Srila Narottam Das Thakur

 

                               राजशाही जिलें  के रामपुर से प्राय: ६ कोस दूर गरिरहाट परगना में खेतुरी नामक गोंव है।  प्रेमविलास में वर्णन है  कि श्री चैतन्य महाप्रभु कानाई नाटशाला ग्राम में एक दिन कीर्तन व् नृत्य करते-करते खेतुरी की तरफ मुख कर, नरोत्तम! नरोत्तम! नाम ले कर बार-बार पुकारने लगे।  भावावेश में प्रभु का मन अस्थिर हो गया।  श्री नित्यानंद प्रभु, हरिदास जी आदि पार्षदों ने श्रीमान महाप्रभु का भाव देखकर प्रेम पुलकित चित्त से सोचा, प्रभु के कोई प्रेमपात्र नरोत्तम नाम से, इस देश में प्रकट होंगे और प्रभु उनसे बहुत कार्य करवायेंगे। इसके बाद प्रभु ने पद्मावती  नदी में  स्नान किया और पद्मावती से बोले की नरोत्तम नामक व्यक्ति को तुम प्रेम दान देना तो पद्मावती बोली, प्रभु मैं उन्हें कैसे पहचानूंगी?  महाप्रभु बोले, जिसके नदी में पैर रखते ही तुम में उछाल आये, वही  नरोत्तम होगा।

 

                               श्री गौरांग महाप्रभु के लीला संवरण करने के समय सम्भवत: १५३१\३२  ई ० में  खेतुरी ग्राम के राजा कृष्णानंद दत्त की पत्नी नारायणी देवी के गर्भ से माघी पूर्णिमा को गोधूली के समय श्रील नरोत्तम ठाकुर का आविर्भाव हुआ।  श्रील नरोत्तम चन्द्रकला की तरह दिन-दिन बड़े होने  लगे।  अन्नप्राशन उत्सव मनाया गया।  उनके मुख में अन्न देना चाहा, पर उन्होंने मुँह फेर लिया फिर किसी  देवज्ञ ने कहा यह श्री कृष्ण प्रसाद छोड़ कुछ नहीं खायेगा।  तभी से उनके पिता ने कृष्ण प्रसाद छोड़ अन्य कुछ खिलाने से निषेध कर दिया।

 

                                श्रील  नरोत्तम का असाधारण रूप लावण्य, सुतीक्ष्ण बुद्धि और सुमधुर वाक्य सभी का चित आकर्षित करता।  पाँच वर्ष की आयु से उनकी विद्या आरम्भ हुई।  शिशुकाल से ही उन्होंने व्याकरण  और संस्कृत शास्त्रों  के अध्यन में असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया।  बाल्यकाल से ही राजकुमार नरोत्तम को श्रीहरिनाम में, श्रीमद्भागवत में, श्रीभगवद्भक्त और श्रीभगवद्विग्रह में असामान्य प्रीति तथा भोगविलास में विरक्ति देखकर वात्सल्य परायण  उनके माता पिता चिंतित हो गए।

 

                                खेतुरी में श्रीकृष्णानंद नामक एक परम भागवत ब्राह्मण वास करते थे।  श्री नरोत्तम नित्य ही उक्त विप्र के पास बैठकर श्रीगौरहरि और उनके पार्षदों की चरितकथायें  सुनते तथा “हा गौरांग” कहकर प्रेम से भरकर रोदन करते। एक बार श्री नरोत्तम ने स्वप्न देखा की श्रीनित्यानन्द प्रभु उन्हें पद्मावती में स्नान कर श्रीमान महाप्रभु की प्रेमरत्न धरोहर ग्रहण करने का आदेश दे रहे हैं।  सुबह उठते ही श्री नरोत्तम पद्मावती में स्नान करने के लिए गए।  जैसे ही जल में उतरे, पद्मावती में ज़ोर-ज़ोर से उछाल आने लगा , पद्मावती ने नरोत्तम को पहचान कर श्रीमन्महाप्रभु की धरोहर “प्रेम” उन्हें दान कर दी।  वह प्रेम प्राप्त करते ही श्रीनरोत्तम की कान्ति में परिवर्तन आ गया , वे महाप्रेम में विवश होकर आँसुओं से भीगते-भीगते उदंड नृत्य करने लगे।

