VAISHNAV APRADH वैष्णव अपराध

वैष्णव अपराध

Rupa_Goswami

श्री रूप गोस्वामी  पर  श्री  राधाकृष्ण की कृपा की वृष्टि  निरन्तर होने लगी। उन्हें प्राय: हर समय उनकी मधुर लीलाओं की स्फूर्ति होती रहती। पहले तो जो कोई उनके पास आता अपनी कुछ शंकाए लेकर या भजन-साधन में अपनी कुछ समस्याएं लेकर, वे बड़े ध्यान से उसकी बात सुनते, मृदु वचनों से उसकी शंकाओं का समाधान करते, आवश्यक निर्देश देकर साधन-संबंधी उसकी समस्याओं को हल करते। जो भी उनके पास आता म्लान मुख लेकर उनसे विदा होता एक अकथनीय आनन्द लहरी से व्याप्त मन और प्राण लेकर। पर अब अक्सर उन्हें किसी के आने-जाने का पता भी न चलता। लोग आते उनके पास, उनके वचनामृत से तृप्त होने। पर कुछ देर उनके पास बैठकर प्यासे ही  लौट आते।

एक बार कृष्णदास नाम के एक विशिष्ट वैष्णव-भक्त, जो पैर से लंगड़े थे, उनके पास आये कुछ सत्संग के लिए। उस समय वे राधा कृष्ण  की एक दिव्य लीला के दर्शन कर रहे थे। राधा एक वृक्ष की डाल से पुष्प तोड़ने की चेष्टा कर रही थीं। डाल कुछ ऊँची थी। वे उचक-उचक कर उसे पकड़ना चाह रही थीं, पर वह हाथ में नहीं आ रही थी। श्यामसुन्दर दूर से देख रहे थे। वे आये, चुपके से और राधारानी के पीछे से डाल को पकड़कर धीरे-धीरे इतना नीचा कर दिया कि वह उनकी पकड़ में आ जाये । उन्होंने जैसे ही डाल पकड़ी श्यामसुन्दर ने उसे छोड़ दिया। राधारानी वृक्ष से लटक कर रह गयीं। यह देख रूप गोस्वामी को हंसी आ गयी। कृष्णदास समझे कि वे उनका लंगड़ापन देखकर हंस दिये। क्रुद्ध हो वे तत्काल वहाँ से गये। रूप गोस्वामी को इसका कुछ भी पता नहींथा

Srila-Rupa-Gosvami

अकस्मात उनकी लीला-स्फूर्ति बन्द हो गयी। वे बहुत चेष्टा करते तो भी लीला-दर्शन बिना उनके प्राण छट-पटाने  लगे। पर इसका कारण वे न समझ सके। सनातन गोस्वामी के पास जाकर उन्होंने अपनी व्यथा का वर्णन किया और इसका कारण जानना चाहा। उन्होंने कहा- ‘तुम से जाने या अनजाने कोई वैष्णव-अपराध हुआ हैं, जिसके कारण लीला-स्फूर्ति बन्द हो गयी हैं। जिनके प्रति अपराध हुआ है, उनसे क्षमा मांगने से ही इसका निराकरण हो सकता है।’

‘जान-बूझकर तो मैंने कोई अपराध किया नहीं। यदि अनजाने किसी के  प्रति कोई अपराध हो गया हैं, तो उसका अनुसन्धान कैसे हो?’रूप गोस्वामी ने पूछा।

‘तुम वैष्णव-सेवा का आयोजन कर स्थानीय सब वैष्णवों को निमन्त्रण दो। यदि कोई वैष्णव निमन्त्रण स्वीकार नहीं करता , तो जानना कि उसी के प्रति अपराध हुआ है’ सनातन गोस्वामी ने परामर्श दिया।

रूप गोस्वामी ने ऐसा ही किया। श्री  कृष्णदास बाबा ने निमन्त्रण स्वीकार नहीं किया। जो व्यक्ति निमन्त्रण देने भेजा गया था, उससे उन्होंने रूप गोस्वामी के प्रति क्रोध व्यक्त करते हुए उस दिन की घटना का वर्णन किया। रूप गोस्वामी ने जाकर उनसे क्षमा माँगी और उस दिन की अपनी हंसी का कारण बताया। तब बाबा संतुष्ट हुए और रूप गोस्वामी की लीला-स्फूर्ति फिर से होने लगी।

साधकों के लिए इस घटना का विशेष महत्व है। लगता है साधकों को वैष्णव-अपराध से भली प्रकार सावधान करने के लिए ही श्रीमन महाप्रभु की इच्छा से यह घटना घटी। उन्होंने रूप गोस्वामी को शिक्षा देते समय वैष्णवापराध का असाधारण बल जतलाते हुए कहा था कि भक्ति एक सुकोमल लता के समान है और वैष्णव-अपराध मत्त हाथी के समान। वैष्णव-अपराध भक्ति-लता को समूल उखाड़ फेंकने की सामर्थ्य रखती हैं। इसलिए साधक रूपी माली को उसे यत्न से ढककर और अपराध रूपी हाथी से बचाकर रखना चाहिए|

हरि भक्ति विलास का कथन हैं कि किसी वैष्णव के प्रति द्वेष रखने, क्रोध करने, उसका अनादर करने, उसकी निन्दा करने, उस पर प्रहार करने, या उसे देखकर हर्ष न प्रकाश करने से पतन होता है-

हन्ति निन्दति वै द्वेष्टि वैष्णवान्नाभिनन्दति।

क्रुद्यते याति नो हर्ष दर्शन पतनादि षट्॥*

वैष्णव-अपराध से भगवान को दु:ख होता है और अपराध करने वाला भक्त हो तो भी यमपुर जाता है, ऐसा सूरदास जी ने कहा है-

भक्त अपराधे हरि दु:ख पइ हैं।

सूरदास भगवन्त बदत यों मोहि भजत ते यमपुर जइहैं॥

वैष्णव-अपराध से रक्षा करने की सामर्थ्य स्वयं भगवान में भी नहीं है। जिसके प्रति वैष्णव-अपराध हो वही जब तक क्षमा न करे तब तक भीषण परिणाम से रक्षा पाने का कोई उपाय नहीं। श्रीमद्भागवत के दुर्वासा- अम्बरीष उपाख्यान से यह स्पष्ट है।

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