कार्य को करना था.
                                                        विविध घटनाएं
श्री सनातन गोस्वामी कभी लीला स्मरण में इतना डूबे रहते की उन्हें खाने पीने की भी सुध नही होती थी. भिक्षा के लिए तो कहीं जाने का प्रश्न ही नही था. नन्द ग्राम के ब्रजवासी उन्हें दूध दे जाया करते थे. बस वही उनका भोजन था. एक बार तीन दिन तक कोई भी दूध देने नही आया. चौथे दिन एक गोप बालक लोटे में दूध लेकर आया एवं गोस्वामी जी को पीने को दिया एवं कहा,“ मैया ने तेरे तै दूध भेज्यो है. पाई लेई”. गोस्वामी जी तो उस बच्चे को एकटक निहारते ही रहे फिर बोले,” लाला तुम कोन को है? कहाँ रहे? मैया बापू का नाम तो बता?” बच्चे ने सब प्रश्नों के उत्तर दिये. अब गोस्वामीजी ने दूध पिया तो उसके स्वाद में खो गये. फिर भी उस बालक के बारे में सोचने लगे. तो उन्हें मदन गोपाल की छवि याद आ गयी. फिर उस बालक के बताये ठिकाने पर गये. वहां ऐसा कोई बालक नही था. गोस्वामीजी समझ गये की वो मदन गोपाल आये थे. फिर क्या था? आँखें आंसू बरसाने लगी.
जीवन ठाकुर का परिवर्तन
जीवन ठाकुर एक दरिद्र एवं दुखी व्यक्ति थे. एक दिन उन्होंने विश्वनाथ बाबा से प्रार्थना की “ अब गरीबी नहीं सही जा रही ”. विश्वनाथ बाबा ने स्वप्न में आकर उन्हें ब्रज जाकर सनातन गोस्वामी से मिलने को कहा. जीवन ठाकुर ब्रज में श्री सनातन गोस्वामी से मिले एवं उन्हें वृत्तांत बताया. गोस्वामीजी सोचने लगे की दरिद्रता को मैं कैसे दूर करूँ? अचानक गोस्वामीजी को याद आया की उनके पास स्पर्श मणि है. वह भजन में बाधा ना बने इसलिए उसे किसी गुप्त स्थान में रख दिया था. सनातन गोस्वामीजी ने जीवन ठाकुर को वह मणि दे दी. जीवन ठाकुर मन में विश्वनाथ बाबा की जय बोलते हुए एवं गोस्वामीजी की कृतज्ञता अनुभव करते हुए जा रहे थे कि अचानक उनके मन में प्रश्न उठा? गोस्वामीजी तो मणि के प्रति बहुत उदासीन थे. सोचते सोचते उनके मन में उन्हें अपने प्रति घृणा होने लगी.तभी उन्होंने सोचा की ज़रूर गोस्वामीजी के पास इससे भी कीमती वस्तु ‘भक्ति’ है. तभी तो उनका मणि की तरफ कोई आकर्षण नही था. मुझे भी गोस्वामीजी से मणि की जगह भक्ति लेनी चाहिए. फिर वे मणि को जमुना में फेक कर गोस्वामीजी के पास आये और उनसे दीक्षा ली.
सनातन गोस्वामी गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा प्रतिदिन करते थे. नब्बे वर्ष की उम्र में भी वे परिक्रमा कर रहे थे कि अचानक गिर पड़े. तभी एक गोप बालक ने संभाला एवं परिक्रमा का नियम तोड़ने को कहा. सनातन कहाँ मानने वाले थे. फिर भी परिक्रमा करते रहे और दोबारा गिर पड़े. फिर वो ही बालक सामने आया एवं बोला,” बाबा, तू बूढों हो गयो है. ताऊ माने नाए परिक्रमा किये बिना. ठाकुर तो प्रेम से रीझे है , तपस्या से नाही.” फिर भी गोस्वामीजी परिक्रमा करते रहते. अब उनके ह्रदय में बालक की तस्वीर बस गयी तथा बालक की आवाज़ उनके कानो में गूंजती रहती. ध्यान में भी वही बालक दिखता. संपूर्ण चिंतन उसी बालक का होने लगा. वे सोचने लगे कि कैसा बालक है की उसके चिंतन में मैं अपने इष्ट तक को भूल गया. यह साधारण बालक नही हो सकता. ज़रूर ये मदन गोपाल ही हैं.
एक बार फिर गोस्वामीजी परिक्रमा कर रहे थे. वही बालक उनसे नियम तोड़ने के लिए आग्रह करने लगा. गोस्वामीजी तो उस बालक का इंतज़ार ही कर रहे थे. उन्होंने अपना सिर बालक के चरणों में रख दिया एवं प्रार्थना की कि प्रभु प्रकट हो जाओ. गिरिराज मेरे प्राण हैं एवं परिक्रमा प्राणों की संजीवनी है. प्राण रहते इसे नही छोड़ सकता. यह कहकर गोस्वामीजी ने जैसे ही सिर चरणों से उठाया तो सामने मदन गोपाल जी को देखा एवं मदन गोपाल ने अपना दाहिना चरण गिरिराज शिला पर रखा था. गिरिराज परिक्रमा के स्थान पर गिरिराज शिला की परिक्रमा को कहकर प्रभु अंतर्धान हो गये. आज भी श्री मदन गोपाल के चरण चिह्न युक्त यह शिला वृन्दावन में श्री राधा दामोदर के मंदिर में विद्यमान है.
सनातन गोस्वामीजी ने निम्न रचनाएँ लिखी-
-हरी भक्ति विलास की दिग दर्शिनी
-वृहद्वैष्णवतोषणि
-लीलास्तव
-वृहदद्भाग्वाताम्रित
एक बार गोस्वामीजी शिला के सम्मुख बैठकर मन में परिक्रमा कर रहे थे. अचानक उनके मुख में एक चमक सी छा गयी एवं शरीर में सात्विक भाव दिखने लगे. कुछ ही क्षणों में उनके नेत्र स्थिर होगये एवं वे समाधी में विलीन होगये. उस दिन आशारी पूर्णिमा थी. गोस्वामीजी ने पार्थिव शरीर छोड़कर मंजरी स्वरुप से निकुंज की ओर अनुगम किया.

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