 

स्वप्न और वृन्दावन यात्रा

 

                               श्रीगौरसुन्दर की प्रकटलीला के दर्शन न पाने से श्रील नरोत्तम का हृदय विदीर्ण होने लगा।  एक बार श्रीगौरसुन्दर ने स्वप्न में श्रीनरोत्तम को दर्शन देकर कहा, ” हे नरोत्तम! तुम शीघ्र वृन्दावन जाकर  श्री लोकनाथ का शिष्यत्व ग्रहण करो।” प्रभु की आज्ञा पाकर श्रील नरोत्तम मथुरा जा पहुँचे।

 

ब्रजमण्डल और गोस्वामीगण के दर्शन

 

                               मथुरा में श्री श्री रूप सनातन के अंतर्ध्यान की बात सुनकर श्री नरोत्तम “हा रूप, हा सनातन” कहकर धूल में लोटपोट कर रुदन करने लगे।  श्री रूप सनातन ने स्वप्न में दर्शन देकर उन्हें सांत्वना प्रदान की। सुबह होते ही वे वृन्दावन चल पड़े। श्री निवास आचार्य तब वृन्दावन में रहते थे।  श्री रूप गोस्वामीपाद ने स्वप्न में श्री जीव और श्री निवास को श्री नरोत्तम के आगमन की बात बताई। वृन्दावन में श्री गोविंददेव जी के मंदिर में श्री नरोत्तम की भेट श्री जीव गोस्वामी और श्री निवास आचार्य से हुई। श्री जीव गोस्वामी श्रील नरोत्तम को लेकर परम विरक्त शिरोमणिं गौर पार्षद श्री लोकनाथ गोस्वामी की कुटीर पर गए, श्री  नरोत्तम का परिचय कराया और उन पर कृपा करने के लिए अनुरोध किया। इससे पूर्व श्रीमन महाप्रभु श्रील लोकनाथ गोस्वामी को स्वप्न में आदेश दे चुके थे, नरोत्तम को उनका शिष्य बनाने के लिए।

                                श्रील लोकनाथ गोस्वामीपाद ने श्री नरोत्तम को हरिनाम दीक्षा दी।  तत्पश्चात श्री जीव गोस्वामी ने नरोत्तम को श्रील गोपालभट्ट गोस्वामी, श्री मधु पंडित और श्री भूगर्भ गोस्वामी आदि के दर्शन कराये।

श्रीगुरु सेवा और दीक्षा

 

                               श्री नरोत्तम श्री लोकनाथ की विशेष कृपा पाने के लिए उनकी सेवा करने लगे।  श्रीलोकनाथ प्रभु जिस स्थान पर शौच के लिए जाते, वे उस स्थान को झाड़ू से साफ करते और झाड़ू को वक्ष से लगाकर “हा प्रभु लोकनाथ, कृपा करो” कहकर प्रेम से भरकर रुदन करते।  श्री नरोत्तम की उस नीच सेवा से श्रीलोकनाथ का ह्रदय द्रवित हो गया, उन्होंने नरोत्तम को यमुना में स्नान कर आने को कहा, तत्पश्चात श्रीनरोत्तम को एक कुञ्ज में ले जाकर श्रवण पूर्णिमा को श्रीकिशोर गोपालमंत्र की दीक्षा प्रदान की। श्री लोकनाथ प्रभु ने श्रील ठाकुर महाशय को क्रमश: रागानुगा भजन पद्धति का उपदेश दिया।

 

