VEDIC BHAKTI AUR RAGANUGA BHAKTI

वैधीभक्ति और रागानुगा भक्ति

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साधन-भक्ति  दो प्रकार की होती है – वैधीभक्ति और रागानुगा भक्ति। वैधीभक्ति के साधक भजन में प्रवृत्त होते हैं।वे भक्ति, शास्त्रों के डर से और दुखो से छुटकारा  पाने के लिए करते है|राग मार्ग के साधक भजन में प्रवीण होते ही है उनके मन में श्री कृष्ण से प्रेम होने के कारण वे युगल किशोर की सेवा चाहते है | विधिमार्ग के भक्तों में भगवान के ऐश्वर्य ज्ञान की प्रधानता होती है। वे भगवान को कर्मफल एवम मुक्ति देने वाले समझते है  इसलिए उन्हें ऐश्वर्य प्रधान वैकुण्ठ या परव्योम की प्राप्ति होती है और वे सालोक्यादि चार प्रकार की मुक्तियों में से किसी एक प्रकार की मुक्ति प्राप्त करते है|विधिमार्ग के साधकों को व्रज में श्री कृष्ण  की प्राप्ति नहीं होती।

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रागानुगा-भक्ति रागात्मिका की अनुगा है। रागात्मिका भक्ति के आश्रय है नन्द, यशोदा ,राधा , ललितादि,ये  श्रीकृष्ण की स्वरूप-शक्ति के मूर्त विग्रह, अनादि-सिद्ध,  व्रज परिकर के रूप में श्रीकृष्ण के साथ उनके लीला-स्थान व्रजधाम में नित्य विराजमान होते है  और जिनका व्रजधाम से सजातीय सम्बन्ध है।ये सब स्वरुप शक्ति के प्रकाश है |

व्रजधाम में जो साधन-सिद्ध जीव हैं, वे रागात्मिका भक्ति के मुख्य आश्रय नहीं हैं, क्योंकि  वे जीवन-शक्ति का प्रकाश हैं। उनकी भक्ति रागात्मिका-भक्ति के आश्रयों के आनुगत्य में की जाती है। इसीलिए उसे रागानुगा-भक्ति कहते हैं।

रागानुगा-भक्ति भी दो प्रकार की है- कामानुगा और सम्बन्धानुगा। दास्य, सख्य और वात्सल्यभाव के श्रीकृष्ण के रागात्मिका परिकरों के आनुगत्य में की जाने वाली भक्ति सम्बन्धानुगा है। और मधुर भाव के श्रीकृष्ण के रागात्मिका परिकरों के अनुगत्य में कीजाने वाली भक्ति कामानुगा है।

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रागानुगाओं की कामानुगा भक्ति भी दो प्रकार की है- सम्भोगेच्छामयी और तत्तद्भावेच्छामयी। सम्भोगेच्छामयी भक्ति में श्रीकृष्ण के साथ सम्भोग की इच्छा रहती है। सम्भोग की इच्छा रखने वाले भक्तों को व्रज में ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण की सेवा नहीं मिलती। कारण यह है कि व्रज में स्वसुख-वासना है ही नहीं। व्रज में परिकर इच्छा रखते हैं केवल श्रीकृष्ण के सुख की। फिर सम्भोग की इच्छा रखने वाले भक्त आनुगत्य करें तो किसका? वे द्वारिका की महर्षियों का ही अनुगत्य कर सकते हैं, जिनके हृदय में कभी-कभी स्वसुख वासनामयी सम्भोग की इच्छा जाग्रत होती है। इसलिए उन्हें ब्रज  की प्राप्ति न होकर द्वारका की ही प्राप्ति होती है।

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तत्तदभावेच्छामयी कामानुगा-भक्ति में सम्भोग की इच्छा नहीं होती। साधन में सिद्धि लाभ करने के पश्चात मंजरी-देह से लीला में प्रवेश करने पर भी तत्तदभावेच्छामयी कामानुगा भक्ति के साधक सब प्रकार से स्वसुख वासना-रहित होकर रागात्मिकामयी कृष्ण सेवा के आयोजनों में आनुकूल्य करते हैं। श्रीकृष्ण भी यदि उनके चित्त-विनोद के लिये उनके साथ रमण करना चाहें, तो भी वे इसके लिए तेयार  नहीं होती ,वे हमेशा युगल किशोर की  सेवा के लिए तत्पर रहती है

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