भजनसिद्धि और उपाधि प्राप्ति

                              श्रील नरोत्तम एक बार एक कुञ्ज में भजन में आविष्ट थे, तभी श्रीवृषभानु नंदिनी ने स्वयं आविर्भूत होकर उन्हें आदेश दिया, “नरोत्तम! मध्यान में मेरे प्राणवल्लभ  के लिए दुग्धावर्तन तुम्हारी नित्य सेवा रही, मेरी प्रिय सखी चम्पक लता की भी यही सेवा है।  इसलिए तुम्हारा नाम हुआ, चम्पकमंजरी ।”

                             श्रील नरोत्तम ने इस सेवा आज्ञा की बात श्री लोकनाथ प्रभु को बताई।  वे इस बात से बहुत आनंदित हुए और उन्होंने श्री नरोत्तम को इस सेवा के लिए अनुमति दे दी।

                              एक बार श्रीनरोत्तम मानसी सेवा में दूध गरम कर रहे थे।  उफनते दूध में उनकी ऊँगली जल गयी, जब वह लीला से बाहर आये, तो उनकी ऊँगली सच में जल गयी थी।  श्रीमन जीव गोस्वामीपाद उनकी भजनसिद्धि देख अतिशय आनंदित हुए और वैष्णववृन्द के साथ विचारविमर्श कर उन्होंने श्रीनरोत्तम को “ठाकुर महाशय ” उपाधि प्रदान की।

                              श्री लोकनाथ गोस्वामीपाद  ने  ठाकुर महाशय को आदेश दिया की गौरदेश में श्रीमन महाप्रभु के संकीर्तन का प्रचार करें श्री विग्रह सेवा प्रगट करें और वैष्णव सेवा करें।  उस आदेश के अनुसार वे खेतुरी लौट कर श्री विग्रह सेवा आरम्भ करने का उपाय सोचने लगे।

                               श्री गौरसुन्दर ने स्वप्न में उनसे कहा – मैं पहले से ही धातु विग्रह रूप धारण कर श्रीविप्रदास नामक गृहस्थ के आंगन में तुम्हारी राह देख रहा हूँ । सर्पों के भय से वहाँ कोई नहीं जा पाता, तुम मुझे वहाँ से लाकर सेवा प्रकाश करो।  यह कहकर, पाँच और विग्रह बनवाकर, सेवा आरम्भ करने की आज्ञा दी तथा श्रील ठाकुर महाशय को आलिंगन कर वे अंतर्ध्यान हो गए।

                               श्रील  ठाकुर महाशय ने जागने पर प्रेमानंद में संकीर्तन कर शेष रात व्यतीत की। प्रातः ठाकुर महाशय के निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचने पर सभी साँप अंतर्निहित हो गए।  जैसे ही उन्होंने मंदिर का द्वार खोला, तो प्रियाजी के साथ श्रीगौरसुन्दर विद्युत गति से उनकी गोद में आ गए।  घर आ कर ठाकुर महाशय ने उन्हें आसन पर बिठाया और श्रीगौर गुणगान करने लगे। निश्चित किया की आदेश की अनुपालना में प्रियाजी के साथ अन्य पाँच विग्रह निर्माण करवाके फाल्गुनी पूर्णिमा को छहों विग्रहों  की प्रतिष्ठा हो! ये दिन  खेतुरी महोत्सव से विख्यात है।

                              श्रील ठाकुर महाशय ने अनेक नास्तिक पाखंडियों  का भी उद्धार किया। उनकी आलौकिक प्रेमाभक्ति का अनुभाव और अति विलक्षण पांडित्य प्रतिभा देखकर तथा भावोद्दीपक सुमधुर कीर्तन सुनकर बहुत से राजा महाराजा और ब्राह्मण पंडितों ने अपने-अपने धन-जन-आभिजात्य आदि का अभिमान त्याग कर श्रील ठाकुर महाशय का शिष्यत्व ग्रहण किया। इसके पश्चात श्रीनिवासाचार्य प्रभु ने अपने शिष्य श्रीरामचन्द्र कविराज के साथ श्रीवृन्दावन आगमन किया, तब  श्रील ठाकुर महाशय का विप्रलम्भ  या विरहभाव अत्यंत बढ़ गया। वे प्रेमस्थली नामक अपने भजन स्थल पर भूमि पर पड़े-पड़े अहर्निश रोदन करते।  कुछ दिन पश्चात उनकी देह में ज्वर हुआ, वे चिता शैय्या रचना करने का आदेश देकर समाधिस्थ हो गए।  शिष्यगण महा क़ातर हुए।

                               तीन दिन उसी अवस्था में रहे।  यह देख ब्राह्मण पंडित कहने लगे कि शूद्र हो कर ब्राह्मणों को शिष्य बनाने के कारण नरोत्तम की वाघरोग से मृत्यु हो गई। इससे परमकरुण श्रील गंगानारायण चक्रवर्ती महाशय उन सभी विप्रों का महत-अपराध समाप्त करने की दृष्टि से श्रील ठाकुर महाशय के श्रीचरणों में हाथ जोड़ कर क़ातर प्रार्थना करने लगे,“हे प्रभो! अपनी करुणा से इन पाखंडियों  का उद्धार कीजिये, अन्यथा यह घोर नरक में जायेंगे।

                                भक्त की क़ातर प्रार्थना पर श्रील ठाकुर महाशय “श्रीकृष्णचैतन्य “,  “श्रीराधाकृष्ण ” नामोच्चारण करते हुए सूर्य के समान दिव्य कांति प्रकट कर चिता  से उठ गए।  इस अति आश्चर्यजनक घटना को देखकर सभी ने हरिध्वनि की।   देवगण पुष्पवृष्टि करने लगे।  निंदक विप्रगण अपने अपराध के भय से काँपकर उनके चरणों  में गिर पड़े।  श्रील ठाकुर  महाशय ने उन लोगो को आलिंगन कर भक्ति रत्न प्रदान किया और वे खेतुरी लौट आये. खेतुरी आने के बाद श्रील ठाकुर महाशय का श्रीगौरांग और श्रीराधाकृष्ण विरह अत्यंत  प्रदीप्त हो उठा।  वे निरंतर रसिक भक्तों  के साथ कृष्ण चर्चा करते और क्षण-क्षण  पर “हा कृष्णचैतन्य ” “हा राधेकृष्ण ” कहकर भूमि पर लोटपोट  कर विलाप करते। प्रबल दैन्य, आर्त और व्याकुलता को लेकर रोते। उस स्थिति में ह्रदय के समस्त भाव, गीतों और पदों में प्रकट हुए।  वे ही आज प्रार्थना गीतों के रूप में विश्व में प्रकाशित हैं।

 

नित्यलीला   में   प्रवेश

 

                              श्रील ठाकुर महाशय के विरहभाव में उतरोत्तर वृद्धि होती गयी। भक्तगण उनके लीला संवरण की आशंका से अधीर हो उठे।  श्री गौरांग के प्रांगण में आकर श्रील ठाकुर महाशय वहाँ से विदा लेकर व्याकुल भाव से श्री गोविन्द आदि भक्तजनों  के साथ बुधरी ग्राम पहुँचे। गंगास्नान कर, तट के निकट जल में बैठकर श्रीरामकृष्ण आचार्य और श्रीगंगानरायण चक्रबर्ती  को अपना अंगमार्जन करने का आदेश दिया।  जैसे ही उन दोनों ने श्री ठाकुर महाशय का श्रीअंग स्पर्श किया, उनका वह प्रेममय तनु विष्णोपदोद्भवा (विष्णु चरणो से निकली ) गंगाजी के जल में दुग्धवत मिल गया। इस प्रकार अचिन्त्य रूप से श्रील ठाकुर महाशय के लीला संङ्गोपन से पाषाण भी पिघल गया। चारों  ओर से हरि हरि  ध्वनि उठी। देवगण देवलोक से पुष्प वर्षण करने लगे।

 

“मुरतैव भक्ति : किमयं किमेष वैराग्यसारस्तनुमान नृलोके।

सम्भाव्यते यः कृतिभि : सदैव तस्मै नमः श्रील नरोत्तमाय।।”

 

                                                                                                  राधे राधे

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